सोलर पंप ने बदली कच्छ के रण में नमक बनाने वाले कामगारों की जिंदगी

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कठिन परिश्रम और घंटों काम करने की लगन से जुटे ये लोग संसाधनों के आभाव में जीते हैं। अभी तक ये डीजल से चलने वाले पंप की मदद से काम करते थे, लेकिन अब इन्हें सोलर पंप मिल गए हैं जिनसे इनका काम आसान हो गया है।

अगरिया महिला
अगरिया महिला
SEWA ने 2012 में कम आय अर्जित करने वाले कामगारों के कंधे से कर्ज और डीजल का बोझ उतारने के लिए सोलर पंप देने की शुरुआत की थी। इसे सोलर और पीवी सिस्टम उपलब्ध कराने वाले स्थानीय प्रतिष्ठान जेपी सोलर के सहयोग से शुरू किया गया था।

गुजरात के कच्छ के रण में अगरिया जनजाति के लोग नमक बनाने का काम करते हैं। देश का 70 प्रतिशत नमक का उत्पादन इन्हीं के भरोसे होता है। कठिन परिश्रम और घंटों काम करने की लगन से जुटे ये लोग संसाधनों के आभाव में जीते हैं। अभी तक ये डीजल से चलने वाले पंप की मदद से काम करते थे, लेकिन अब इन्हें सोलर पंप मिल गए हैं जिनसे इनका काम आसान हो गया है। बीते कुछ सालों से सोलर पंप की बदौलत इनकी आमदनी में इजाफा हुआ ही है साथ ही नमक का उत्पादन भी पहले से बढ़ गया है। इतना ही नहीं इन पंप से पर्यावरण को भी लाभ हो रहा है और कार्बन उत्सर्जन में कटौती हो रही है।

नमक उत्पादन का कार्य आमतौर पर अक्टूबर से शुरू होता है जब मॉनसून खत्म हो जाता है। इसके बाद अगरिया कामगार पानी को पंप के जरिए नमक बनाने वाले गढ्ढों में भरते हैं। इन गढ्ढों से वाष्पीकरण के जरिए पानी उड़ जाता है और फिर सतह पर नमक बच जाता है। पहले जब डीजल पंप इस्तेमाल होते थे तब हर पंप को 1,200 से 1,300 लीटर तेल की जरूरत पड़ती थी। इसमें डीजल को लाने की लागत जोड़ दी जाए तो खर्च काफी बढ़ जाता था। आखिर में कठिन परिश्रम करने वाले अगरिया को सिर्फ 35,000–40,000 रुपये मिलते थे। कच्छ के रण में बनने वाला नमक देश की करीब 75 फीसदी नमक की जरूरत को पूरा करता है, लेकिन बहुत कम लोगों को इस कारोबार में लगे अगरिया समुदाय के नमक मजदूरों की की मुश्किलों के बारे में पता है।

ग्रासरूट ट्रेडिंग नेटवर्क फॉर वूमन (GTNfW) के सीईओ देवाश शाह बताते हैं कि ये कामगार सारी पूंजी अपना कर्ज अदा करने में खर्च कर देते थे और उनके पास मुश्किल से कुछ पैसे बचते थे। (GTNfW) एक गैर लाभकारी संगठन है जिसकी स्थापना सेल्फ एंप्लॉयड वूमन्स एसोसिएशन (SEWA) द्वारा की गई है। SEWA अपने सदस्यों को सोलर पंप देने का काम कर रहा है।

कैसे हुई शुरुआत

SEWA ने 2012 में कम आय अर्जित करने वाले कामगारों के कंधे से कर्ज और डीजल का बोझ उतारने के लिए सोलर पंप देने की शुरुआत की थी। इसे सोलर और पीवी सिस्टम उपलब्ध कराने वाले स्थानीय प्रतिष्ठान जेपी सोलर के सहयोग से शुरू किया गया था। इन सोलर पंप्स को खासतौर पर नमक वाला पानी निकालने के लिए डिजाइन किया गया था। SEWA ने बाद में अमेरिका की नवीकरणीय ऊर्जा कंपनी सनएडिशन और वर्ल्ड बैंक के साथ भी साझेदारी की और 2015 में अगरियाओं को 200 सोलर पंप वितरित किए गए। इसके बाद 2016 में 200 और 2017 में 700 सोलर पंप और दिए गए।

कच्छ के रण में काम करते अगरिया
कच्छ के रण में काम करते अगरिया

विलेजस्क्वॉयर को दिए इंटरव्यू में देवेश ने कहा, 'हमने सस्ते कर्ज की सख्त जरूरत के जवाब में इन सौर पंपों को वितरित किया जो अगरिया महिलाओं को समृद्ध करने में मदद करेगी।' हालांकि सोलर पंप की कीमत काफी अधिक होती है और एक पंप की लागत लगभग 180,000 रुपये आती है। SEWA की जिला समन्वयक हीना बेन बताती हैं, 'सौर पंप डीजल पंप की तुलना में कहीं अधिक महंगे होते हैं और इसी वजह से कोई भी कामगार इसे नहीं खरीदता है। हमें इस बात को लोगों को समझाना था।'

GTNfW और SEWA ने मिलकर अगरियाओं को श्री महिला सेवा सहकारी बैंक लिमिटेड द्वारा ऋण की व्यवस्था की। यह संस्था भी सेवा की सहयोगी संस्था है। हीना ने कहा, 'हमने इन कामगारों को विशेष छूट दी और लोन चुकाने के लिए समय की कोई खास बाध्यता नहीं थी। अब ये कामगार सीजन के हिसाब से लोन चुका रहे हैं। उदाहरण के तौर पर अगर कोई महिला हर महीने 8,000 रुपये बचाती है तो हमने सिर्फ 6,000 रुपये की किस्त रखी ताकि उनके पास भी कुछ पैसे बच जाएं।'

इस योजना का असर

अगरिया महिलाओं की हालत सुधारने और ऋण की सुलभता केलिए अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (IFC) ने भी मदद की। अब इन महिलाओं को ट्रेनिंग दी जा रही है ताकि ये नमक की क्वालिटी और मात्रा को और बेहतर बना सकें। इससे उन्हें अधिक आमदनी होगी। एक अगरिया महिला विजू बेन की जिंदगी इन सोलर पंप से कैसे बदली इसके बारे में वह कहती हैं, 'मेरे तीनों बेटे सोर पंप का इस्तेमाल करते हैं और इससे काफी पैसा बचता है। अब वे अपने बच्चों को स्कूल भेज पाने में सक्षम है। इससे पहले तक स्थिति ऐसी नहीं थी और हमें तंगहाली में जिंदगी बितानी पड़ रही थी। तकनीक का प्रसार हो रहा है और हम भी उसके साथ आगे बढ़ रहे हैं।'

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