मनचलों को सबक सिखाने के लिए चार युवाओं की टीम लड़कियों को दे रही ट्रेनिंग

'पिंक शील्ड' की मदद से लड़कियां ले रही हैं सेल्फ डिफेंस के ट्रेनिंग...

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आज के अत्याधुनिक हो रहे समाज में कई सारे सकारात्मक बदलाव जरूर आ रहे हैं, लेकिन महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति जस की तस बनी हुई है। घर से बाहर निकलने पर छेड़खानी और रेप की घटनाएं जैसे आम हो गई हैं। पुलिस प्रशासन का रवैया भी एक हद के बाद इसे रोकने में नाकाम साबित हुआ है। इसी वजह से लड़कियों और महिलाओं को आत्मरक्षा के लिए ट्रेनिंग लेने को प्रोत्साहित किया जाता है। केरल के कोच्चि में एक ऐसा ही कैंपेन शुरू हुआ है जिसका नाम है 'पिंक शील्ड'...

ट्रेनिंग प्राप्त करती लड़कियां (फोटो साभार- डीसी)
ट्रेनिंग प्राप्त करती लड़कियां (फोटो साभार- डीसी)
'पिंक शील्ड' की टीम पहले कलारी में ही ट्रेनिंग सेशन का आयोजन करती थी, लेकिन उसमें लड़कियों का काफी समय आने और जाने में खर्च हो जाता था इसलिए अब लड़कियों को उनकी जगह पर जाकर ही इसे सिखाने का लक्ष्य रखा गया है। ये सभी स्कूल और कॉलेजों में जाते हैं और वहां कैंप लगाकर महिलाओं को आत्मरक्षा की तकनीक से रूबरू कराते हैं। इनका मकसद लड़कियों को किसी भी चुनौती से निपटने के लिए शारीरिक रूप से सक्षम बनाना है।

आज के अत्याधुनिक हो रहे समाज में कई सारे सकारात्मक बदलाव जरूर आ रहे हैं, लेकिन महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति जस की तस बनी हुई है। घर से बाहर निकलने पर छेड़खानी और रेप की घटनाएं जैसे आम हो गई हैं। पुलिस प्रशासन का रवैया भी एक हद के बाद इसे रोकने में नाकाम साबित हुआ है। इसी वजह से लड़कियों और महिलाओं को आत्मरक्षा के लिए ट्रेनिंग लेने को प्रोत्साहित किया जाता है। केरल के कोच्चि में एक ऐसा ही कैंपेन शुरू हुआ है जिसका नाम है 'पिंक शील्ड'। कोच्चि की लुबैना कलारी संगम ने इसकी शुरुआत की है। वह लड़कियों को आत्मरक्षा के गुर सिखा रही हैं।

'पिंक शील्ड' की टीम में चार सदक्य हैं- अब्दुल जलील गुरुक्कल, मुजीब रहमान, कैप्टन विनीद विन्सेंट और शिरीन सुजैन। ये सभी स्कूल और कॉलेजों में जाते हैं और वहां कैंप लगाकर महिलाओं को आत्मरक्षा की तकनीक से रूबरू कराते हैं। इनका मकसद लड़कियों को किसी भी चुनौती से निपटने के लिए शारीरिक रूप से सक्षम बनाना है। विनीद ने डेक्कन क्रॉनिकल से बात करते हुए कहा, 'हमारा मकसद महिलाओं के भीतर वह ज्वाला पैदा करना है जिससे वे सबल बन सकें और उन्हें बुरे लोगों से निपटने के लिए किसी की मदद की जरूरत न पड़े।'

पहले ये टीम कलारी में ही ट्रेनिंग सेशन का आयोजन करती थी, लेकिन उसमें लड़कियों का काफी समय आने और जाने में खर्च हो जाता था इसलिए अब लड़कियों को उनकी जगह पर जाकर ही इसे सिखाने का लक्ष्य रखा गया है। सबसे पहले उन्होंने दक्षिणी एर्णाकुलम के सरकारी कन्या पाठशाला से संपर्क साधा था। इससे उन्हें काफी प्रोत्साहन मिला। विनीद ने बताया, 'हम यह देखकर चौंक गए थे कि हमारे आस पास की लड़कियों को आत्मरक्षा करने की बुनियादी चीजें ही नहीं पता थीं। उन्हें नहीं पता था कि ऐसी किसी समस्या के आ जाने के बाद कैसे अपना बचाव करना है।'

ट्रेनिंग प्राप्त करतीं लड़कियां
ट्रेनिंग प्राप्त करतीं लड़कियां

पहले इस टीम ने लड़कियों को आत्मरक्षा की बुनियादी चीजें बताईं। हालांकि उनका लक्ष्य उन्हें मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग के लिए प्रोत्साहित करना है। पिछले साल जुलाई में शुरू हुए इस अभियान ने अब तक 8 से भी ज्यादा सरकारी संस्थानों को कवर किया था। वे तीन घंटे की क्लास में लड़कियों की तीन जिज्ञासाओं का समाधान करते हैं। जिनमें पहला होता है, सेल्फ डिफेंस क्या है? दूसरा लड़कियों को क्यों इसे सीखने की जरूरत है और तीसरा इसे कैसे कर सकते हैं। विनीद बताते हैं कि लड़कियों को पता ही नहीं होता कि सेल्फ डिफेंस क्या है। उनके भीतर डर भी होता है, जिसे दूर करने का प्रयास किया जाता है।

टीम लड़कियों को प्रशिक्षित करती है कि अगर कोई उन्हें पीछे से पकड़ लेगा तो वे कैसे उससे खुद को छुड़ाएंगी। शुरू में तो लड़कियां झिझकती हैं, लेकिन बाद में वे काफी सामान्य हो जाती हैं और बढ़ चढ़कर इसमें प्रतिभाग करती हैं। हालांकि सेशन छोटा ही होता है, क्योंकि ज्यादा लंबे समय तक ट्रेनिंग चलने पर प्रतिभागियों की रुचि भी खत्म हो सकती है। एक बार ट्रेनिंग देने के बाद लड़कियों को उसे कम से कम 21 दिन का अभ्यास भी करने को कहा जाता है। इस अभियान ने इतनी लोकप्रियता बटोर ली है कि एर्णाकुलम के बाहर से भी उन्हें बुलाया जा रहा है। लेकिन टीम के पास संसाधन और लोगों की कमी होने के कारण वे अभी बाहर नहीं जा पा रहे हैं।

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