मिलिए लगातार तीन नेशनल चैंपियनशिप अपने नाम करने वाली भारत की पहली बॉडीबिल्डर सरिता से

महिला सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण हैं थिंगबाइजम सरिता देवी...

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दो बच्चों की मां और जिंदगी के 30 बसंत देख चुकीं थिंगबाइजम सरिता देवी, देश की पहली महिला हैं जिन्होंने राष्ट्रीय बॉडीबिल्डिंग चैम्पियनशिप को लगातार तीन बार अपने नाम किया है। साथ ही उन्होंने कई बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश का सिर गर्व से ऊंचा किया है। थिंगबाइजम सरिता ने एक ऐसे खेल में राष्ट्र की ख्याति अर्जित की है, जिसमें कई भारतीय महिलाएं अभी भी भाग लेने की हिम्मत नहीं कर पाती हैं।

हम देवी-देवताओं को ताकत के प्रतीक के रूप में पूजा तो कर सकते हैं, लेकिन एक मजबूत महिला से अभी भी हमारा पितृसत्तात्मक समाज असहज महसूस करता है। सरिता एक ऐसी महिला हैं, जिन्होंने न केवल जेंडर से जुड़ें हमारे समाज की रूढ़ियों को दी है बल्कि उस मिथक को भी काट दिया है जो कहता है कि एक मजबूत और सफल महिला पारंपरिक जीवन शैली के लिए खतरा है।

बहुत से माता-पिता अपनी बेटियों को खेल ले जाने के लिए अनिच्छुक हैं क्योंकि उन्हें डर है कि यह उनके स्त्रीत्व को प्रभावित करेगा। बॉडी बिल्डिंग और अन्य तरह के खेलों में महिलाओं से जुड़े मिथकों को मिटाने के लिए सरिता का उदाहरण बड़ा ही सटीक और प्रेरक है। यहां पर उनके पति और परिवार की भी तारीफ होनी चाहिए।

दो बच्चों की मां और जिंदगी के 30 बसंत देख चुकीं थिंगबाइजम सरिता देवी, देश की पहली महिला हैं जिन्होंने राष्ट्रीय बॉडीबिल्डिंग चैम्पियनशिप को लगातार तीन बार अपने नाम किया है। साथ ही उन्होंने कई बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश का सिर गर्व से ऊंचा किया है। थिंगबाइजम सरिता ने एक ऐसे खेल में राष्ट्र की ख्याति अर्जित की है, जिसमें कई भारतीय महिलाएं अभी भी अपने में भाग लेने की हिम्मत नहीं कर पाती हैं। भारत में महिला बॉडी बिल्डिंग अभी भी बढ़ते चरण में है और सरिता उन महिलाओं में से एक है जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को गौरव के मौके दिए हैं। यद्यपि बॉडीबिल्डिंग चैम्पियनशिप में 'फिटनेस मॉडल' श्रेणी में बहुत ज्यादा भागीदारी हुई है, फिर भी महिला बॉडी बिल्डर की संख्या अभी भी भारत में बहुत कम है। मजबूत, मांसल मांसपेशियां और एकदम तराशा हुआ शरीर कुछ ऐसा होता है जो भारतीय सौंदर्य या स्त्रीत्व की अवधारणा अभी तक पूरी तरह से मेल नहीं खाता है।

हम देवी-देवताओं को ताकत के प्रतीक के रूप में पूजा तो कर सकते हैं, लेकिन एक मजबूत महिला से अभी भी हमारा पितृसत्तात्मक समाज असहज महसूस करता है। सरिता एक ऐसी महिला हैं, जिन्होंने न केवल जेंडर से जुड़ें हमारे समाज की रूढ़ियों को दी है बल्कि उस मिथक को भी काट दिया है जो कहता है कि एक मजबूत और सफल महिला पारंपरिक जीवन शैली के लिए खतरा है। आज भी अधिकांश भारतीय खेल में महिलाओं को जाने को एक कलंक समझते हैं। वो अब तक इस रूढ़िवादिता से मुक्ति नहीं पा पाए हैं। बहुत से माता-पिता अपनी बेटियों को खेल ले जाने के लिए अनिच्छुक हैं क्योंकि उन्हें डर है कि यह उनके स्त्रीत्व को प्रभावित करेगा। बॉडी बिल्डिंग और अन्य तरह के खेलों में महिलाओं से जुड़े मिथकों को मिटाने के लिए सरिता का उदाहरण बड़ा ही सटीक और प्रेरक है। यहां पर उनके पति और परिवार की भी तारीफ होनी चाहिए।

अपने पति के साथ खिलखिलातीं सरिता
अपने पति के साथ खिलखिलातीं सरिता

अद्भुत सरिका का अप्रतिम सफर-

थिंगाबाइजम सरिता देवी का जन्म 1 फरवरी, 1986 को मणिपुर में हुआ था। मणिपुर को भारतीय खेलों का पावरहाउस कहा जाता है। मणिपुर के लिए खेल कितना मूल्यवान हैं, ये बात से स्पष्ट हो जाता है कि वहां चलने वाले पांच दिनों योसोंग (होली) के त्योहार में खेल गतिविधियां एक अभिन्न और महत्त्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। मणिपुरी समाज में खेल गतिविधियों में भाग लेने के लिए दोनों लड़कों और लड़कियों को बहुत प्रोत्साहित किया जाता है। सरिता के परिवार का भी इस परंपरा का कोई अपवाद नहीं था। खेल के लिए उनके जुनून को उनकी बड़ी बहन और परिवार के अन्य सदस्यों ने बचपन से ही सराहा था। सरिता ने विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं में भाग लिया था। लेकिन एक स्पोर्ट्सपर्सन बनने के लिए कोई खास सोच नहीं बना रखी थी। सरिता बताती हैं, 'मैंने कई खेलों के प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया था लेकिन विवाह के बाद मेरा असल खेल करियर शुरू हुआ।'

सरिता को भोगिरोट थिंगबाइजम से प्रेम था जो बाद में विवाह में बदल गया। भोगिरोट उस समय एक मार्शल आर्ट प्लेयर थे और उन्होंने राष्ट्रीय चैम्पियनशिप में कांस्य पदक भी जीता था। हालांकि उन्होंने इसके बाद किसी भी प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लिया। इन युवा प्रेमियों का विवाह तब हुआ जब सरिता की उम्र 18 वर्ष थी। जल्द ही इस युगल के दो बेटे भी हो गए। लेकिन प्रसव के बाद सरिता के स्वास्थ्य पर कुछ प्रतिकूल प्रभाव दिखने लगे और समय के साथ ये और बढ़ने लगा। सरिता बताती हैं, मैंने सोचा था कि मुझे अपना स्वास्थ्य हासिल करने और फिटनेस बनाए रखने के लिए कुछ खेल खेलना शुरू कर देना चाहिए। मैंने अपने पति के साथ चर्चा की और उन्होंने सुझाव दिया कि मुझे बॉडी बिल्डिंग ट्राय करना चाहिए। सरिता के पति भोगिरोट बताते हैं, सरिता को यह नहीं पता था कि किस खेल को शुरू करें, लेकिन मैंने देखा कि उसके पास बॉडी बिल्डिंग के लिए प्राकृतिक क्षमता है। उनके पास एक उत्कृष्ट शरीर संरचना थी और मुझे पता था कि वह उस क्षेत्र में वास्तव में बड़ा बनाने में सक्षम होगी।

बच्चों और पति के साथ सरिता की एक फोटो
बच्चों और पति के साथ सरिता की एक फोटो

जब इत्तेफाकन हुई बॉडीबिल्डिंग की शुरुआत-

प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए उनकी प्रेरणा के बारे में सरिता बताती हैं, '2012 में मैंने अपने पति के मार्गदर्शन में जिम में प्रशिक्षण शुरू किया। मैं जिम में बहुत अच्छा कर रही थी और जल्द ही परिणाम दिखाई भी देने लगा। मैं धीरे-धीरे मांसपेशियों का विकसित करती जा रही थी। जिम में हर कोई मेरी इस प्रगति से प्रभावित था। जिम में प्रशिक्षकों ने मेरे शरीर से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मुझे बॉडी बिल्डिंग प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया।' अपने प्रशिक्षकों, उनके पति और ससुराल वालों द्वारा प्रोत्साहित किए जाने पर सरिता ने एक ही वर्ष में अपने जीवन में पहली बार बॉडी बिल्डिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। यह मिस कांगलीपैक नामक एक राज्य स्तर की प्रतियोगिता थी और उसमें उन्होंने रजत पदक जीता। इससे उन्हें और अधिक आत्मविश्वास मिला।

अगले साल उन्होंने फिर से प्रतियोगिता में भाग लिया और फिर से रजत पदक जीता। 2014 में उन्होंने पहली बार राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर में प्रवेश किया। उन्होंने ओडिशा में आयोजित एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया लेकिन तब उन्हें कोई पदक नहीं मिला। 2014 में मकाऊ में एशियाई चैम्पियनशिप में सरिता ने भारत का प्रतिनिधित्व किया और पांचवा स्थान काबिज किया। 2014 में मुंबई में विश्व चैंपियनशिप का आयोजन किया गया था। यह पहली बार था कि भारत इस चैंपियनशिप की मेजबानी कर रहा था। वह पांचवें स्थान पर रहीं इस चैंपियनशिप में। 2015 में उन्होंने बेंगलोर में आयोजित सतीश सागर क्लासिक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में चैंपियन का खिताब जीता। उसी वर्ष उज़्बेकिस्तान में हुई 49 वीं एशियाई बॉडीबिल्डिंग चैम्पियनशिप में सरिता ने रजत पदक जीता। 2016 में उन्होंने बैंकाक में हुई विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। उसी वर्ष उसने महाराष्ट्र में आयोजित राष्ट्रीय चैम्पियनशिप में पहला खिताब जीता। फिर 2016 में भूटान में हुई 50 वीं एशियाई चैम्पियनशिप में रजत पदक जीता। पटाया में हुई विश्व चैंपियनशिप में वो चौथे स्थान पर रहीं। 2017 में मध्य प्रदेश में आयोजित वरिष्ठ महिला चैंपियनशिप में सरिता ने चैंपियन का खिताब जीता। फिर से उन्होंने गुड़गांव में वरिष्ठ सीनियर महिला प्रतियोगिता में सीनियर महिला का मिस इंडिया का खिताब जीता। 2017 में उन्होंने दक्षिण कोरिया में 51 वीं एशियाई चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। वह अब इस साल बाद में मंगोलिया में आयोजित विश्व चैंपियनशिप के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं। इस बीच वह लगातार पांच साल मणिपुर में राज्य चैंपियन रही हैं।

अपने ससुर और पति के साथ सरिता
अपने ससुर और पति के साथ सरिता

एक सफल महिला कभी भी परंपराओं के लिए खतरा नहीं-

सरिता के ससुराल वाले बड़े सपोर्टिव हैं और उनके पति उनके लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत रहे हैं। 35 वर्षीय भोगिरोट, जोकि सरिता के पति हैं, का मानना है कि पुरुषों को सफल और मजबूत महिलाओं के बारे में असुरक्षित महसूस नहीं करना चाहिए। एक महिला को घर पर ही बांध कर रखना और उसकी प्रतिभा को नष्ट करना सही नहीं है। मैंने सरिता को दूसरी महिलाओं के लिए बाहर जाने और एक रोल मॉडल बनाने के लिए कहा। अन्य महिलाओं विशेषकर युवा लड़कियों को प्रेरणा मिलती है जब वे सरिता की उपलब्धियों को देखती हैं।राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सरिता को देखकर अन्य महिलाओं ने बड़ा सपना देखना शुरू किया है, यह महत्वपूर्ण है। कई पुरुष और महिलाएं आज सरिता से ट्रेनिंग लेती हैं। उनमें से कुछ ने बॉडी बिल्डिंग के क्षेत्र में पहले से ही अपनी छाप छोड़ना शुरू कर दी है।

सरिता ने नियमित रूप से कसरत के व्यस्त कार्यक्रम के साथ अपने परिवार के जीवन को संतुलित करने के गुर बड़े अच्छे से सीख लिए हैं। वो दूसरों को भी तगड़े प्रशिक्षण देती हैं और प्रतियोगिताओं की तैयारी में सफलतापूर्वक कामयाब रही हैं। वह अपने दो बेटों तामो और नानाओ से बहुत प्यार करती हैं। उनके ससुराल वालों को भी उन पर बहुत गर्व है। सरिता ने दोहराया कि एक महिला जो किसी भी क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का पीछा करती है, वह कभी भी परंपराओं और मूल्यों के लिए खतरा नहीं है। हर महिला को अच्छी मां होना चाहिए और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उचित तरीके से अपने बच्चों का लालन-पालन करना चाहिए। महिलाओं को भी जागरूक होना चाहिए और खेल के बारे में जागरूकता पैदा करना चाहिए। खेल सिर्फ फिटनेस के बारे में ही नहीं बल्कि लोगों में अनुशासन और नैतिकता के लिए एक मंच है। जो लोग अनुशासन और नैतिकता की कीमत मानते हैं, वे निश्चित रूप से शांतिपूर्ण होंगे।

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