बिहार सरकार का शादी का 'आठवां वचन'

अब बिहार में आठवें वचन के विधि-विधान पर बहस चल पड़ी है। आठवें वचन के तहत शपथ पत्र भरना होगा कि ये बाल विवाह नहीं है और दहेज नहीं लिया गया है। 

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बाल विवाह और दहेज जैसी कुप्रथाओं को लेकर कानून तो पहले से ही हैं लेकिन इन्हें धता बताने वालों की कमी नहीं है। बिहार में आज भी कुल शादियों में से करीब 40 फीसदी बाल विवाह होते हैं। दहेज हत्याओं में भी यह प्रदेश दूसरे नंबर पर शुमार है। अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आह्वान पर सूबे में बाल विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है।

साभार: मलयालम ब्रेकिंग
साभार: मलयालम ब्रेकिंग
अभी तक पारंपरिक हिंदू विवाह में सात वचन, सात फेरे होते थे। अब बिहार में आठवें वचन के विधि-विधान पर बहस चल पड़ी है। आठवें वचन के तहत शपथ पत्र भरना होगा कि ये बाल विवाह नहीं है और दहेज नहीं लिया गया है। 

बिहार सरकार ने शपथ पत्र भरवाने की जिम्मेदारी मैरेज हॉले के मत्थे सौंप दी है। सरकार के नए आदेश के तहत बिना शपथ पत्र भरे मैरिज हॉल की बुकिंग नहीं की जा सकती। गांधी जयंती पर मुख्यमंत्री प्रदेश के सभी स्कूल-कॉलेजों एवं सरकारी दफ्तरों में दहेज न लेने-देने की शपथ दिला चुके हैं। 

बाल विवाह और दहेज जैसी कुप्रथाओं को लेकर कानून तो पहले से ही हैं लेकिन इन्हें धता बताने वालों की कमी नहीं है। बिहार में आज भी कुल शादियों में से करीब 40 फीसदी बाल विवाह होते हैं। दहेज हत्याओं में भी यह प्रदेश दूसरे नंबर पर शुमार है। अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आह्वान पर सूबे में बाल विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है। अभी तक पारंपरिक हिंदू विवाह में सात वचन, सात फेरे होते थे। अब बिहार में आठवें वचन के विधि-विधान पर बहस चल पड़ी है। आठवें वचन के तहत शपथ पत्र भरना होगा कि ये बाल विवाह नहीं है और दहेज नहीं लिया गया है। 

बिहार सरकार ने शपथ पत्र भरवाने की जिम्मेदारी मैरेज हॉले के मत्थे सौंप दी है। सरकार के नए आदेश के तहत बिना शपथ पत्र भरे मैरिज हॉल की बुकिंग नहीं की जा सकती। गांधी जयंती पर मुख्यमंत्री प्रदेश के सभी स्कूल-कॉलेजों एवं सरकारी दफ्तरों में दहेज न लेने-देने की शपथ दिला चुके हैं। वह ये भी घोषणा कर चुके हैं कि अगर किसी शादी में दहेज का लेन-देन हुआ तो उसका बहिष्कार किया जाएगा। सरकार चाहती है कि जिस दिन शादी हो, उसी दिन ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करा दिया जाए। इस मंशा को अंजाम तक पहुंचाने में राज्य के अधिकारी जुट गए हैं। अभियान की कामयाबी के लिए अगले साल 21 जनवरी 2018 को प्रदेश सरकार की ओर से मानव श्रृंखला बनाने की तिथि भी निर्धारित हो चुकी है।

यूनिसेफ़ की एक सर्वे रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि देश में विवाह की औसत उम्र तो धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन बाल विवाह की कुप्रथा अब भी बड़े पैमाने पर प्रचलित है। औसतन 46 फ़ीसदी महिलाओं का विवाह 18 वर्ष होने से पहले ही कर दिया जा रहा है, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह औसत 55 फ़ीसदी है। देश में 18 वर्ष से कम उम्र के 64 लाख लड़के-लड़कियां सर्वे में विवाहित पाए गए। कुल मिलाकर विवाह योग्य क़ानूनी उम्र से कम से एक करोड़ 18 लाख लोग विवाहित मिले। इनमें से 18 वर्ष से कम उम्र की एक लाख 30 हज़ार लड़कियां विधवा, 24 हज़ार लड़कियां तलाक़शुदा या पतियों द्वारा छोड़ी जा चुकी थीं। यही नहीं 21 वर्ष से कम उम्र के क़रीब 90 हज़ार लड़के विधुर और 75 हज़ार तलाक़शुदा थे। राजस्थान इन हालातों में सबसे आगे पाया गया। इस राज्य में बाल विवाह की कुप्रथा सदियों से चली आ रही है। राज्य की 5.6 फ़ीसदी नाबालिग आबादी विवाहित होती है। इसके बाद मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा, गोवा, हिमाचल प्रदेश और केरल के नंबर आते हैं।

मीडिया स्टडीज ग्रुप के चेयरमैन अनिल चमड़िया बिहार सरकार की बाल विवाह और दहेज विरोधी अभियान पर सवाल खड़े करते हुए लिखते हैं कि इस अभियान में सफलता का दावा केवल कानून का सख्ती से पालन करके नहीं किया जा सकता है। दोनों ही समस्याओं की एक वजह परिवार का परंपरागत ढांचा हैं। परिवार के मुखिया के हाथों में अपने लड़के-लड़कियों के बारे में हर किस्म का फैसला नियंत्रित होता है। कुरीतियों से दूर रहकर लड़के-लड़कियां भी जब अपनी दहेज मुक्त शादी के फैसले करते हैं तो उन्हें रोकने की हर संभव कोशिश होती है। सामाजिक माहौल उनके पक्ष में नहीं होता है। पुलिस भी इस मामले में कुख्यात है। उनका समर्थन करने वाले भी परेशान और असुरक्षित रहते हैं। 

कई एक बार शादियां मजबूरन आखिरकार आर्य समाज मंदिरों में करनी पड़ती हैं। बेहतर तो होता कि सरकार की कोई ऐसी संस्था होती, जिससे कि शादी के स्वतः फैसले करने वाले लड़के-लड़कियों को संरक्षण मिलता। सिर्फ शादी के प्रमाण पत्र और उसकी कानूनी मान्यता के लिए आर्य समाज मंदिर की शरण में जाना पड़ता है। ऐसे ज्यादातर लड़के-लड़कियां दहेज मुक्त शादियों के फैसले करते हैं लेकिन उन्हें किसी सरकारी संस्था से कानूनी संरक्षण नहीं मिलता है बल्कि सरकारी दमन का डर ज्यादा रहता है। क्या रजिस्ट्री कार्यालयों की तरह शादियों के लिए भी पंजीकरण की व्यवस्था शासक नहीं कर सकते हैं? रजिस्ट्रार के सामने शादी की शपथ लेनी हो और वह इस तरह की शादियों के विपरीत ख्याल का हो तो उन लड़के-लड़कियों को कैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। 

आमतौर पर ये पाया जाता है कि ऐसे अधिकारी मानवीय संवदेनाओं से दूर पाए गए हैं। उनके चेहरों पर डराने की हद तक भोथरापन नजर आता है। इसलिए अभियान चलाने से पहले जरूरी है, शादी करने का फैसला लेने वाले लड़के-लड़कियों के लिए सरकारी मशीनरी में व्यापक स्तर पर सुधार। उन्हें प्रशिक्षित करने का इंतजाम होना चाहिए। सदियों पुरानी रूढ़ियों को तोड़ने वाली नई पीढ़ी को प्रोत्साहित करने का कार्यक्रम नहीं हो तो दहेज मुक्त और बाल विवाह मुक्त क्षेत्र बनाने की कल्पना कोरी बकवास होगी। आपके दहेज मुक्त और बाल विवाह के अभियान की भाषा नई पीढ़ी को नहीं, केवल परिवार के मुखियाओं को संबोधित करने वाली है। 

संसदीय राजनीति एक तरफ शराब से नुकसान का प्रचार करती है, दूसरी तरफ सरकारी कोष के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसे की उगाही। आदर्श समाज व्यवस्था के लिए ऐसा कैसे चलेगा। यह राजनीति एक ओर मंचों पर जाति विरोधी नारे लगाती है, दूसरी तरफ टिकट बंटवारे के समय वही सबसे ज्यादा जात-पांत को बढ़ावा देती है। ऐसे में अंतरजातीय विवाह के लिए मानव श्रृंखला अभियान के सफल होने की कोई कल्पना भी कैसे कर सकता हैं?

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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