अमेरिकी मूल की महिला की भारतीयों को स्वच्छ और 'सुंदरा' रखने की कोशिश

अमेरिकी मूल की इरीन ज़ैकिस हैं सुंदरा की संस्थापकबड़े होटलों में इस्तेमाल होने के बाद बचे साबुनों को फिर से बनाती हैंगरीब लोगों को करती हैं प्रयोग के लिये प्रेरित थाइलैंड प्रवास के दौरान लोगों की स्वच्छता के प्रति बेरुखी और साबुन के बारे में जानकारी की कमी ने किया इस काम के लिये प्रेरितगरीब महिलाओं को साबुन के पुर्नचक्रण के काम में लगाकर उन्हें उपलब्ध करवाती हैं सम्मानजनक नौकरी और उचित मजदूरीमशहूर फिल्म ‘स्लमडाॅग मिलियनेयर’ देखकर समाजसेवा के काम के लिये प्रेरित हुई थीं इरीन ज़ैकिस

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यूनिलीवर द्वारा हाल ही करवाये गये अध्ययन में यह सामने आया है कि भारत में फिलहाल करीब 70 मिलियन लोग ऐसे हैं जिन्होंने कभी साबुन का प्रयोग तक नहीं किया है। इसकी सीधा मतलब यह निकलता है कि प्रति तीस सेकेंड में पांच वर्ष से कम उम्र का एक बच्चा डायरिया या फिर उसके जैसी स्वच्छता संबंधित बीमारी, जिनपर आसानी से अंकुश लगाया जा सकता है, के चलते मौत के मुंह में समा रहा है। इसलिये वास्तव में इसकी जरूरत है और इसी वजह से मैं आज यहां हूँ।
-इरीन ज़ैकिस, सुंदरा की संस्थापक


प्रारंभिक क्षण

आयरलैंड में धूल-मिट्टी से सने बच्चों के एक समूह ने इरीन से पूछा, ‘‘साबुन क्या होता है?’’ यह युवा अमेरिकी उन दिनों मिशिगन विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद बच्चों के अवैध व्यापार को रोकने पर ध्यान केंद्रित करने के उद्देश्य से एनजीओ के माध्यम से थाईलैंड आई थी। उस समय वह एक छोटे से थाई गांव में बच्चों के एक स्कूल में थी जब उनके जीवन को बदलने वाला यह विचार उनके मन में कौंधा। जब उन्होंने शौचालय का प्रयोग और हाथ धोने के लिये साबुन मांगा तो उन्हें पता चला कि साबुन तो वहां इस्तेमाल ही नहीं होता। उनके लिये चैंकाने वाला तथ्य यह था कि आसपास के इलाके में किसी ने इससे पहले साबुन का नाम तक नहीं सुना था। इरीन को उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ और वे तुरंत पास के एक दूसरे शहर गईं और अपने साथ ढेर सारा साबुन लेकर उनके पास वापस आईं। इरीन उस समय को याद करते हुए आश्चर्य से कहती हैं, ‘‘मेंने उन लोगों को साबुन के पैकेट खोलकर उसे नाखूनों से खुरचते हुए देखा और मैं अचंभित रह गई। वे लोग उसके प्रयोग के बारे में बिल्कुल अनजाने थे और उनमें से कुछ बिना कुछ सोचे समझे साबुन को अपने सिर पर मारकर देख रहे थे।’’

‘‘इस दौर का अनुभव करने के बाद मैंने इस मुद्दे को दुनिया के सामने लाते हुए इसका समाधान खोजने की दिशा में अपने जीवन को समर्पित करने का फैसला कर लिया। कितने सारे लोग पानी के बारे में बात करते हैं और वे अपनी तरफ से बिल्कुल ठीक करते हैं। लेकिन साबुन और स्वच्छता की शिक्षा देने की दिशा में कौन बात कर रहा है या इस मुद्दे को उठा रहा है? और यह तो सिर्फ आधा ही समीकरण है।’’ वे आगे कहती हैं।


आप मुझे ये बताने वाली कौन होती हैं कि मैं अपने बच्चो के साथ क्या करूँ?

इरीन को शुरू से ही मालूम था कि उनका जीवन सामाजिक कार्यों और एक्टिविस्म में बीतना है। ‘‘मैं उनमें से हूँ जो एक वृत्तचित्र देखते हुए कुछ कर गुजरने के लिये प्रेरित हो जाती हूं और चल देती हूँ ओर मैं ऐसी ही हूँ। मुझे लगता है कि मुझे वहां जाकर उन लोगों के लिये कुछ करना चाहिये। मुझे लगता है कि चाहे हम किसी भी देश के रहने वाले हों या फिर कोई भी भाषा बोलते हों या किसी धर्म विशेष को मानते हों, वास्तव में हम सब कहीं न कहीं किसी न किसी प्रकार से आपस में जुड़े हुए हैं।’’ लेकिन वह सिर्फ साबुन ही नहीं थी जिसके चलते वे इस क्षेत्र में सक्रिय हुईं। वे बच्चों के अवैध व्यापार को रोकने के काम में लगे हुए संगठनों के साथ जुड़ी हुई थीं। हालांकि यह काम शांति देने वाला तो था लेकिन बहुत थकाऊ और मानसिक रूप से तोड़ने वाला था।

इरीन ज़ैकिस
इरीन ज़ैकिस

उस दौर को याद करते हुए इरीन कहती हैं, ‘‘कई औरतें मेरे पास आकर कहतीं - ‘तुम्हारी मुझे यह बताने की हिम्मत कैसे हुई कि मुझे अपने बच्चे के साथ क्या करना चाहिये? तुमने कभी अपने पति से मार नहीं खाई है। मुत कभी 3 दिन के बिना खाने-पीने के नहीं रही हो।’ और मैं खुद को उलझनों में घिरी हुई पाती और सोच में पड़ जाती क्योंकि वे बिल्कुल सही थीं। मैंने इस सब का कभी अनुभव नहीं किया था। तो ऐसे में मैं अपने निर्णय उनपर कैसे थोप सकती हूँ? और यह मेरे उस काम को अलविदा कहने का सबसे बड़ा कारण था क्योंकि मैं इस मुद्दे की जटिलता से अभिभूत थी और खुद को किसी दूसरे ग्रह का प्राणी समझने लगी थी।’’

इसकी तुलना में मुझे साबुन और स्वच्छता की सादगी बहुत आकर्षक लगी। ‘‘चूंकि प्रारंभिक दिनों में मुझे साबुन का विरोध करने वाले कई लोगों से जूझना पड़ा और वास्तव में उनकी वजह से ही मैं इस काम की तरफ आकर्षित हुई। मेरे ख्याल से हममें से शायद ही कोई इस बात से इंकार करे कि हरकोई साबुन का हकदार है। साबुन आपकोंु गरिमा प्रदान करता है। मेरा विश्वास है कि स्वच्छता सबका जन्मसिद्ध अधिकार है। और वर्ष 2015 के आधुनिक समय में इनते सारे भारतीयों या स्पष्ट रूप से कहें तो दुनिया के किसी भी कोने में रह रहे लोगों को दुनिया की इस सबसे बुनियादी दवा से दूर नहीं होना चाहिये। कम से कम हम बच्चों को व्यस्कता तक पहुंचने के समान अवसर प्रदान करने की दिशा में पहल करते हुए उन्हें मूलभूत सुविधाएं तो उपलब्ध करवाएं। और मुझे बिल्कुल नहीं लगता कि यह एक कोरा विचार या भारतीयय विचार है बल्कि मेरे अनुसार तो यह एस सार्वभौमिक आवश्यकता है।’’

एक और कारण जिसने इरीन को साबुन के पुर्नचक्रण के काम की ओर आकर्षित किया वह इसका प्रत्येक मोर्चे पर स्थाई होते हुए इसके द्वारा एक से अधिक मुद्दों का समाना करने का मौका था। ‘‘सबसे पहले आपके पास होटलों का अपशिष्ट होता है और सिर्फ अमरीका में ही प्रतिवर्ष एक बिलियन से अधिक शायद ही प्रयोग में आए साबुन को गड्ढों में फेंक दिया जाता है। और भारत में तो गड्ढे पहले से ही कूड़े से भरे हुए हैं तो यहा ऐसे साबुनों को अपनाना एक बहुत बड़ी पर्यावरणीय जीत है। इसके बाद हम जिन इलाकों में काम कर रहे हैं वहां की झुग्गियों में रहने वाली गरीब महिलाओं को रोजगार का एक अवसर प्रदान करते हैं और उन्हें काम के बदले में उचित मजदूरी सहित एक सम्मानजनक रोजगार का अवसर प्रदान करते हैं।’’

’’इसके अलावा हम इन महिलाओं को लोगों के बीच बोलने और नेतृत्व कौशल को बढ़ाने का प्रशिक्षण भी देते हैं ताकि वे स्वच्छता राजदूत बनते हुए अपने समुदाय के बीच एक अगुवा की भूमिका निभा सकें। हमारा मानना है कि स्वच्छता की शिक्षा तब सबसे अधिक प्रभावी हो जाती है जब आपको सिखाने वाला देखने में आपके जैसे दिखने के अलावा आपकी भाषा में आपको सिखा पाए और उसने भी जीवन में अपकी ही तरह के अनुभवों का सामना किया हो। आखिरकार हमारा साबुन को उपलब्ध करवाते हुए स्वच्छता की शिक्षा देने के काम में सबसे अधिक ध्यान इन वंचित समुदायों पर ही है और हम समान रूप से शहरी मलिन बस्तियों और आदिवासी इलाकों में काम कर रहे हैं। इस तरह से हम अपने स्वच्छता सबकों को साबुन के साथ जोड़ते हुए बच्चों को इनके माध्यम से साफ-सफाइ की आदतों की तरफ सोचने को मजबूर करते हैं ताकि वे स्वच्छता के काम को अपने हाथों में लेते हुए एक स्वस्थ युवावस्था तक पहुंचने में कामयाब हो सकें।’’


एक खूबसूरत कहानी

‘सुंदरा’ का संस्कृत में अर्थ सुंदर होता है और एक विशेष कारण के चलते इरीन ने अपने संगठन को इसके साथ जोड़ने का फैसला किया। ‘‘सुंदरा की नींव रखते समय मैं अपने जीवन के बीसवें बसंत में थी और अपनी उम्र की अधिकतर लड़कियों की तरह मैं भी सौंदर्य के विचार के साथ संघर्ष में लगी रहती थी। उन दिनों मैं थाईलैंड से वापस न्यूयाॅर्क लौटी थी और बाहर निकलने पर मैं अपने मित्रों को इंस्टाग्राम पर मौजूद इन कथित सुंदर और खूबसूरत लड़कियों के कपड़ों और इनके सैंकड़ों अनुयाइयों के बारे में बात करते हुए देखती और पाती। इसके अलावा वे बेसब्री से उनके जैसा बनने के लिये भी उत्सुक थे।’’

‘‘मेरे जीवन में एक ऐसा भी समय आया जब मैं अवसाद में घिर गई और सोचने लगी ..... क्या यही वास्तविक सुदरता है? बेहद दुबली-पतली और स्वयं को त्रुटीपूर्ण दिखाने का प्रयास करती और अपनी तस्वीरें खींचकर दूसरों को दिखाने का प्रयास करतीं? में अपने जीवन में गांवों में इनसे कई गुना अधिक सुंदर व्यक्तियों से मिल चुकी थी और उनके न तो सैंकड़ों की संख्या में अनुयायी थे और न ही वे इन इंस्टाग्राम हस्तियों की तरह मशहूर थे। ऐसे लोग जो एक अच्छे भविष्य के निर्माण के लिये निःस्वार्थ भाव से काम कर रहे हैं और अपने बच्चों को शिक्षा देने के लिये बहुत सी चीजों का बलिदान कर रहे हैं।’’

‘‘मैंने निर्णय लिया कि मैं इन महिलाओं को मान्यता दिलवाने के लिये कुछ सकारात्मक करूंगी। वास्तविक खूबसूरती अंदर कहीं से आती है। यह दूसरों की मदद करने में हैं, यह एक बेहतर भविष्य के लिये लड़ने में है, यह उन सब बातों में है जो ‘सुंदरा’ के साथ जुड़े हुए हमारे सामुदायिक प्रशिक्षक कर रहे हैं और मैं भीतर की इस अद्भुत सुंदरता को उजागर करना चाहती थीं,’’ इरीन कहती हैं। और आखिरकार वर्ष 2013 में ‘सुंदरा’ ने वास्तविकता का जामा पहना।


‘सुदरा’ के काम करने का तरीका: दोनों के लिये जीत की स्थिति

इरीन के अनुसार पूरी प्रक्रिया की सादगी ही ‘सुंदरा’ का सबसे बड़ा आकर्षण है। ‘‘हम मुंबई के एक दर्जन से भी अधिक होटलों से इस्तेमाल के बाद बची हुई साबुनें इकट्ठा करते हैं और इनमें बड़ी अंर्तराष्ट्रीय श्रृंखलाओं से लेकर छोटे बुटीक भी शामिल हैं। इसके बाद हम इस साबुन के अपशिष्ट को मुंबई के बाहरी इलाके में स्थित कारवा की अपनी कार्यशाला तक लाते हैं जहां हमारे पास इस साबुन को स्वच्छ करने के काम में प्रशिक्षित स्थानीय महिलाओं की एक टीम है। वे इस साबुन की बाहरी परत को छीलते हुए उसे पीसती हैं और फिर उसे ब्लीच के घोल में मिलाते हुए सुखा देती हैं। इसके बाद वे इसे एक मशीन में डाल देती हैं तो उच्च दबाव के माध्यम से इसे एक नई साबुन की टिक्की में बदल देता है। इस पूरी प्रक्रिया में शुरू से आखिर तक सिर्फ 7 मिनट का समय लगता है। इसके बाद प्रतिमाह यह साबुन 30 से भी अधिक स्कूलों में वितरिक की जाती है। साबुन के साथ बच्चों और बड़ों को स्वच्छता की शिक्षा देने के लिये विभिन्न सत्रों का भी आयोजन किया जाता है।’’

इरीन का कहना है कि ‘सुंदरा’ की सबसे बड़ी विशेषता सिर्फ इसकी सादगी ही नहीं है। ‘‘इसमें हमारे अलावा कई अन्य क्षेत्रों के लिये भी जीत की स्थिति है। सबसे पहले तो इस काम के चलते पर्यारण का फायदा होता है क्योंकि इसके द्वारा कचरा कम होता है, इसके बाद होटलों का नंबर आता है जो सीएसआर कार्यक्रम के माध्यम से फायदे में रहते हैं। इसके अलावा कई महिलाएं भी इससे प्रभावित होती हैं क्योंकि उन्हें एक सम्मानजनक नौकरी की एवज में उचित मजदूरी प्राप्त होती है और स्वच्छता के प्रति शिक्षित होकर एक पूरे समुदाय की बेहतरी की दिशा में काम आगे बढ़ता है। हालांकि हमारा प्रयास अभी काफी छोटा है लेकिन हम भविष्य के लिये एक अच्छा उदाहरण रखने में कामयाब हो रहे हैं।’’


‘घर जाओ और शादी करो’

भारत महिलाओं के लिये एक आसान जगह नहीं है और श्यमल वर्ण वाली एक अमेरिकी महिला के लिये तो बिल्कुल भी नहीं। लेकिन इरीन मुंबई और आसपास की यात्राओं को काफी सुरक्षित पाती हैं। विभिन्न नौकरशाहों के साथ दैनिक आधार पर होने वाली बातचीत के दौरान उन्हें उनकी स्थिति से बारंबार रूबरू करवाया जाता रहता है। वे टिप्पणी करते हुए कहती हैं, ‘‘मुझे कई बार समझौता करते हुए खुद को गंभीरता से लिये जाने के उद्देश्य से अपने साथ पुरुषों को ले जाना पड़ता है। यहां तक कि कई बार जब मुझे लगता है कि हम एक अच्छी बैठक करने में सफल रहे हैं तो उसके बाद मुझे मशवरा दिया जाता है, ‘घर जाओ और शादी करो।’ मुझे अहसास कि यह गलतफहमी से अधिक कुछ भी नहीं है इसलिये मैं इन बातों को गंभीरता से नहीं लेती।’’

‘सुंदरा’ संचालन के लिये मुख्यतः अनुदान और दूसरों में मिलने वाले दान पर आश्रित है। इलीन स्पष्ट करते हुए कहती हैं, ‘‘इसके अलावा हमारे पास कुछ काॅर्पोरेट प्रायोजक भी हैं और लिंक्डइन द्वारा सामाजिक उद्यमिता पर आधारित एक प्रतियोगिता ‘लिंक्डइन फाॅर गुड’ भी जीतने में सफलता हासिल की है।’’फिलवाह वह ‘सुदरा’ के साथ अधिक कर्मचारियों को जोड़ने के साथ-साथ होटल भागीदारों की संख्या को भी बढ़ाने के प्रयास कर रही हैं। लेकिन खुद को मालिक कहलाना उनके लिये सबसे दर्दनाक क्षण होता है क्योंकि वे मानती हैं कि वे बाकी कुछ भी हो सकती हैं लेकिन मालिक नहीं। वे कहती हैं, ‘‘में सिर्फ उन लोगों में से एक हूँ जिसका ध्यान दुनिया की इस समस्या की ओर गया और जिसने इसके एक उचित समाधान को तलाशने की दिशा में अपना छोटा सा सहयोग दिया। मुझे लगता है कि हर बीतते वर्ष के साथ हमारे द्वारा की जाने वाली गलतियों की संख्या में कमी आती रहती है और हमारा अभियान बेहतर होता जाता है और सिर्फ इसी वजह से हम सटीक स्वच्छता आवश्यकताओं को पहचानने में सक्षम हो पाते हैं। लेकिन ऐसा करने के लिये मैंने काबिल लोगों को तलाशकर उन्हें साथ लाना सीखा है औ फिर मैं उनके रास्ते से हट जाती हूँ। निश्चित रूप से मैं यह सब अकेली नहीं कर सकती थी।’’


स्लमडाॅग मिलियनेयर और इरीन का संबंध

इरीन कहती हैं कि समाजसेवा के काम में आने के लिये वे फिल्म ‘स्लमडाॅग मिलियनेयर’ को देखकर प्रेरित हुईं। अधिकतर भारतीयों के लिये यह फिल्म गरीबी से त्रस्त भारत के चित्रण के चलते यादगार है लेकिन इरीन के लिये सिर्फ इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि वे इसे आंखे खोलने वाली एक फिल्म मानती हैं।

‘‘मुझे पता है कि अधिकतर भारतीय इस फिल्म को पसंद नहीं करते हैं और वे इसे देश का अपमान करने वाली समझते हैं। ऐसे में जब मैंने अपने काम के प्रति भी कई लोगों का ऐसा ही कुछ रवैया देखा तो कई दूसरे अन्य देशों के ऐसे ही लोगों की पीड़ा की तरफ मेरी आंखें खुली और इसलिये इस फिल्म की पजह से मुझे एक माध्यम मिला। यह देखना बहुत दुखदायी होता है कि अधिकतर अमेरिकी ‘वास्तविक गरीबी’ के बारे में अनभिज्ञ ही बड़े होते हैं।’’

एक फिल्म को देखने के बाद तीसरी दुनिया को बचाने के लिये आगे आना बहुत हद तक अतिश्योक्ति नहीं लगता? ‘‘मैं कोई हीरो नहीं हूँ। मैं तो सिर्फ धन और संरचना प्रदान करने में मदद कर रही हूँ और असली नायक तो वे महिलाएं हैं जो घरों से बाहर निकलकर इस चुनौतीपूर्ण काम को प्रतिदिन सफलतापूर्वक कर रही हैं। विशेष रूप ये लड़कियों के मामले में यौवनावस्था ही दहलीज पर पहुंचने के बाद स्वच्छता के प्रति जागरुकता बहुत आवश्यक हो जाती है और मैं कभी भी ‘वह गोरी लड़की’ नहीं बनना चाहती थी जो झुग्गियों में जाए और उन बच्चों से कहे कि तुम गंदे हो और जैसे मेरे देश में काम होते हैं तुम भी वैसे ही करो।’’

‘सुदरा’ का लक्ष्य अगले वर्ष तक मुंबई के 25 से 30 होटलों तक अपना विस्तार करने का है। ये अन्य शहरों में भी विस्तार की योजनाएं बना रहे हैं और साबुन के पुर्नचक्रण में रुचि रखने वाले लोगों और एनजीओ की तलाश में हैं।


सलाह

इरीन के लिये एक उद्यमी का चोला पहनने से पहले अपने आत्मसंदेह पर काबू पाना एक बड़ी चुनौती था। और इसीलिये वे दूसरे लोगों को बेशर्मी के साथ दूसरों की सहायता लेने के लिये प्रेरित करते हुए कहती हैं, ‘‘सबसे बुरा क्या हो सकता है?’’ वे आगे कहती हैं, ‘‘इस दुनिया को टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलने वाले अधिक लोगों की जरूरत है और आप उनमें से एक क्यों नहीं हो सकते? अगर आप ऐसा करने में सफल होते हैं तो यह आपके लिये और भी अच्छा होगा।’’

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Worked with Media barons like TEHELKA, TIMES NOW & NDTV. Presently working as freelance writer, translator, voice over artist. Writing is my passion.

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