मोदी ने इन्दिरा गांधी जैसी राजनीतिक चाल चलने की कोशिश की है, लेकिन नाकाम रहे हैं : आशुतोष 

नोटबंदी पर आम आदमी पार्टी के नेता और पूर्व संपादक/पत्रकार आशुतोष का ताज़ा लेख  

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80 से अधिक लोग मर चुके हैं, आम आदमी परेशान है, लोगों की परेशानियां लगातार बढ़ भी रही हैं, अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है, बैंकिंग व्यवस्था खत्म होने की कगार पर है, विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि भविष्य बेरंग नज़र आ रहा है और नोटबंदी से 'काला धन' मिलने की सम्भावना न के बराबर है, लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री न तो क्षमाप्रार्थी हैं और न ही विमुद्रीकरण के फैसले को वापस लेने के पक्ष में। नोटबंदी, मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल में अब तक का सबसे पेचीदा और पहेलियों से भरा फैसला है। यदि इस फैसले का मकसद काले धन और उससे जुड़ी दुनिया के लोगों का पर्दाफ़ाश करना है तो कम से कम अभी तक तो ऐसा होता दूर-दूर तक होता नज़र नहीं आ रहा है। ये सवाल उठने भी लाजमी हैं कि प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के लिए यही समय क्यों चुना? और, अगर उन्हें ये करना ही था तो यह सब तैयारी के बिना क्यों किया? इस बड़े काम के लिए कई कदम उठाये जाने ज़रूरी थे, मज़बूत योजना बनने की ज़रूरत थी, लेकिन एक महीने से अधिक समय बीत चुका है फिर भी कोई यह नहीं कह सकता कि नोटबंदी का काम सही तैयारी के साथ किया गया है। नोटबंदी की इस सारी प्रक्रिया से कोई फायदा होता नहीं दिख रहा है और ये काम सिर्फ दिखावा और पाखण्ड नज़र आ रहा है।

नोटबंदी के फैसले की टाइमिंग को लेकर बाज़ार में कई तरह की बातें की जा रही हैं। कई लोगों को इसमें साजिशों की गंध आ रही है। एक वर्ग यह कहता है कि मोदी ने दो बड़े औद्योगिक घरानों से बड़े पैमाने पर धन लिया है और बात को छुपाने के लिए यह कदम उठाया गया है। बड़ी राशि लेने वाली बात के जगजाहिर होने की शंका हुई तब मोदी ने नोटबंदी का ऐलान कर दिया। कुछ लोगों का ये भी कहना है कि नोटबंदी का फैसला उत्तरप्रदेश में होने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर लिया गया है। पिछले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और उसकी सहयोगी पार्टियों ने मिलकर 80 में से 73 सीटें जीती थीं। खुद मोदी वाराणसी से लड़कर लोकसभा पहुंचे थे। चूँकि अब भारतीय जनता पार्टी के हारने की आशंका है और हारने से मोदी की प्रतिष्ठा पर आंच आ सकती है, इसी वजह से नोटबंदी का फैसला लिया गया, ताकि कुछ हद तक पार्टी के जीतने की सम्भावना बने। विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक, मोदी जानते हैं कि वे अब तक के अपने कार्यकाल में अपने बड़े- बड़े वादों को पूरा करने में असमर्थ रहे हैं, इसी बात से लोगों का ध्यान हटाने और ये जताने कि अपने वादों को पूरा करने की उनकी कोशिशें जारी हैं उन्होंने नोटबंदी का फैसला लिया। मोदी ने पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान कई सभाओं में काले धन को वापस लाने की बात की थी। चुनाव के परिणाम देखकर यही लगा था कि लोगों ने मोदी की बातों पर यकीन कर उन्हें और उनकी पार्टी को वोट दिया है। लेकिन पिछले ढाई वर्षों में मोदी अपने वादों को पूरा नहीं कर पाए है, और इन वादों में काले धन को उजागर करने का वादा बड़ा वादा था। लोगों का विश्वास मोदी और उनकी बातों पर से उठने लगा था और ऐसी स्थिति में मोदी को कुछ ऐसा करने की ज़रुरत थी कि जिससे वे लोगों का भरोसा दुबारा जीत सकें। ऐसे स्थिति में उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया जिससे काला धन तो आता नज़र नहीं आ रहा है लेकिन लोगों की परेशानियां बढ़ रही हैं और कईयों की जान भी जा रही है। नोटबंदी पर एक वर्ग का ये भी कहना है कि अर्थव्यवस्था ठीक नहीं चल रही है और मोदी इसे ठीक करने में कामयाब होते भी नहीं दिख रहे हैं। 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के दौरान लोगों के सामने पेश करने के लिए मोदी के पास कोई भी बड़ी कामयाबी भी नहीं है। ऐसे में मोदी को लगा कि नोटबंदी से उन्हें लाखों करोड़ों का काला धन मिलेगा और वे इसे अलग-अलग योजानाओं के तहत लोगों में बाँट कर फिर से चुनाव जीतेंगे।

तरह-तरह के लोगों और अलग-अलग वर्गों की बातों को सुनने के बाद भी किसी नतीजे पर पहुंचना मुश्किल है। कोई भी पूरे विश्वास के साथ इस सवाल का जवाब नहीं दे सकता कि मोदी ने किस मकसद से नोटबंदी का फैसला लिया है। लेकिन एक बात तो तय है कि जिस तरह का साहस और ओज इन्दिरा गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन और प्रधानमंत्रित्व काल के शुरूआती दिनों में दिखाया था उसी तरह का साहस और उसी तरह की दिलेरी इन दिनों मोदी भी दिखा रहे हैं। इन्दिरा गांधी भी सोची-समझी रणनीति के तहत काम करती थीं। साहसी और बड़े फैसले लेती थीं। काफी निर्णायक होते थे उनके फैसले । मोदी भी कुछ ऐसे ही कर रहे हैं । दिलचस्प बात ये भी है कि जब इन्दिरा गांधी को काँग्रेस पार्टी ने 'प्रधानमंत्री' पद के लिए चुना तब राम मनोहर लोहिया जैसे विरोधियों ने ही नहीं बल्कि उन्हीं की पार्टी के कई दूसरे नेताओं ने उन्हें 'गूंगी गुड़िया' कहा। प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव एल के झा के मुताबिक “शुरूआत में इन्दिरा गांधी बेहद संकोची थीं और एक सांसद के तौर पर अक्षम भी।“ उन्हें इस वजह से प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया था क्योंकि वे नेहरु की बेटी थीं बल्कि उन्हें संसदीय दल का नेता इस वजह से चुना गया था क्योंकि वे क्षेत्रीय छत्रपों की बात सुनेंगी और उनके नियंत्रण में रहेंगी। लेकिन, मोदी की मौजूदा हालत इंदिरा गांधी जैसी नहीं है, न ही उन्हें ऐसी कोई परेशानी है जैसी इंदिरा गांधी को शुरूआती दिनों में थी। मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तभी से एक नेता के तौर पर उनकी ख़ास पहचान रही है। नेता के तौर पर वे काफी मजबूत और ताकतवर भी रहे हैं। अपनी पार्टी के कुछ बड़े नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक वर्ग के विरोध के बावजूद मोदी को 2014 के चुनाव के लिए बीजेपी की ओर से प्रधानमन्त्री का उम्मीदवार बनाया गया। मोदी के बारे में ये कहा जाता है कि वे विपरीत परिस्थितियों में लड़ाई करना पसंद करते हैं। उन्हें चुनौतियां का सामना करने में मज़ा आता है। वे इंदिरा गांधी की तरह न कभी 'गूंगी गुड़िया' की तरह रहे हैं और शायद रहेंगे भी नहीं। मोदी बड़े फैसले लेने वाले बड़े नेता हैं। वे एक ऐसे नेता भी हैं जो कभी कईयों की नज़र में राजनीति के सबसे बड़े खलनायक थे। एक समय ऐसा भी था जब कई देशों ने उन्हें वीसा देने से भी साफ़ इनकार कर दिया था। लेकिन, मोदी ने अपनी खलनायक वाली छवि को नायक वाली छवि में बदला। काम आसान नहीं था, लेकिन मोदी ने लोगों के बीच 'विकास-पुरुष' वाली छवि बनाई। प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी का काम शानदार है लेकिन नि:संदेह वे बतौर प्रधानमंत्री दूसरी पारी के लिए कतई स्वीकार्य और योग्य नहीं है। ऐसा लगता है कि इन्दिरा गांधी की तरह ही मोदी ने भी भविष्य में आने वाली विपत्तियों को देखते हुए एक दांव खेला है, एक बहुत बड़ा दांव।

60 के दशक में इन्दिरा गांधी को जब यह अहसास हुआ कि यदि नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति बनेंगे तो उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाया सकता है। तब इंदिरा गांधी ने एक बड़ा दांव खेला। उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में मतदाताओं यानी निर्वाचक मण्डलों से अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनने और स्वतंत्र उम्मीदवार वी. वी. गिरी को वोट देने की अपील की। ये इन्दिरा गांधी की अपनी ही पार्टी के खिलाफ खुली बगावत थी। इस तरह की बगावत की उम्मीद किसी ने नहीं की थी। इन्दिरा गांधी ने बड़ा फैसला लिया और ये फैसला साहसिक भी था। इस फैसले के बाद जब जब गिरि पहला राउंड हार गए तब इन्दिरा गांधी और उनकी टीम हताश हुई लेकिन उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा “चिंता मत करो, हमारी लड़ाई मुश्किल होगी, लेकिन मैं तैयार हूँ।“ आखिरकार गिरि जीत गए और काँग्रेस में फूट पड़ गई। इन्दिरा गांधी को प्रधानमंत्री के पद से हटाने का भी प्रयास भी किया गया लेकिन उन्होंने न केवल काँग्रेस संसदीय पार्टी का बहुमत हासिल किया अपितु संसद में अविश्वास प्रस्ताव को भी पर्याप्त मतों से जीत लिया। ख़ास बात ये रही कि इन्दिरा गांधी को जितना तेज़ और तेजतर्रार माना जा रहा था वे उससे कहीं अधिक तेज़ और तेजतर्रार साबित हुईं।

इन्दिरा गांधी ने पार्टी के वारिष्ठों से अपनी लड़ाई को एक 'आदर्शवादी' रंग भी दिया। उस समय के ज्यादातर वरिष्ट कांग्रेसी नेता 'राईटिस्ट' (दक्षिणपंथी) थे। मोरारजी देसाई , निजलिंगप्पा , कामराज , एस. के. पाटील , अतुल्य घोष सभी दिग्गज थे, लेकिन अतीत में । इंदिरा गांधी ने एक अलग नकाब ओढ़ रखा था। वे जानती थीं कि जवाहरलाल नेहरू की पुत्री होने के नाते वामपंथी बुद्धिजीवियों में उनके प्रति सौहद्र था, प्रेम था और सहानुभूति भी। वो समय 'शीत युद्ध' का समय भी था। दुनिया दो वर्गों और दो आदर्शों में बंट गई थी। सोवियत यूनियन के नेतृत्व में वामपंथियों का वर्चस्व भी लगातार बढ़ रहा था। भारत में वामपंथ और वामपंथियों का प्रभाव बढ़ने लगा था। ऐसी स्थिति में इन्दिरा गांधी ने 'समाजवाद'का रास्ता चुना। उन्होंने दो मुद्दों को हथियार बनाया - बैंको का राष्ट्रीयकरण और विशेषाधिकारों की समाप्ती। और, इन दो बड़े फैसलों के बाद भी प्रधानमंत्री पद से उन्हें हटाने की साजिशें नहीं रुकीं तब उन्होंने संसद का सत्र खत्म होने का इंतज़ार भी नहीं किया और संसद भंग कर दी और चुनाव करवाए, जिसमें उन्हें दो-तिहाई बहुमत प्राप्त हुआ। उनका नारा था – “वो कहते हैं इन्दिरा हटाओ, मैं कहती हूँ गरीबी हटाओ। “ चुनाव में जीत के बाद इंदिरा गांधी बहुत ताकतवर हो गयीं, अनिश्चितताओं का दौर खत्म हो गया, वे अपनी नियति की स्वामी खुद बन गयीं।

बड़ी बात ये है कि मोदी भी इन्दिरा गांधी जैसी ही चाल चलने की कोशिश कर रहे हैं। वे यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे काले धन के खिलाफ लड़ रहे हैं और विपक्ष इस लड़ाई में उनके खिलाफ है। वे भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं और विपक्ष उन्हें ऐसा करने नहीं दे रहा है। लेकिन इन्दिरा गांधी के विपरीत, मोदी भाग्यशाली हैं क्योंकि उनकी पार्टी उनके साथ है ।और तो और, मोदी के खिलाफ बगावत की कोई आवाज़ नहीं है और असंतोष का कोई स्वर भी नहीं है । नोटबंदी को लेकर जहाँ विपक्ष एकजुट है और मोदी पर संगीन आरोप लगा रहा है वहीं संसद के भीतर और बाहर बीजेपी के लोग जमकर अपने नेता मोदी का पुरजोर समर्थन कर रहे हैं। फिलहाल तो उन्हें अपनी पार्टी से कोई परेशानी नहीं है।

लेकिन, मोदी की चाल और उनकी तरकीब कामयाब होती नज़र नहीं आ रही है। मोदी ने लोगों से कहा है कि 50 दिनों में सब कुछ ठीक जाएगा। उन्होंने जनता से ये भी कहा है कि उनकी ये पहल 'राष्ट्रीय पुनरुद्धार' की शुरुआत है। मोदी ने बड़ी होशियारी से नोटबंदी के दुष्परिणामों को देश की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया है। इन सब के बीच लोगों की परेशानियों का अंत नहीं हुआ है, बल्कि दिक्कतें बढ़ रही हैं। सरकार हर दिन अपने निर्णय और लक्ष्य बदल रही है। हर दिन नयी बात की जा रही है। अब मोदी एक कैशलेस सोसाइटी की बातें कर रहे हैं। पहले कुछ सपना दिखाया और अब कुछ दिखा रहे हैं।

मोदी ये बात समझने में नाकाम रहे हैं कि वही सपने बेचे जा सकते है जोकि सच्चाई में बदले जा सकें, और इन सपनों को दिखाने वाले की नीयत साफ़ हो और वो खुद ईमानदार हो। विमुद्रीकरण असफल हुआ है। नोटबंदी का प्रयोग नाकामयाब है। इससे एक अन्य समानान्तर व्यवस्था की रचना हुई है, भ्रष्ट बैंक अधिकारियों और दलालों की एक नई फौज खड़ी हुई है। भ्रष्ट राजनीतिज्ञों और उनके सहयोगियों ने नए सिपाही खोज लिए हैं जो उनके काले धन को आसानी से सफ़ेद कर रहे हैं और सरकार बेबस नज़र आ रही है। मोदी खुद को भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक योद्धा के तौर पर पेश करने की कोशिश में हैं लेकिन उनकी अपनी ही पार्टी सर्वोच्च न्यायलय के आदेश के बाद भी अपनी निधियों में से अस्सी फीसदी का सही स्रोत बताने में नाकाम है। मोदी 'लोकपाल' भी नियुक्त नहीं करना चाहते हैं और अब सर्वोच्च न्यायलय भी इस पर सवाल करने लगा है। मोदी संसद का सामना करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं और वे सदन के बाहर ही बातें कर रहे हैं। उनके समर्थक कतारों में घंटों खड़े आम आदमी का उपहास कर रहे हैं । इन्दिरा गांधी कामयाब हुईं और दुबारा भी चुनाव जीतीं क्योंकि उनके साथ आम आदमी का विश्वास और समर्थन था । दुर्भाग्य से, मोदी ने जनता के विश्वास के साथ धोखा किया है।

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