181 साल बाद उत्तराखंड में शुरू होगी राज्य में पैदा की जाने वाली चाय की बिक्री

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उत्तराखंड टी डेवलपमेंट बोर्ड के एक अधिकारी ने बताया कि राज्य में उत्पादित चाय को बेचने के लिए डिस्ट्रीब्यूटरों की खोज की जा रही है और जल्द ही इस योजना को अंजाम दिया जाएगा।

सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार- टी बोर्ड)
सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार- टी बोर्ड)
उत्तराखंड के कई क्षेत्रों का मौसम चाय की खेती के लिए काफी अनूकूल है, लेकिन उस स्तर पर अभी इसे बढ़ावा नहीं मिला है जिससे किसानों को भारी आमदनी हो सके। 

 देश की आजादी के बाद चाय की खेती बंद सी हो गई थी। तत्कालीन सरकार ने चाय की खेती कराने पर जोर दिया और टी बोर्ड बनाया था। 

उत्तराखंड में रहने वाले लोग अब अपने राज्य में उत्पादित चाय का आनंद ले सकेंगे। इसके पहले राज्य की सारी चाय या तो विदेशों में एक्सपोर्ट कर दी जाती थी या फिर उसे कोलकाता की मशहूर चाय मंडियों में भेज दिया जाता था। जो कुछ कम गुणवत्ता की चाय बचती थी उसे लोकल मार्केट में बेचा जाता था। लेकिन अब उत्तराखंड के लोग अपने यहां की प्रीमियम चाय की चुस्की ले सकेंगे। उत्तराखंड के चंपावत, घोड़ाखाल, गैरसैंण और कौसानी जैसी जगहों पर चाय की खेती होती है। इन चाय बागानों से हर साल लगभग 80 हजार किलो चाय का प्रोडक्शन होता है।

उत्तराखंड टी बोर्ड ने राज्य के चाय बागानों में पैदा होने वाली चाय को लोकल मार्केट में बेचने का फैसला किया है। चाय बेचने के लिए एजेंसियों की तलाश भी शुरू हो गई है। बताया जा रहा है कि उत्तराखंड के इतिहास में 181 सालों बाद ऐसा हो रहा है। उत्तराखंड में लगभग 200 सालों से चाय की खेती हो रही है। टी बोर्ड के मुताबिक अंग्रेजों ने सबसे पहले चंपावत क्षेत्र में चाय की खेती शुरू की थी। जब देश आजाद हुआ तब भी यहां के लोकल निवासियों को उत्तराखंड की चाय नसीब नहीं होती थी

हालांकि 1995 में टी बोर्ड बनाया गया, लेकिन चाय की बिक्री संभव नहीं हो पाई और सिर्फ एक्सपोर्ट का काम होता रहा। नकदी फसल होने के कारण चाय की खेती से यहां के किसानों की आजीविका चलती है और कई सारे लोगों को रोजगार भी मिलता है। उत्तराखंड के कई क्षेत्रों का मौसम चाय की खेती के लिए काफी अनूकूल है, लेकिन उस स्तर पर अभी इसे बढ़ावा नहीं मिला है जिससे किसानों को भारी आमदनी हो सके। इसलिए चाय की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए किसानों को आगे आने के लिए कहा जाता है। टी बोर्ड चाय की नर्सरी लगाने के साथ ही उनकी देखभाल करने का काम करता है। हालांकि मार्केट, ट्रांसपोर्टेशन और मजूदरों को उचित पेमेंट न मिलने जैसी कई समस्याएं आती हैं, लेकिन राज्य में खुली चाय बेचने से यहां की लोकल मार्केट को बढ़ावा मिल सकेगा और समस्याओं का कुछ समाधान भी निकल सकता है। यहां के बागान मालिक बताते हैं कि कई सालों से उन्हें नियमित तौर पर किराया भी नहीं मिलता है जिससे उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है। राज्य में पूरी तरह से ऑर्गैनिक तरीके से चाय की खेती की जाती है।

जब टी बोर्ड का गठन हुआ था तब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश में आता था। उसके पहले देश की आजादी के बाद चाय की खेती बंद सी हो गई थी। तत्कालीन सरकार ने चाय की खेती कराने पर जोर दिया और टी बोर्ड बनाया था। अब कई जिलों में चाय की खेती की जाती है। यह सारी खेती टी बोर्ड के अंडर में ही होती है। नैनीताल के घोड़ाखाल, चम्पावत और चमोली के नौटी में जैविक चाय की पत्तियों को प्रोसेस करने के लिए फैक्ट्रियां लगाई गई हैं। उत्तराखंड टी डेवलपमेंट बोर्ड के एक अधिकारी ने बताया कि राज्य में उत्पादित चाय को बेचने के लिए डिस्ट्रीब्यूटरों की खोज की जा रही है और जल्द ही इस योजना को अंजाम दिया जाएगा।

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