समाज से लड़कर बेटियों के उद्यमी सपनों को पंख देने वाली माँ

माँ की मेहनत लाई रंग, बेटियां ले गईं पिता के व्यवसाय को ऊंचाईयों पर...

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बात चाहे आज से पचास साल पहले की हो या फिर आज के समय की, एक औरत को बेटियों को पालने और बड़ा करने में जितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, उतना बेटों के लिए नहीं और ये सबकुछ तब और मुश्किल हो जाता है, जब कोई औरत तीन बेटियों को माँ हो। सुलोचना भी एक ऐसी ही माँ हैं, जिनके पास तीन बेटियां हैं, लेकिन उन्होंने कभी अपनी बेटियों को ये एहसास नहीं होने दिया कि लड़कियों के लिए समाज में कोई चीज़ नामुमकिन नहीं। और उनकी इसी सोच ने आज उनकी बेटियों को पहुंचाया एक ऐसे मकाम पर जहां पहुंच पाना सबके बस की बात नहीं। काश की दुनिया की हर माँ सुलोचना जैसी हो पाती...

तीन बेटियों के जन्म के बाद, सुलोचना बेटा न होने के चलते शर्मिंदा थीं। शिक्षा और अन्य सहायता तक सीमित पहुंच के साथ, वह महसूस कर रही थीं कि अगर परिवार गाँव से बाहर निकल जाती हूं तो यह सबसे अच्छा होगा। लेकिन घर से दूर जाने के बजाय सुलोचना ने वो सुनिश्चित किया जो उनकी बेटियों के सुनहरे भविष्य के लिए ज़रूरी था।

समाज में स्त्रियों को लेकर काफी स्टीरियोटाइप बने हुए हैं। कहा जाता है कि स्त्रियां केवल घरों में काम करने और बच्चों को पालने के लिए होती हैं। लेकिन ये महज एक गंदी मानसिकता है। इससे बाहर आकर लोगों ने समाज को आइना दिखाया है। यहां हम बात कर रहे हैं एक ऐसी माँ के बारे में, जिसने समाज और अपने समुदाय से लड़कर अपनी बेटियों के सपनों को पंख दिए हैं।

सुलोचना चौधरी की दुनिया उनकी तीन बेटियों के आसपास घूमती है। एक रूढ़िवादी मारवाड़ी परिवार से होने के नाते सुलोचना के लिए अपनी बेटियों को सर्वव्यापी लिंग असमानता से बचाना रोज का एक जैसा युद्ध था। सरकार और उद्योग की कई योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा देने से सुलोचना जैसी माताओं की कहानियों को प्राथमिकता दी गई है। सुलोचना कहती हैं, "मैंने अपनी बेटी को गोद में लिया, उसे चूमा और उससे कहा, 'तू मेरा तीसरा बेटा होगा। मैं तुझे सर्वश्रेष्ठ दूँगी।' और सुलोचना ने कर दिखाया।

तीन बेटियों के जन्म के बाद, सुलोचना बेटा न होने के चलते शर्मिंदा थीं। शिक्षा और अन्य सहायता तक सीमित पहुंच के साथ, वह महसूस कर रही थीं कि अगर परिवार गाँव से बाहर निकल जाती हूं तो यह सबसे अच्छा होगा। लेकिन घर से दूर जाने के बजाय सुलोचना ने सुनिश्चित किया कि छुट्टी वाले दिन अपने गांव का दौरा अपने परिवार के साथ करेंगी। कई दिक्कतों को बावजूद सुलोचना अपनी बेटियों को अपने घर और परिवार से जोड़े रखना चाहती थीं। सुलोचना के मुताबिक, "अपनी बेटियों को अपने गृहनगर से जोड़ना महत्वपूर्ण था।"

उनकी उम्मीदों के मुताबिक, सुलोचना की बेटियों ने अमेरिका में अपनी हायर स्टडी समाप्त कर परिवार के व्यवसाय (जयपुर रग्स) में शामिल होने का फैसला किया है। आज आशा चौधरी कंपनी की सीईओ हैं, अर्चना चौधरी अमेरिका में कंपनी ऑपरेशन हेड हैं और कविता चौधरी डिजाइन की प्रमुख हैं। लड़कियों के पिता एनके चौधरी कहते हैं, "वे व्यवसाय को ऊंचाइयों पर ले गईं जो मैं अकेले नहीं कर पा रहा था।"

दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचने और गांव के समुदायों के साथ बंधन स्थापित करने के इरादे से 'जयपुर रग्स' ने महिलाओं को बुनाई शुरू करने में सक्षम बना दिया है। आज बहुत से ग्रामीण लोग आर्थिक सहायता के निरंतर माध्यमों से जीते हैं। एक कठोर कौशल प्रशिक्षण और सामुदायिक गतिशीलता के बाद जयपुर रग्स लोगों को कुशल बना रहा है। कारीगरों को अपने दरवाजे पर प्रशिक्षण दिया जाता है। जब एक बार कालीन बन जाते हैं तो उन्हें अलग-अलग वैश्विक बाजारों में ले जाया जाता है। चौधरी कहते हैं कि "हम और अधिक महिलाओं को रोजगार दे रहे हैं और उनके लिए अवसरों की स्थापना कर रहे हैं ताकि वे विभिन्न स्तरों पर सफलता के जादू को फिर से बना सकें।"

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