दिल्ली में कामकाजी लोगों का थियेटर से जुड़ने का सपना पूरा करता ‘अंतराल’

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कामकाजी लोग और विद्यार्थी जुड़े हैं दिल्ली के अंतराल नाटक समूह से...

2007 में शुरूआत हुई अंतराल थियेटर ग्रुप की...

हर रविवार तीन घंटे की वर्कशॉप होती है और दो से तीन महीने में एक नाटक तैयार कर लिया जाता है...

शहरों के व्यस्‍त जीवन में किसी डॉक्टर, सरकारी कर्मचारी, आईटी कंपनी के प्रबंधक या विद्यार्थी के पास अपनी ‘कला’ के शौक को पूरा करने का वक्त ही कहां होता है। इस भागती-दौड़ती जिंदगी में सपने, सिर्फ सपने ही रह जाते हैं। ऐसे में दिल्ली का एक थियेटर ग्रुप ‘अंतराल’ कामकाजी लोगों और विद्यार्थियों के नाटक में काम करने के सपनों को पूरा कर रहा है। थियेटर ग्रुप से जुड़े लोग हर रविवार को तीन घंटे की वर्कशॉप करते हैं और दो से तीन महीने में एक नाटक तैयार कर लिया जाता है।

अंतराल के सदस्‍य 'कौआ चला हंस की चाल' नाटक का मंचन करते हुए
अंतराल के सदस्‍य 'कौआ चला हंस की चाल' नाटक का मंचन करते हुए

दो जुड़वा भाइयों अकबर और आजम कादरी ने वर्ष 2007 में थियेटर ग्रुप अंतराल की शुरुआत की थी। अकबर ने योरस्टोरी को बताया-

"हमारे जैसे थियेटर से प्यार करने वाले लोग नौकरी या पेशेवर मजबूरियों के कारण इससे दूर हो रहे थे। हमने थियेटर से लगाव रखने वाले लोगों को इकट्ठा कर अंतराल की शुरुआत की।" 

थियेटर के निर्देशक फहाद खान ने योरस्टोरी के साथ बातचीत में बताया-

"शुरुआत में हमें काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा। इनमें सबसे बड़ी परेशानी पेशेवर लोगों से अभिनय कराने की थी। इसके बाद उनके हिसाब से वर्कशॉप और प्रैक्टिस का समय तय करना था क्योंकि रविवार को छुट्टी होने के बावजूद लोगों के पास घर के काम भी होते हैं। इसका हल हमने रविवार की शाम को वर्कशॉप का समय तय करके किया। फिलहाल अंतराल में करीब 35 सदस्य हैं, जो अलग-अलग क्षेत्र से हैं। इनमें चार डॉक्टर, आठ व्यवसायी, चार सरकारी कर्मचारी, नौ आईटी कंपनी में करने वाले और बाकी विद्यार्थी हैं।"
'जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई' नाटक का एक दृश्‍य
'जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई' नाटक का एक दृश्‍य

फहाद ने बताया कि उनके यहां ऐसा नहीं है कि अभिनेता दूसरा कोई काम नहीं करेगा। कई बार तो ऐसा होता है कि पिछले नाटक में प्रमुख भूमिका निभाने वाला व्यक्ति अगले नाटक में बैकस्टेज संभाल रहा होता है या लाइटिंग का काम कर रहा होता है। उनके मुताबिक "शुरुआत से ही हमारे ग्रुप को दर्शकों का भी भरपूर प्यार मिलता रहा है। हम दो से तीन महीने में आईआईटी, दिल्ली में अपने नाटकों का मंचन करते रहते हैं और हर बार ऑडिटोरियम खचाखच भरा होता है।"

'द सिडक्‍शन' नाटक में अभिनय करते फहाद खान (दाएं)।
'द सिडक्‍शन' नाटक में अभिनय करते फहाद खान (दाएं)।

फ्रीलांस फोटोग्राफर रोहित जैन ने बताया कि "थियेटर मेरा जुनून है, लेकिन समय की कमी की वजह से मैं इससे दूर हो रहा था। ऐसे में मुझे अंतराल के रूप में एक ऐसा समूह मिला जो मेरे इस जुनून को पूरा करने का मौका दे रहा है।" रोहित बताते हैं कि "शुरुआत में मैंने बैकस्टेज का काम सीखा और फिर अभिनय में भी हाथ आजमाया। अब तक मैं कई नाटकों में काम कर चुका हूं।" इसी तरह ‘चैनपुर की दास्तान’ नाटक में प्रमुख किरदार निभाने वाले राम सरजल ने बताया कि "पहले मैं सोचता था कि मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों के सपने कभी पूरे नहीं होते, लेकिन अंतराल से जुड़ने के बाद मेरी सोच में बदलाव आया है।" राष्ट्रीय फैशन टेक्नोलॉजी संस्थान (निफ्ट) से डिजाइनिंग का कोर्स करने वाले राम का अभिनय करने का सपना यहीं आकर पूरा हुआ। उन्होंने ‘चैनपुर की दास्तान’ के अलावा भी कई नाटकों में अभिनय किया है।

'जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई' नाटक का एक दृश्‍य
'जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई' नाटक का एक दृश्‍य

हरफनमौला हैं अंतराल के सदस्य

फहाद ने बताया कि अंतराल के हर सदस्य को थियेटर से संबंधित हर विधा सिखायी जाती है। यहां अभिनय के अलावा लेखन, निर्देशन, लाइटिंग, स्टेज के पीछे का काम आदि कराना होता है। यहां हर सदस्य हरफनमौला होता है। फहाद का कहना है कि "कौन, किस विधा को पहले सीखना चाहता है, यह हर सदस्य पर निर्भर करता है। मैंने कई बिलकुल नए लोगों को उनकी प्रतिभा को देखते हुए सीधे नाटक में अभिनय कराया है और उन्होंने मुझे निराश भी नहीं किया है। कुछ हमारे सदस्य ऐसे भी हैं जो अभिनय से पहले लेखन, निर्देशन आदि बेहतर करना चाहते हैं।"

100 रुपये में ड्रामा का मजा

फहाद का कहना है कि लोग फिल्म देखने के लिए तो 200 से 800 रुपये तक खर्च कर सकते हैं, लेकिन ड्रामा देखने के लिए उन्हें मुफ्त के पास चाहिए होते हैं। बिना पैसे खर्च किए लोग किसी भी काम को गंभीरता से नहीं लेते हैं। इसलिए हमने अपने हर नाटक के लिए कम से कम 100 रुपये का टिकट रखा है। इससे लोगों की जेब पर भार भी नहीं पड़ता है और वे नाटक का भी आनंद लेते पाते हैं।

प्रमुख नाटक

मौसम को न जाने क्या हो गया, उड़ने को आकाश चाहिए, 'जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई', एक और द्रोणाचार्य, जाति ही पूछो साधू की, जंगली जानवर, फ्यूचर बाजार, एक कहानी, चैनपुर की दास्तान, कौआ चला हंस की चाल, द सिडक्‍शन आदि।