‘सत्संग’ में सीखिए सफलता के सूत्र, यशस्विनी रामास्वामी के संग

संघर्षरत उद्यमियों को चिन्हित कर उन्हें व्यापार में पैर जमाने में सहायता करने का काम करता है यह समूहवर्ष 2012 में फार्चयून/यूएस डिपार्टमेंट आॅफ स्टेट ग्लोबल वोमेन्स मेंटोरिंग पार्टनरशिप के तहत अमरीका जाने वाले 25 महिलाओं में थी शामिलआईआईएम-बी के कार्यक्रम निदेशकों में शामिल होकर एक्सीलरेटर प्रोग्राम कर रही हैं तैयारअपनी कंपनी ‘ ई2ई पीपल्स प्रैक्टिसिज’ का बैंगलोर में कर रही है सफलतापूर्वक संचालन

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15 वरिष्ठ पेशेवरों के समूह को मिलाकर तैयार किया गया संगठन ‘सत्संग’ यशस्विनी रामास्वामी के दिमाग की उपज है। ‘सत्संग’ एक ऐसा संगठन है जो लाभ की चिंता किये बगैर संघर्षरत उद्यमियों को चिन्हित कर उन्हें संरक्षण देने का काम करता है और जरूरत पड़ने पर उनको अपने पैरों पर खड़ा करके दूसरे उद्यमियों की तलाश में लग जाते हैं। अगर कुछ मामलों में उनके प्रयास असफल होते हैं तो वे उद्यमियों को वह व्यवसाय छोड़कर कुछ और करने के लिये प्रेरित करते हैं। वर्ष 2012 में फार्चयून/यूएस डिपार्टमेंट आॅफ स्टेट ग्लोबल वोमेन्स मेंटोरिंग पार्टनरशिप ने यशस्विनी को भारत में महिलाओं के बीच नेतृत्व की भावना और उद्यमशीलता का बढ़ावा देने के अपने कार्यक्रम में लिये चयनित किया।

उन्होंने चार वर्ष पूर्व अपनी एक कंपनी ई2ई पीपल्स प्रेक्टिसिज की शुरुआत की और अब वे बैंगलोर में इसका सफलतापूर्वक संचालन कर रही हैं।

पूर्व में इंफोसिस बीपीओ के साथ प्रबंधन सलाहकार के रूप में काम कर चुकी यशस्विनी ने नीति निर्धारण, व्यक्ति संरचना और आॅडिट, नेतृत्व प्रशिक्षण एवं हस्तक्षेप और प्रतिभा संकलन जैसे व्यक्तित्व प्रबंधन के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल की है। बीते कई वर्षों के दौरान वे वित्तीय, बीपीओ और आईटी उद्योग के विभिन्न क्षेत्रों में लोगों को अपने साथ जोड़ने के अमरीका, आॅस्ट्रेलिया और इंग्लैंड में प्रचलित बीपीओ माॅडल का सफल माइग्रेशन कर रही हैं। इस दौरान वे 3 हजार से भी अधिक लोगों को नेतृत्व के सिद्धांतों, आत्म प्रबंधन, एक गतिशील वातावरण में लोगों का प्रबंधन कैसे करना चाहिये, व्यक्तित्व विकास, प्रमाणीकरण जागरुकता कार्यक्रम सहित कई अन्य क्षेत्रों में प्रशिक्षित कर चुकी हैं।

इसके साथ ही साथ उन्हें भारत के समस्त आईआईएम के पूर्व छात्रों और स्नातक के अंतिम वर्ष के छात्रों के लिये एक एक्सीलरेटर प्रोग्राम तैयार करने का जिम्मा देते हुए आईआईएम-बी के कार्यक्रम निदेशकों में से एक के रूप में चुना गया है।

वे याॅरस्टोरी के साथ अपने जीवन और सफलता से जुड़ी कुछ बातें साझा कर रही हैं।


स्वतंत्र होना सीखा

मेरा जन्म कोयंबटूर में हुआ और मेरी परवरिश दिल्ली में हुई। मेरे पिता एक आईएएस अधिकारी थे और मेरी परवरिश एक सुदूर गांव के माहौल से लेकर राष्ट्रपति भवन के गलियारों तक में हुई है। मैंने अपने जीवन में गरीब से गरीब और अमीर से अमीर हर प्रकार के माहोल को बेहद नजदीकी से देखा है। मेरी माँ अर्थशास्त्र में स्वर्ण पदक विजेता थीं और मेरे माता-पिता ने मुझे बहुत छोटी उम्र में ही कंप्यूटर सिखाना तक शुरू कर दिया था। मैं बहुत खुशनसीब हूँ कि मुझे भविष्य के बारे में सोचने वाले माता-पिता मिले।

मैंने अपने माता-पिता से जो सबसे बड़ी बात सीखी है वह है जीवन में ईमानदारी का महत्व और अपनी मूल्य प्रणाली के प्रति सच्चा रहना। मैं अपने माता-पिता और दादा-दादी की वजह से देशभक्ती की भावना के साथ बड़ी हुई हूँ। मैंने वनम्र रहना, स्वतंत्रता से जीवन व्यतीत करना और अपने लिये खड़े होना सीखा है।


व्यवसाय में कदम

मैं शुरू से ही बड़ी होकर सेना में जाना चाहती थी और मैं बहुत सालों तक इसी सपने को जीती आई। इसके अलावा मैं टेनिस खिलाड़ी बनने के लिये बेहद उत्सुक थी लेकिन किस्मत से मैं एक व्यवसाई बन गई। मैं एक ऐसे परिवार से आती हूँ जिनकी कोई व्यवसायिक पृष्ठभूमि नहीं है। हमारे घर में हमेशा से ही लक्ष्मी की नहीं बल्कि सरस्वती की पूजा होती आई थी। 13 वर्षों तक इंफोसिस और वेलंकणी समूह जैसे संगठनों के साथ परामर्शदाता के रूप में जुड़े रहने के बाद मैंने अपने आगे के जीवन के बारे में बहुत सोचा-विचारा। मेरे मिलने वालों में से एक ने मुझे उद्यमशीलता के रास्ते पर कदम आगे बढ़ाने के लिये प्रोत्साहित किया। मैं सिर्फ परामर्श के क्षेत्र में और महत्व जोड़ने का इरादा लेकर व्यवसाय की दुनिया में आई थी। अगर आप परामर्श या सलाह पर नजर डालें तो भारत में उसकी कोई अहमियत नहीं है क्योंकि यह तो यहां पर हर जगह मुफ्त में भरपूर उपलब्ध है। कंपनी शुरू करने के बाद बीते 4 वर्षों में मैं 51 से भी अधिक उपभोक्ताओं को सफलतापूर्वक परामर्श उपलब्ध करवा चुकी हूँ और मैं अपने उद्देश्य में पूरी तरह सार्थक रही हूँ।


काम से इतर नेटवर्क तैयार करना

मैंने सीआईआईई के लिये एक महिला मंच की स्थापना की। मैं महिलाओं से संबंधित किसी भी क्षेत्र में सार्थक काम कर रहे किसी भी संगठन के साथ खुद को जोड़ने में कभी पीछे नहीं रहती। हमारे देश में लगभग आधी जनसंख्या महिलाओं की है लेकिन इनके पास अपनी आवाज उठाने के लिये उचित मंचों की बेहद कमी है। हमने महिलाओं के लिये कई सार्थक कार्यशालाओं का सफलतापूर्वक आयोजन किया है। उदाहरण के लिये हमनें महिलाओं के लिये असंख्य वित्त कार्यशालाओं का आयोजन किया है क्योंकि हमें कई सर्वेक्षणों से मालूम हुआ कि महिलाएं हिसाब-किताब का मामला सामने आते ही अपने कदम पीछे हटा लेती हैं। वे हिसाब-किताब खुद न करके इसके लिये दूसरों पर निर्भर रहना पसंद करती हैं और यह कोई सशक्त स्थिति नहीं है। इसके अलावा हमने एक समावेशी कार्यस्थल का निर्माण करने के लिये कार्य संस्कृति का भी अध्ययन किया। हमने पाया के महिलाओं के लिये होने वाले सम्मेलनों में सिर्फ महिलाओं को ही आमंत्रित किया जाता है जबकि इन शिखर सम्मेलनों में पुरुषों की भी सक्रिय भागीदारी होनी चाहिये।

वर्ष 2012 में फार्चयून/यूएस डिपार्टमेंट आॅफ स्टेट ग्लोबल वोमेन्स मेंटोरिंग पार्टनरशिप के लिये अमरीका की प्रायोजित यात्रा के लिये दुनियाभर से चुनी गई 25 महिलाओं में से मैं भी एक थी। ये सभी वे 25 महिलाएं थीं जिनका अपने देश में एक बेहद उज्जवल भविष्य था। हमनें वाशिंगटन में अपना काफी समय बिताया और कई अमरीकी सांसदों के साथ मुलाकातें कीं। हमने इसपर भी विचार किया कि नीति के स्तर पर क्या किया जा सकता है और हिलेरी क्लिंटन के साथ डिनर भी किया। के बाद हमें सिलिकाॅन वैली ले जाया गया जहां मेरा मार्गदर्शन फॉर्च्यून 500 में से एक सीईओ ने किया। यात्रा के अंतिम सप्ताह में हम न्यूयाॅर्क में थे जहां हमनें कई बैंकरों के साथ मुलाकात की और आर्थिक बाजारों के काम करने के तरीकों को जाना और सीखा।


बड़े सपने देखिये, आगे बढ़ने का लक्ष्य सामने रखिये

अगर आप महत्वाकांक्षी हैं तो आप भीड़ में खुद को अकेले पाएंगे और आपको इस चुनोती से निबटने के लिये खुद को तैयार करना होगा। आपका सामना हमेशा आपको हतोत्साहित करने वाली ताकतों से होगा। मेरे लिये तो अमरीका की वह पूरी यात्रा मेरा मनोबल बढ़ाने में बेहद सहायक साबित हुई क्योंकि मैंने पूरी दुनिया की ऐसी महिलाओं को देखा और जाना जो ऐसी ही विपरीत परिस्थितयों का सामना करते हुए हार न मानने के जज्बे के साथ आगे बढ़ती चली जा रही थीं। आज मेरे पास दुनियाभर की ऐसी महिलाओं का एक पूरा तंत्र मौजूद है जो बड़े सपने देखती हैं। मैंने अफगानिस्तान और यूरोप में अपना व्यवसाय संचालित करने वाली ऐसी महिलाओं को भी देखा है जो हमसे भी अधिक मुश्किल चुनौतियों का सामना कर रही हैं ओर डटी हुई हैं। यह यात्रा मेरे लिये सीखने का एक बड़ा अवसर रहीं।

इसके अलावा मैंने व्यवसाय की दुनिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के लिये ‘सीईओ सत्संग’ की भी शुरुआत की है। इसके अंतर्गत हम कक्षाएं और समूह चर्चाएं आयोजित करते हैं और एक-दूसरे की व्यापारिक योजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। मूल रूप से हम उन्हें विकास की ओर अग्रसर करते हैं।

मेरा सबसे बड़ा लक्ष्य यह है कि मैं कभी भी यथास्थिति के साथ समझौता नहीं कर सकती। मैं अपनी कंपनी को एक बड़ी और बेहतर कंपनी बनाते हुए उसका प्रसार वैश्विक स्तर पर करना चाहती हूँ। इसके अलावा मैं अपने देश के लिये भी बहुत कुछ करने का जज्बा रखती हूँ। मेरे पास देश से बाहर जाकर कुछ बड़ा करने के बहुत सारे अवसर हैं लेकिन मैं यही रहकर देश के लिये कुछ बेहतर करना चाहती हूँ, हालांकि यह मेरे लिये चीजों को और कठिन बना देता है।


मोटी चमड़ी वाले बन जाएं

इससे पहले कि आप आने वाले पैसे के साथ खुद को आरामदायक स्थिति में ढाल लें अगर आप अपने संगठन को चलाने के लिये बेहतर संसाधनों को तैयार करने का काम करें तो बेहतर होगा। यह एक बेहद महत्वपूर्ण बुनियादी सबक है। दूसरा महत्वपूर्ण सबक यह है कि अपने आप में विश्वास करें और लगातार दूसरों से सलाह लेते रहें। अपने साथ के लोगों का संपर्क कभी भी न छोड़ें चाहे उसके लिये आपको जो भी कुछ करना पड़े। सफलता को कभी भी अपने सिर पर न सवार होने दें।

अगर आप एक महिला हैं तो अधिकतर लोगों की आपके बारे में यह धारणा रहती है कि आप तरक्की करने और अपने व्यापार को बढ़ाने के लिये महत्वाकांक्षी नहीं हैं। वे यह सोचते हैं कि आप यह सबकुछ सिर्फ जेबखर्च के लिये कर रही हैं और आपके पति आपका सहयोग कर रहे हैं। मुझे पूरा यकीन है कि वे मुझसे इस तहर के सवाल पूछने की हिम्मत नहीं करेंगे। हमेशा अपने काम में पूरा ध्यान लगाएं ओर लगातार अपने उपभोकताओं का आदर करें तो आप बहुत जल्द स्थितियों को अपने पक्ष में बदलते हुए देखेंगी। आपको व्यापार में मोटी चमड़ी वाला होना चाहिये और यह मेरी सबसे बड़ी सीख रही है। मैंने भी समय के साथ मोटी चमड़ी वाला बनना सीख लिया है।

जब भी किसी की मदद लेने की बात आए तो आपको बिल्कुल स्पष्टवादी होना चाहिये। अगर मैं अपने परामर्शकों से सहायता नहीं लेती तो आज मेरे पास जो कुछ भी है मैं उसका आधा भी हासिल नहीं कर पाती। अमरीका में इस प्रक्रिया को औपचारिक रूप दे दिया गया है। वे कहते हैं कि अगर आपको सफल होना है तो जेसे आपकी कंपनी का एक बोर्ड होता है वैसे ही आपका अपना निदेशकों का एक बोर्ड होना चाहिये। महिलाएं पुरुषों के मुकाबले मदद की कम तलबगार होती हैं। हमें भी बिना किसी झिझक के दूसरों से मदद और सलाह लेने के लिये तैयार रहना चाहिये।

चूंकि एक उद्यमी के रूप में मैंनपे अपनी यात्रा अकेले ही तय की है इसलिये अब मैं आध्यात्म की ओर रुख करने की इच्छुक हूँ।


हम अपने सबसे बड़े दुश्मन हैं

मैं हमेशा दो उद्धरणों को याद रखती हूँ। ‘‘हम असफलता से इतना नहीं डरते हैं जितना हम अपनी खुद की सफलता से डरते हैं।’’ ‘‘कल आपके बाकी के जीवन का पहला दिन है।’’

मेरे हिसाब से हम खुद अपने सबसे बड़े दुश्मन हैं क्योंकि हमनें अपने लिये ढेर सारी सीमाओं का निर्धारण किया है। जीवन में बड़ा करने के लिये हमें स्वयं से लड़ने की जरूरत है। इसके अलावा मुझे लगता है कि भारतीय समाज के रूप में हम अपने कंधों पर हद से ज्यादा भावुकता को लादे रहते हैं। जीवन के बड़े परिदृश्य में कई बार छोटी-छोटी बातों का कोई महत्व नहीं होता है। अपना जीवन गर्व के साथ जिये और ऐसे जियो कि आप रोजाना अपनी किस्मत का निर्माण कर रहे हैं।

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