पंद्रह हजार की नौकरी छोड़ हर माह डेढ़ लाख की कमाई

कचरे से बनाए जा रहेे हैं पैसे...

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बिहार और झारखंड में इन दिनो बड़ी संख्या में महिलाएं समूह बनाकर भारी मात्रा में वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने के बाद खुद ही बिक्री भी कर रही हैं। ऐसे-ऐसे छोटे-छोटे कारखाने खुलने लगे हैं, जिनमें किसी-किसी का सालाना टर्न ओवर लगभग एक करोड़ तक पहुंच चुका है। हर महीने डेढ़-पौने दो लाख रुपए तक कमाई हो रही है।

‘प्रोजेक्ट धरा’ नाम से संचालित जीसस एंड मैरी कॉलेज की इस कैम्पस संस्था से जुड़ी पैंतालीस छात्राएं बेरोजगार महिलाओं को काम देने लगी हैं। कॉलेज के कचरे को वर्मी कम्पोस्ट में तब्दील कर दिया जा रहा है। दो-ढाई सप्ताह में ही में वर्मी कम्पोस्ट तैयार हो जा रही है। 

बिहार शरीफ के कृषि स्नातक कुमार पुरुषोत्तम वर्मीकम्पोस्ट खाद बनाकर हर महीने लाखों रुपए कमा रहे हैं तो यह धंधा उच्च शिक्षा लेकर नौकरियों के लिए मारे-मारे फिर रहे अन्य लोगों के लिए भी कोई खास मुश्किल नहीं है। वर्मीकम्पोस्ट पर तरह-तरह के प्रयोग भी हो रहे हैं। उज्जैन (म.प्र.) की क्षिप्रा विहार वन रोपणी में विलुप्तप्राय 40 प्रजातियों बीजा, हल्दू, हिंतसा, अंजल, धावड़ा, कुलक, हर्र-बहेड़ा, पाकर आदि के पौधों के साथ विशिष्ट पद्धति से विश्व स्तरीय वर्मी कम्पोस्ट खाद तैयार की जा रही है। इस विधि में केंचुओं के अलावा 40 प्रतिशत गोबर और 60 प्रतिशत विभिन्न वनस्पतियों गाजर घास, सोयाबीन, भूसा, केसिया, सायमा आदि के पत्तों और फूलों को आपस में मिला दिया जाता है। इसके बाद इसमें एक विशेष बॉयो डायजेस्टिक बैक्टीरिया डाला जाता है, जो मात्र 30 दिन में ही खाद तैयार कर देता है।

स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, भोपाल के परीक्षण में यह उत्कृष्ट जैविक खाद प्रमाणित हो चुकी है। आज से लगभग उन्नीस साल पहले कुमार पुरुषोत्तम जब इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से उच्चशिक्षा लेने के बाद रोजी-रोजगार की तलाश में निकले तो उन्हें एक स्वयंसेवी संगठन में मिली मात्र पंद्रह हजार की नौकरी। इतने कम पैसे से घर-परिवार तो चलने से रहा। उन्हें किसी दूसरे काम की तलब लगी रही। वह खूब पढ़े-लिखे थे ही लेकिन ऊंचे वेतन वाली नौकरी मिलना भी आज के जमाने में कत्तई आसान नहीं। उस पंद्रह हजार की नौकरी में कुमार पुरुषोत्तम को एक फायदा जरूर हुआ कि वह आगे की राह तलाशने के हुनर से लैस हो गए। यानी समझ में आ गया कि अब उन्हें अपना आगे करियर किस तरह बनाना है।

इसी तरह का प्रयास दिल्ली में कॉलेज की लड़कियों और महिलाओं की सामूहिक भागीदारी से चल निकला है। ‘प्रोजेक्ट धरा’ नाम से संचालित जीसस एंड मैरी कॉलेज की इस कैम्पस संस्था से जुड़ी पैंतालीस छात्राएं बेरोजगार महिलाओं को काम देने लगी हैं। कॉलेज के कचरे को वर्मी कम्पोस्ट में तब्दील कर दिया जा रहा है। दो-ढाई सप्ताह में ही में वर्मी कम्पोस्ट तैयार हो जा रही है। इससे राजधानी के विवेकानंद स्लम इलाके की महिलाएं आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो रही हैं। दो-दो किलो के पैकेट सौ-सौ रुपए में बिक रहे हैं। काम की शुरुआत में पहली ही बार जब हर महिला को छह-छह हजार रुपए मिले तो उनके चेहरों पर मुस्कान बिखर गई।

कुमार पुरुषोत्तम को लगा कि लागत और कमाई, दोनो की दृष्टि से एक काम जो उनके लिए सबसे मुफीद रहेगा, वह उर्वरक बनाना। जैविक खेती फैलती जा रही है। उसमें सबसे बड़ी मुश्किल घरेलू खाद की ही रहती है, तो फिर क्यों न वह इसी काम में अपनी किस्मत आजमाएं। इसके लिए सबसे पहले जरूरी था प्रशिक्षण, फिर लागत के लिए पूंजी। इधर-उधर से वह जानकारी करने लगेझारखंड में एग्री क्लिनिक एंड एग्री बिजनेस सेंटर्स कि अपने काम की शुरुआत से पहले क्या करें। तभी पता चला कि इस काम का प्रशिक्षण देता है। यह बात है वर्ष 2006-07 की। उन्होंने सेंटर से संपर्क किया। उसके बाद वहां से दो महीने वर्मी कम्पोस्ट बनाने का प्रशिक्षण लिया। इस दौरान अपने उत्पाद के प्रबंधन और बाजार की बारीकियां भी उन्होंने सीख लीं। अब उन्हें पैसे की जरूरत थी ताकि बिजनेस खड़ा कर सकें। जोड़-जुगाड़ कोशिश से उन्हें सब्सिडी के साथ बीस लाख रुपए लोन के मिल गए। इसके बाद वह रांची में ही वर्मी कम्पोस्ट बनाने लगे।

गोबर में सड़े हुए पत्ते और केंचुए मिलाकर उनके यहां वर्मीकम्पोस्ट तैयार की जा रही है। इन दिनो उनके ढाई-तीन सौ टन वर्मी कम्पोस्ट हर साल तैयार हो जाती है। प्रोडक्शन मशीन की यूनिट का विस्तार कर उनका लक्ष्य पांच सौ टन सालाना का है। अपनी सफलता से उत्साहित कुमार पुरुषोत्तम सैकड़ों अन्य लोगों को भी ऐसी फैक्ट्रियां लगवा चुके हैं। उनकी अपनी कंपनी का सालाना टर्न ओवर लगभग नब्बे लाख रुपए तक पहुंच चुका है। लागत घटाकर उन्हें हर महीने डेढ़-पौने दो लाख की कमाई होने लगी है। कहां पंद्रह हजार की नौकरी, कहां पौने दो लाख महीने। जमीन-आसमान का अंतर। उनकी जिंदगी में तो बहार लौट आई है। उनका कारोबार दिनोदिन बढ़ता ही जा रहा है। जितना प्रोडक्शन वह कर पा रहे हैं, उससे कहीं बहुत ज्यादा उसकी मांग है।

उल्लेखनीय है कि जैविक खाद के उपयोग करने से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है। जमीन की जल-वहन क्षमता बढ़ती जाती है। भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम हो जाता है। इसके साथ ही उपजाऊ क्षमता भी बढ़ जाती है। सिंचाई अन्तराल में भी वृद्धि होती रहती है, वहीं रासायनिक खाद पर निर्भरता कम हो जाती है। फसलों की उत्पादकता में वृद्धि होती है। इससे भूजल स्तर में वृद्धि हो जाती है। मिट्टी, खाद्य पदार्थ और जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषणों में भी काफी कमी आ जाती है। बिहार की महिलाएँ बड़े पैमाने पर वर्मी कम्पोस्ट बना ही नहीं रही हैं, बल्कि वह किसानों तक उसे खुद पहुँचा भी रही हैं। सरकार भी उन्हें प्रोत्साहित कर रही है। श्री विधि तकनीक से 'जीविका' उन्हें वर्मी कम्पोस्ट तैयार करना सिखा भी रही है।

इस वक्त सैकड़ों महिलाएं समूह बनाकर इसी काम में जुटी हुई हैं। उनको एक किट ढाई सौ रुपए में और दलिसिंह सराय से केंचुए मिल जाते हैं। एक किट से एक बार में करीब 20 क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट तैयार हो जाती है, जो दस रुपए प्रतिकिलो बिक जा रही है। कई एक महिलाएं कई-कई किट एक साथ लेकर सौ-सौ क्विंटल तक वर्मी कम्पोस्ट बनाकर बेच रही हैं। गाँव में इसकी अच्छी-खासी खपत हो रही है। रासायनिक खाद का प्रयोग घटने लगा है। इस खाद से अच्छी फसल प्राप्त हो रही है। बड़ी बात ये कि जैविक रूप से उपजाए उत्पाद की बाजार में उंची कीमत मिलती है। ज्यादातर वर्मी कम्पोस्ट की बिक्री ग्रामीण संगठनों के स्तर पर ही हो जा रही है। ग्राम संगठन भी इनकी मदद कर रहे हैं। वह इनसे उचित मूल्य पर जैविक खाद खरीद लेते हैं। इसके बाद उसे दूसरे संगठनों को बेच दे रहे हैं। बिक्री के ऑर्डर लेने से लेकर जैविक खाद की आपूर्ति तक, हर काम को स्वयं ये महिलाएं संभाल रही हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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