चाय दुकानदार की बेटी को अमेरिका से मिली 3.8 करोड़ की स्कॉलरशिप

जिसके पिता चाय बेचकर चलाते थे घर, वो अब पढ़ेगी अमेरिका में...

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चाय बेचकर घर चलाने वाले गरीब पिता जितेंद्र भाटी की होनहार बिटिया सुदीक्षा ने सीबीएससी इंटरमीडिएट बोर्ड में पूरे जिले में टॉप तो किया ही, अब आगे की पढ़ाई के लिए उनको अमेरिका से 3.8 करोड़ रुपये की स्कॉलरशिप का ऑफर मिला है। वह अगस्त में अमेरिका चली जाएंगी। इन दिनो वह अमेरिकी वीजा का इंतजार कर रही हैं।

एक तरफ वह अपनी पढ़ाई में जूझती रहीं, दूसरी तरफ पिता ने भागदौड़ कर जैसे-तैसे उनकी आगे की पढ़ाई जारी रखने की राह तलाश ली और उनका स्‍कूल जाना नहीं छूटा। 

एक तरफ हमारे देश में करोड़ों की सरकारी छात्रवृत्तियां हड़प लेने के मामले आए दिन सामने आते रहते है, शिक्षा माफिया, दलालों की घटिया हरकतों से तमाम प्रतिभाएं कुंठित हो रही हैं, छात्रवृति नहीं मिलने पर बच्चे प्रदर्शन तक कर रहे हैं लेकिन विदेशों में भारतीय प्रतिभाओं की इज्जत की बात ही कुछ और है। अब तो उन्हें स्कॉलरशिप के करोड़ों के पैकेज मिलने लगे हैं। ऐसी ही एक शीर्ष प्रतिभा हैं दादरी (उ.प्र.) के गांव धूम मानिकपुर की सुदीक्षा भाटी। उनके पिता जितेंद्र भाटी अपने गांव निकट हाइवे पर स्थित एक ढाबे पर चाय बेचते हैं। बमुश्किल उन्हें वहां से पांच-छह हजार रुपए एक महीने में मिल पाते हैं। उसी से उन्हें अपना पूरा परिवार चलाना होता है। अब उनके दिन बहुर गए हैं। इंटरमीडिएट की टॉपर बेटी सुदीक्षा को आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका से 3.8 करोड़ रुपये की स्कॉलरशिप का ऑफर मिला है। अब वह अमेरिका जाएंगी।

शुरुआत से ही सुदीक्षा का पढ़ाई में सख्त रुझान रहा। इस दौरान उनको अपने पापा और मम्मी से पूरा सपोर्ट किया। सुदीक्षा का पालन-पोषण पिता ने बड़ी फटेहाली में किया है। उनके घर की माली हालत बहुत खराब रही है। पढ़ाई में सुदीक्षा के तेज-तर्रार होने से अब इस घर को राह मिल गई है। सच है कि प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। समर्पण, मेहनत और लगन से किसी भी मंजिल को पाया जा सकता है। आर्थिक तंगी के बावजूद सुदीक्षा ने गांव के ही प्राथमिक विद्यालय से शुरुआती शिक्षा प्राप्त की। सुदीक्षा को पहले जवाहर नवोदय विद्यालय में दाखिला दिलाने की कोशिश हुई। नहीं मिला। फिर उन्होंने वर्ष 2009 में दुल्हेरा गांव के शिव नादर फाउंडेशन की विद्या ज्ञान लीडरशिप एकेडमी से अपनी हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी की।

आर्थिक स्थिति ठीक न होने से उस साल एक बार उनकी पढ़ाई छूटने तक की नौबत आ गई थी। पिता परेशान जरूर थे लेकिन वह किसी भी कीमत पर उनकी पढ़ाई रुकने नहीं देना चाहते थे। एक तरफ वह अपनी पढ़ाई में जूझती रहीं, दूसरी तरफ पिता ने भागदौड़ कर जैसे-तैसे उनकी आगे की पढ़ाई जारी रखने की राह तलाश ली और उनका स्‍कूल जाना नहीं छूटा। इस स्कूल से हजारों गरीब परिवारों के बच्चे एजुकेशन ले रहे हैं। विद्या ज्ञान लीडरशिप अकादमी आर्थिक रूप से पिछड़े प्रतिभाशाली छात्रों की मदद करती है। इसी संस्‍था ने पहली बार सुदीक्षा की प्रतिभा को पहचाना और उन्हे उड़ने के पंख दिए। सुदीक्षा के साथ-साथ यहां के तीन और छात्रों को इस संस्‍था से स्‍कॉलरशिप मिल चुकी है।

वर्ष 2011 से इस स्कूल की ओर से सुदीक्षा को जब फाइनेंशियल सपोर्ट मिलने लगा तो उनकी आगे की पढ़ाई चल पड़ी। वर्ष 2018 में सुदीक्षा ने सीबीएसई से इंटरमीडिएट बोर्ड एग्जाम में 98 फीसदी अंक हासिल किए। वह अपने जिले की टॉपर रहीं। उनको अंग्रेजी में 95, इतिहास में 100, राजनीति विज्ञान में 96, भूगोल में 99, अर्थशास्त्र में 100 अंक हासिल हुए। इसके बाद उनके स्कूल की ओर से स्कॉलरशिप के लिए अमेरिका में आवेदन किया गया। अब उनको अमेरिका के बॉबसन कॉलेज से आंत्रेप्रेन्यॉरशिप में चार साल के ग्रैजुएशन के लिए फुल टाइम स्कॉलरशिप मिली है। इससे उनके परिवार के लोग तो प्रसन्न हैं ही, उनके स्कूल की सहपाठी छात्राएं और टीचर भी उनकी लगन और मेहनत पर गर्व महसूस करने लगे हैं।

अपने गांव धूम मानिकपुर से बैबसॉन (अमेरिका) तक का सुदीक्षा का नया सफर किसी कहानी की तरह लगता है। अब उनको शायद ही कभी पीछे मुड़कर देखने की जरूरत पड़े। उनके संघर्ष से लड़कियों को बड़े सपने देखने की प्रेरणा मिलती है। वह अपने गांव की ऐसी पहली लड़की हैं, जिसे अमेरिका में पढ़ने का अवसर मिला है। सुदीक्षा का सपना है कि वह विदेश से पढ़ाई करके आईएएस बनें ताकि वह अपने परिवार के साथ-साथ देश की भी सेवा कर सकें। वह कहती हैं - उसका सपना सच हो रहा है। वह अगस्त में अमेरिका रवाना हो जाएंगी। उनकी कामयाबी इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है कि वह अत्यंत गरीब परिवार से आती हैं। यद्यपि पिता ने कभी भी अपनी गरीबी को उनकी पढ़ाई में आड़े नहीं आने दिया। उनके पैरंट्स हमेशा उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करते रहे हैं। इसी के चलते आज उनको इतना बड़ा अवसर मिला है।

सुदीक्षा कहती हैं कि बड़े सपने देखना और उसे हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करना कभी जीवन में अकारथ नहीं जाता है। सुदीक्षा दूसरे छात्रों से सिर्फ इतना कहना चाहती हैं कि कभी भी वह अपने सपने को पूरा करने के लिए मेहनत से जी न चुराएं। पहले मेरे लिए पढ़ाई कर सकने का सपना पूरा करना आसान नहीं था। उनके नाते-रिश्ते के लोग कहने लगे थे कि अब पढ़ाई रोककर उसका कहीं शादी-ब्याह कर दो। संयोग से ही उनको आगे की पढ़ाई के लिए वंचित समुदाय के बच्चों के बीच जगह मिली। स्कॉलरशिप मिलने से सबसे ज्यादा खुशी उनकी मां को है। उन्हें लगा है कि भगवान ने उनकी प्रार्थना सुन ली है। उनके पापा विदेश जाने को लेकर पहले कुछ सशंकित रहे लेकिन अब वह भी खूब खुश हैं। अब मुझे अमेरिका जाकर अपनी काबिलियत साबित करने का पूरा मौका मिलेगा। आगे की तैयारियों में जुटी सुदीक्षा इन दिनों अपने अमेरिकी वीजा का इंतजार कर रही हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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