कैसे दिल्ली की एक शर्मिली लड़की बन गई हिप-हॉप ग्राफिटी आर्टिस्ट 'डिज़ी'

दिल्ली की ग्राफिटी आर्टिस्ट काजल के हिप-हॉप 'डिज़ी' बनने की कहानी।

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भारत की पहली महिला ग्राफिटी आर्टिस्ट 23 वर्षीया काजल सिंह बचपन के दिनों में स्वाभाव से शर्मीली होने के बावजूद घर और स्कूल दोनों जगह बेहद प्रतिस्पर्धी थीं। आर्ट हमेशा से उनके जीवन का अभिन्न अंग रही है। उनकी मां एक चित्रकार हैं और उनका भाई उनकी ही तरह एक ग्राफिटी आर्टिस्ट है। उनका फैमिली बैकग्राउंड पूरी तरह से आर्टिस्टिक है। बचपन के दिनों में भरतनाट्यम और डांस कॉम्पटीशन्स में इनाम जीतेने वाली इस लड़की ने कभी भी भीड़ से अलग ग्राफिटी आर्टिस्ट बनने के बारे में नहीं सोचा था।

'ग्राफिटी आर्टिस्ट' काजल, फोटो साभार : फेसबुक
'ग्राफिटी आर्टिस्ट' काजल, फोटो साभार : फेसबुक
70 और 80 के दशक में अमेरिकी हिप-हॉप की जीवन शैली ने सामाजिक और राजनीतिक अन्याय और अन्य मुद्दों पर खुद को अभिव्यक्त करने के लिए मंच के रूप में कार्य किया और ये 80 के आखिर और शुरूआती 90 के दशक में व्यापक लोकप्रियता हासिल करने लगा था। इस शैली ने दौड़ में बराबरी बनाए रखने में मदद की और आगे चल कर ये 80 अरब डॉलर का बाजार बन गया। हालांकि हममें से ज्यादातर लोग रैप संगीत को ही हिप-हॉप समझते हैं, लेकिन हिप-हॉप आंदोलन में वास्तव में चार अलग-अलग तत्व शामिल थे- रैप, डीजे या टर्नटेब्लिज़्म, बी-बॉयिंग और ग्राफिटी।

भारत की पहली महिला ग्राफिटी आर्टिस्ट 23 वर्षीया काजल सिंह हमेशा से बाकी की लड़कियों से अलग थीं। उनके अनुसार, 'मुझे बचपन से पता था, कि मैं दूसरों से थोड़ी अलग हूं। मैं कभी भीड़ का हिस्सा नहीं बनी।'

काजल सिंह से 'डीजी' बनने का सफर

पिछले कुछ वर्षों में, जबकि हिप हॉप अपने मूल स्थान अमेरिका में बदलाव के चरण में है और मंदी के दौर से गुजर रहा है, लेकिन यहां भारत में इसे व्यापक लोकप्रियता प्राप्त हो रही है। अपनी बढ़ती क्रय शक्ति के साथ 200 मिलियन से अधिक युवा इस आंदोलन का हिस्सा बन कर इसे आगे बढ़ा रहे हैं और यही संख्या मौजूदा 80 अरब डॉलर के इस बाजार का विस्तार करेगी। हालांकि, जब काजल ने इस आंदोलन से जुड़ कर अपना पहला प्रयास किया था, तब इस तरह की स्थितियां नहीं थीं।
2008 में एक दोस्त के माध्यम से काजल का परिचय हिप-हॉप आंदोलन से हुआ था। उन दिनों उनके लिए हिप-हॉप का मतलब सड़क पर होने वाला डांस था सिर्फ। चूंकि डांस करना उन्हें अच्छा लगता था, तो हिप-हॉप शैली से वो इतनी प्रभावित हुईं कि इसमें लगातार शामिल होना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे वे इस हिप-हॉप आंदोलन और समुदाय से परिचित होती गईं, वैसे-वैसे उनका परिचय ग्राफिटी से भी होने लगा। ग्राफिटी हिप-हॉप का ही दूसरा पहलू है। काजल उत्साहित होते हुए कहती हैं, "हम बहुत एक्साइटिड थे। ये स्प्रे पेंट देखने में बहुत अच्छा लगता था और फिर हमने भी इस आर्ट में शामिल होने का फैसला किया।”

अब काजल को 'डीजी' के रूप में जाना जाने लगा। कुछ देशों में ग्राफिटी अब भी अवैध है, इसलिए अधिकांश कलाकार एक छद्म नाम से जाने जाते हैं। तो काजल ने भी अपने लिए एक नाम चुन लिया 'डीजी'। दरअसल 'Dizzy' का मतलब पागल होता है। काजल के अनुसार, 'मैंने सोचा कि मैं भारत की पहली ग्राफिटी पागल लड़की थी, इसलिए मैंने अपना नाम 'डिजी' रखा।'

हिप-हॉप कल्चर और काजल का एक लड़की होना

भाई-बहन (काजल और उनका भाई) विदेशी कलाकारों को ऑनलाइन खोज कर उनकी कला की नकल करने लगे। काजल और उनके भाई ने उन वीडियोज़ के माध्यम से कला की मूलभूत बातें सीखीं और अपनी खुद की शैली विकसित करने के लिए इस ज्ञान को उसमें शामिल किया। उन्होंने ग्राफिटी सीन को भारत में शुरू किया गया। महंगा स्प्रे खरीदना आर्टिस्ट के सामने एक बड़ी समस्या थी। काजल के अनुसार "हमारी सारी सेविंग्स स्प्रे पेंट्स खरीदने में खर्च हो रही थीं, लेकिन जल्दी ही हमें एक जुगाड़ मिल गया। हमने बेस के रूप में वॉल पेंट के साथ काम करना शुरू किया और स्प्रे पेंट का उपयोग केवल आऊटलाइंस के लिए किया।" काजल काम की सभी चुनौतियों के अलावा एक और भी बड़ी लड़ाई लड़ रही थीं और वो थी भारत में ग्राफिटी आर्टिस्ट समुदाय का न के बराबर होना। हिप-हॉप परिदृश्य में बहुत कम लड़कियों में से एक होने के नाते और ग्राफिटी आर्ट में अकेली लड़की होना काजल के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। काजल उन दिनों को याद करते हुए कहती हैं, "मुझे हमेशा पूर्वाग्रह का समाना करना पड़ता था। एक लड़की होने के नाते मुझ पर हमेशा अच्छा प्रदर्शन करने और स्वयं को लड़कों से बेहतर साबित करने का दबाव रहता था। इसके अलावां लड़कों को लड़कियों की तुलना में अधिक स्वतंत्रता भी रहती थी और हमेशा उन्हें लड़कियों से ज्यादा तरजीह दी जाती थी। ये सब बहुत मुश्किल था, मुश्किलें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं।"लेकिन काजल आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थीं। वो हमेशा खुद को याद दिलाती रहतीं कि वो ग्राफिटी में क्यों आईं और ये बात उन्हें निराश नहीं होने देती।

"मुझे खुशी है कि मैं मुश्किलों भरे उस दौर से निकल सकी। मैं अब एक आज़ाद पंछी हूँ": काजल सिंह

काजल के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब उन्हें 2012 में भारत-जर्मन हिप-हॉप अर्बन आर्ट प्रोजेक्ट में काम करने के लिए जर्मनी बुलाया गया। उसके बाद से ही उनका कैरियर नई ऊंचाइयों को छूता गया।

काजल सिंह ने 2014 में दिल्ली, मुंबई और कोलकाता में और एकबार फिर 2015 में जर्मनी में इस प्रोजेक्ट पर काम किया। उसी साल उन्होंने साइबेरिया और रूस की भी यात्रा की, जहां उन्हें एक कुकिंग टीवी शो में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था। ये पूछने पर की एक कुकिंग शो में? इस पर काजल मज़ाकिया लहजे में कहती हैं, "हाँ, मैंने स्वादिष्ट मसालेदार भारतीय चिकन करी पकाने के दौरान ग्राफिटी के बारे में बात की थी"

काजल अपनी आर्ट का प्रदर्शन फ्रैंकफर्ट, जर्मनी के क्रिएटिव वर्ल्ड फेयर में भी कर चुकी हैं। ये प्रदर्शनी उस कंपनी द्वारा आयोजित की गई थी, जहाँ वो उन दिनों नौकरी कर रही थीं और अब दिल्ली की ये लड़की जेट से अपने शहर और बर्लिन के बीच चक्कर लगाती है।

भारत में हिप-हॉप तब और अब

तब से लेकर अब तक काजल भारत में तेजी से बदलते हिप-हॉप की गवाह रही है और उन्हें लगता है कि हिप-हॉप कल्चर ने भारत में एक लंबा सफर तय किया है। राहत की सांस लेते हुए वो कहती हैं "जिस स्प्रे पेंट के लिए हमें आज से कुछ साल पहले स्ट्रगल करना पड़ता था, वो स्प्रे पेंट अब हमें आसानी से अपने देश में उपलब्ध है। कुछ ही कंपनियां हैं जो इसे बनाती हैं, लेकिन अब स्थिति पहले से काफी बेहतर है।" उनके अनुसार अब पहले की अपेक्षा अधिक लड़कियां हिप-हॉप कल्चर से जुड़ रही हैं, जिनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है। जबकि लड़कियों के इस मुवमेंट में शामिल होने का स्वागत किया जाना काफी पॉज़िटिव चेंज है। ये भी देखना अपने आप में दिलचस्प है कि इस प्रकार की कला के लिए भारत में खुलापन है।

ग्राफिटी और ब्रेक-डांसिंग ही हिप-हॉप कल्चर की तरफ लोगों का ध्यान खींचने वाले मुख्य पक्ष थे, लेकिन समय बीतने के साथ ही ये कम होता गया। एक ग्रीक-अमरीकी युवा ने 1972 के आसपास ग्राफिटी मुवमेंट शुरू किया था, जिसने न्यूयॉर्क शहर के सबवे सिस्टम की दीवारों पर हिप-हॉप की टर्मिनोलॉजी Taki 183 ( Taki उसका नाम और सड़क का नाम 183वीं स्ट्रीट था) में टैग किया था। जल्द ही इस ट्रेंड को US, यूरोप और जापान में बड़े कलाकारों ने प्रदर्शित करना शुरू कर दिया। हालांकि न्यूयॉर्क (जहां इस आर्ट का जन्म हुआ) में स्थिति काफी विपरीत थी।

जब पूरी दुनिया ग्राफिटी की अच्छाईयों और बुराईयों पर बात कर रही थी, उस समय भारत में एक आश्चर्यजनक बदलाव देखने को मिल रहा था। काजल कहती हैं, "यूरोप की तुलना में भारत रोड आर्ट के प्रति अधिक ग्रहणशील है। भारतीयों ने ग्राफिटी को दूसरे देशों की तरह खतरे के रूप में नहीं लिया, क्योंकि चमकीले रंगों और कलाओं से पूरी तरह भरी हुयी दीवारों को देखना उनके लिए एक विलक्षण अनुभव था। यूरोप में अब ये नया नहीं रह गया है और न ही वहां बहुत से लोग आर्ट के रूप में ग्राफिटी देखते या इसकी सराहना करते हैं।"

'डिजी' यानि की काजल सिंह आर्टिस्ट्स के उस बड़े ग्रुप का एक हिस्सा हैं, जो आर्ट के माध्यम से परिवर्तन लाने और शांति का प्रचार करने की कोशिश कर रहा है। ये पूछने पर, कि क्या कला के माध्यम से भी कुछ बदल सकता है? इस पर डिजी कहती हैं, "हां, बेशक ऐसा हो सकता है। मैं जिन भी प्रोजेक्ट्स का हिस्सा हूं वे ग्राफिटी का इस्तेमाल सिर्फ कला को बढ़ावा देने के लिए नहीं बल्कि दुनिया भर के लोगों के साथ आपस में सहयोग स्थापित करने के लिए करते हैं। ये सिर्फ एक असाइनमेंट नहीं है, बल्कि संबंधित संस्कृतियों के आदान-प्रदान का एक माध्यम है। ये पूरी प्रक्रिया कला के द्वारा एकता और आपसी प्रेम के मूल्यों को बढ़ाने की दिशा में काम करती है।" 

'डिजी' काजल एक फिटनेस ब्लॉगर और डांसर भी हैं।  योरस्टोरी से बात करते हुए अपनी बात को अपने हिप-हॉप स्टाईल में खत्म करते हुए वो कहती हैं, "अपने लिए ईमानदार बनो और धूम मचा दो (Be true to yourself and hustle)।"

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