एक छोटे से स्कूल के टीचर्स बच्चों को सिखा रहे लैंगिक भेदभाव से लड़ना

अनोखे तरीके से इस स्कूल के टीचर्स बच्चों को सीखा रहे हैं लैंगिक भेदभाव का मतलब...

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अक्सर बड़ी उम्र के लोग भी जब लड़की और लड़के के बीच असमानता की बातें करते हैं तो समझ नहीं आता कि आखिर गलती कहां हो रही है। गलती दरअसल हमारी परवरिश और शिक्षा में होती है।

स्कूल के बच्चे
स्कूल के बच्चे
बच्चों को सेक्स और जेंडर के बीच का फर्क समझाया गया। दो दिन की वर्कशॉप में बच्चों और टीचरों को भी कई सारी बातें क्लियर हुईं। उन्हें समझ आया कि लड़की और लड़कों में कोई भेद नहीं करना चाहिए। इसके बाद स्कूल का नजारा ही बदल गया।

हमारे समाज में लड़का-लड़की, स्त्री-पुरुष के बीच हमेशा भेदभाव किया जाता है। दोनों की क्षमताओं में कोई फर्क नहीं होता लेकिन फिर भी हर क्षेत्र में काफी असामनता देखने को मिलती है। अक्सर बड़े उम्र के लोग भी जब लड़की और लड़के के बीच असमानता की बातें करते हैं तो समझ नहीं आता कि आखिर गलती कहां हो रही है। गलती दरअसल हमारी परवरिश और शिक्षा में होती है। हमें बचपन से ही ये बात प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सिखा दी जाती है और फिर हम उसी दायरे में जिंदगी भर सोचते रहते हैं। लेकिन चेन्नई का एक छोटा सा स्कूल है जहां के टीचर्स बच्चों को भेद न करने की सीख दे रहे हैं।

चेन्नई के विद्या विदाई स्कूल में पढ़ाने वाले एक टीचर बताते हैं, 'स्कूल के स्पोर्ट्स डे के दिन सभी बच्चे खेल रहे थे और हम प्लेग्राउंड में ही थे। कक्षा-6 के बच्चों की रेस होनी थी। सभी बच्चे मैदान पर तेजी से भागे, लेकिन इसी बीच एक बच्ची जिसका नाम मेघा था वह अपने स्कर्ट में फंसकर गिर गई। इसके बाद वहां सारे बच्चे उसकी मदद करने के बजाय हंसने लगे। उसके लिए यह काफी शर्मिंदगी भरा लम्हा था।' इसके बाद उस टीचर ने सोचा कि बच्चों की इस मानसिकता को दूर करना होगा।

टीचरों के ग्रुप में जब यह बात उठाई गई तो सबको लगा कि यह बच्ची की ड्रेस से जु़ड़ा हुआ मुद्दा है, लेकिन बाद में सबने सोचा कि नहीं ये तो लड़की और लड़के के बीच बराबरी की बात है। सबने मिलकर बात शुरू की तो कई सारी समस्याएं आईं। जैसे लड़कियों की ड्रेस खेल के लिए उपयुक्त नहीं है, स्कूल में लड़कों और लड़कियों के बीच काफी दूरी होती है। वे सब साथ में पढ़ते और खेलते भी नहीं हैं। इससे वे आपस में दोस्त भी नहीं बन पाते। इतना ही नहीं उनकी क्लास भी अलग-अलग होती हैं।

इसके बाद टीचर्स ने 1 से 5 तक के बच्चों से बात की तो उनकी बातों ने हैरान कर दिया। छोटे लड़कों ने कहा कि लड़कियां न तो उनके साथ खेलती हैं और न उनकी दोस्त बनती हैं। बच्चियों ने बताया कि उन्हें ड्रेस की वजह से लड़कों के बीच जाने में असहजता होती है। एक बच्चे ने तो यहां तक कह दिया कि उसकी मां ने ऐसी लड़कियों के बगल में बैठने से मना किया है जो स्कर्ट पहनती हैं। वहीं 6 से 12 तक के स्टूडेंट्स से बात की गई तो लड़कियों ने कहा कि लड़के हमेशा उनका मजाक उड़ाते हैं। वहीं लड़कों ने कहा कि टीचर्स हमेशा लड़कियों का पक्ष लेते हैं और उन्हें दरकिनार कर देते हैं। सबसे मेन दिक्कत ये थी कि टीचरों ने मना किया था कि लड़के और लड़कियां आपस में दोस्त नहीं हो सकते।

समस्या की पड़ताल करने वाले टीचरों ने बाकी टीचरों को बुलाकर उनसे भी बात की। तब पता चला कि लैंगिक विभेद क्लासरूम से लेकर किताबों तक है। टीचर कोई भी प्रॉजेक्ट देते हैं तो लड़कियों और लड़कों का अलग-अलग ग्रुप बनाते हैं। उन्हें नहीं पता होता कि इससे आगे चलकर समाज में गैरबराबरी उत्पन्न होती है। इसी से हमारे व्यवहार में फर्क पैदा होता है। बदलाव की चाहत रखने वाले टीचरों ने स्कूल मैनेजमेंट के सामने यह समस्या रखी और कोई समाधान खोजने को कहा। मैनेजमेंट से सकारात्मक जवाब मिलने के बाद 'अवेयर' नाम के एक संगठन की मदद से बच्चों के लिए वर्कशॉप आयोजित की गई।

बच्चों को सेक्स और जेंडर के बीच का फर्क समझाया गया। दो दिन की वर्कशॉप में बच्चों और टीचरों को भी कई सारी बातें क्लियर हुईं। उन्हें समझ आया कि लड़की और लड़कों में कोई भेद नहीं करना चाहिए। इसके बाद स्कूल का नजारा ही बदल गया। सभी लड़के और लड़कियां आपस में एक दूसरे से बात कर रहे थे। साथ में बैठ रहे थे। यह बदलाव काफी सकारात्मक रहा। अब लड़कियों की ड्रेस को और भी सुविधाजनक बनाने पर काम किया जा रहा है। स्कूल में आपसी मेलजोल बढ़ाने के लिए बाल संसद, स्टूडेंट वर्कशॉप और टीचरों के लिए वर्कशॉप का भी आयोजन किया जा रहा है।

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