सही समय पर सही फैसला और सही तालमेल से सफलता की सीढ़ियाँ चढ़तीं मीनू हाँडा की प्रेरक कहानी

आइपैन, माइक्रोसाॅफ्ट और अमेज़न - मीनू हांडा ने इन सभी को देखा है। बड़ी कंपनियों के साथ काम करने वाली यह जनसंपर्क प्रोफेशनल हर जगह कामकाजी महिलाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत रही हैं। बेबाक और बेझिझक शैली उनकी खास पहचान है। मीनू की जीवनयात्रा की कहानी जानने के लिए मैं उनसे उनके घर पर मिली। इस दौरान मुझे उनके प्रोफेशनल के कलेवर के पीछे मौजूद औरत को देखने का मौका मिला। अपने बच्चों और पालतू जीव के अनुरोध के कारण रुक-रुककर चलने वाली योरस्टोरी के साथ घंटे भर की लंबी बातचीत के दौरान मीनू ने अपने जीवन की सेरेंडिपिटी, अर्थात आकस्मिक लाभवृत्ति और खुद को गढ़ने में भूमिका निभाने वाले प्रभावों के बारे में खुलकर बातचीत की।मैंने उनके अंदर भारी अक्खड़पन और धैर्य पाया और जीवन में अपने तरीके से आने वाली चीजों में विश्वास करने वाली भी। एक मिलनसार और जीवन मूल्यों को समझने वाली मीनू की भावना से ओतप्रोत होकर मैं लौटी।...श्रद्धा शर्मा

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मीनू की कहानी, उनकी ज़ुबानी

अगर मुझे अपने जीवन का प्रेक्षक बनना होता, तो मैं कह सकती थी कि यह आकस्मिक लाभवृत्ति द्वारा नियंत्रित है। जीवन की अधिकांश अच्छी चीजें दुर्घटना वश हुई हैं, यहां तक कि मेरे बच्चे भी (मुस्कुराती है)। योजना नहीं बनाई गई थी, लेकिन दोनो पैदा हो गए। स्पष्ट है कि यह मौज-मजा का ही मामला रहा है। मुझे कहने दें कि मैं ऐसा क्यों कह रही हूं। वास्तव में मैं बास्केटबाॅल खेलती हूं। मैंने नेशनल बास्केटबाॅल टीम में थी। और इसने मुझे कैसे प्रभावित किया, इसकी एक दिलचस्प कहानी है।

बास्केटबाॅल, मेरा पहला जुनून

सातवीं कक्षा में एक दिन मुझे किसी कारण बास्केटबाॅल कोर्ट में जाना पड़ा (शायद कोर्ट बंद थे)। मैंने गेंद उठाई और उसे दो-तीन बार उछाला। गेंद उछालते हुए मुझे कोच ने देख लिया जो उसी सुबह आए थे। इसकी जो भी वजह रही हो, लेकिन ईश्वर उन पर कृपा करे, उन्होंने मुझे एक ओर बुलाया और बोले, "क्या तुम अपनी मां को बुला सकती हो और कल सुबह आ सकती हो?" मेरी मां हमेशा किसी चीज को आजमाने के लिए तैयार रहती थीं। उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है, हमलोग चलेंगे।" उन्होंने मेरी मां को बताया कि मुझमें अच्छी संभावना है और वे मुझे राष्ट्रीय स्तर के खेल के लिए दिल्ली राज्य की अंडर 12 टीम का हिस्सा बनाना चाहते हैं। इस प्रकार मुझे राज्य की टीम के लिए चुन लिया गया जबकि मैंने न तो कभी बास्केटबाॅल खेला था और न ही इसके नियमों का कुछ पता था।

राष्ट्रीय खेलों में मुझे बतौर एक्स्ट्रा रखा गया। इसलिए मैं बहुत निराश थी। सो, मैं रोने लगी - सचमुच रोने लगी। 11 साल की बच्ची को कहीं ले जाया गया और खेलने नहीं दिया गया! मैं सोचती हूं कि प्रतिस्पर्धा की भावना मेरे अंदर हमेशा से थी। इसलिए उनलोगों ने मुझे दूसरे मैच में खेलने दिया। मुझे नहीं मालूम कि मैं क्या कर रही थी। मैं बस दौड़ रही थी। जहां गेंद होती, मैं वहीं पहुंच जाती। एक बार गेंद मेरे हाथ लगी तो मैंने उछाल दिया क्योंकि मुझे नहीं पता था कि क्या करना है। भगवान जाने कि क्या हुआ। उसके बाद उनलोगों ने मुझे ज्यादा नहीं खेलने दिया।

हालांकि इस घटना के बाद खेल के प्रति मेरा समर्पण और भी मजबूत हुआ। जब मां-पिताजी सो ही रहे होते थे, मैं जाग जाती थी और अपना नाश्ता तैयार करके 6 बजे सुबह डीटीसी की बस पकड़ लेती थी। मैं 8 बजे तक खेलती थी और उसके बाद क्लास में जाती थी। दोपहर बाद हमलोगों को मैच खेलना होता था जब तापमान 42 डिग्री सेंटीग्रेड के आसपास होता था। लेकिन मैंने इसकी कभी फिक्र नहीं की। गर्मी की छुट्टियों में भी मैं 6.30 बजे स्कूल पहुंच जाती थी और 10 बजे तक खेलती थी। तो, इस तरह मैं खेल के प्रति काफी समर्पित थी। मुझे पक्का पता है कि आज भी कुछ बच्चे उतने ही समर्पित हैं, लेकिन वे कुछ अधिक मांग करते हैं। वे ज्यादा फैंसी जूतों की मांग करते हैं जबकि हमलोग अपने बाटा के जूतों से ही खुश थे (मुस्कुराती है)।

बास्केटबाॅल से परे जिंदगी

मेरे माता-पिता यूके चले गए और मैंने दिल्ली में सेंट स्टीफेंस काॅलेज में तीन साल पढ़ाई की। अब सवाल था कि जिंदगी में क्या किया जाय। मुझे मालूम था कि मेरे लिए बास्केटबाॅल में कोई भविष्य नहीं था क्योंकि उसमें पैसा नहीं है।

मेरे माता-पिता बहुत जोर दे रहे थे मैं यूके चली जाऊं लेकिन उसी समय मेरी मुलाकात मेरे पूर्व-पति से हुई। वह मेरी प्रिय मित्र का भाई था। मैंने खुद से कहा कि अब तो वहां जाने से बचने का कोई रास्ता नहीं है।

मैं अपने उस मित्र के साथ स्कूल से ही समय गुजार रही थी और वह किसी इवनिंग कोर्स के लिए अपने एक मित्र से मिलने जा रही थी जिसने जनसंपर्क और विज्ञापन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा कर रखा था। मैंने भी इवनिंग कोर्स कर लेने का फैसला किया जिससे मेरे रिज्यूम में कुछ तो हो। कोर्स की समाप्ति के दिनों में मैं जनसंपर्क उद्योग के बारे में एक कहानी पढ़ रही थी और उसमें आइपैन का जिक्र आया था। इस कंपनी में मेरी दिलचस्पी बढ़ गई थी। मुझे पता चला कि कोर्स करने वाली जिस लड़की से मैंने बात की थी वह आइपैन में थी।

यह शुरुआती 1990 की बात है। सो, मैंने आइपैन से संपर्क किया। उस समय उनके कार्यालय में कोई जगह खाली नहीं थी और मुझे बाद में मिलने के लिए कहा गया। वहां छोड़कर मैंने दूसरी जगहों पर आवेदन देना शुरू किया लेकिन मेरी दिलचस्पी तो आइपैन में थी। जब आप किसी कार्यालय में जाओ तो किसी न किसी तरह पता चल ही जाता है कि आप सही जगह पर हैं। जो हो, मैं आइपैन में काम करने का अपना सपना नहीं भूली और गाहे-बगाहे वहां संपर्क करती रही। आखिरकार, उन लोगों ने अपना मन बदला और कहा, ‘‘देखो, कार्यालय में तो कोई जगह खाली नहीं है, इसलिए तुम्हें रिसेप्शन में बैठना पड़ेगा।" तो मैंने और एक और लड़की ने वहां एक साथ ज्वाइन कर लिया। हमारे डेस्क प्रतीक्षा कक्ष के क्षेत्र में रखे गए। यह मेरे कैरियर की वास्तविक शुरुआत थी।

आइपैन से प्रस्थान

मैं आइपैन में 15 वर्षों तक रही। एक तरह से यह पेशा, यह कंपनी मेरी जीवनसाथी बन गई थी। उसके बाद कई कारणों से संस्थापक CEO ने आइपैन छोड़ दिया। इसके कारण कंपनी में भारी खालीपन आ गया। उसे वस्तुतः मैं चला रही थी। उसी समय, मैंने उम्मीद की थी कि परिस्थिति को बेहतर ढंग से संभाल लूंगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कंपनी ने किसी और को CEO के रूप में लाने का फैसला किया। उसी समय मैंने सोचा कि मेरे लिए कहीं और जाने का समय आ गया। मैंने सोचा ही था कि माइक्रोसाॅफ्ट से साबका हो गया।

इस बार भी, एक मित्र ने मुझे माइक्रोसाॅफ्ट के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष से मिलाया क्योंकि वे मेरी जैसी पृष्ठभूमि वाले किसी की तलाश में थे। मैं उनसे मिली और तत्काल बात पक्की हो गई। माइक्रोसाॅफ्ट में साढ़े सात वर्ष रहने के दौरान मैंने एक टीम तैयार कर दी। लेकिन अब मैं बोर हो रही थी।

अमेजन किसी की तलाश में था। हालांकि उनका कार्य संचालन कहीं और से होता था, फिर भी वे लोग मुझे दिल्ली से काम करने देने के लिए सहज तैयार थे।मैं अमेजन के साथ जुड़ गई।

संस्कार जिंदगी में निस्संदेह अंतर लाते हैं। मेरी मां जुझारू हैं। जब वह कुछ पाना चाहती हैं, तो पा लेती हैं। कहना नहीं होगा कि उनकी बहुत सारी चीजें मेरे अंदर भी हैं। हमने हमेशा अपनी राय मजबूती से रखी है, और कोई अपमान आसानी से बर्दाश्त नहीं कर लेती। मैं अपनी मां की तरह रिएक्ट करती रही हूं। यह बात नकारात्मक भी हो सकती है।

आपको बताऊं कि मेरे माता-पिता ने जब अपनी जिंदगी शुरू की थी तो उनकी जेब में मात्र 50 पैसे थे। उनलोगों ने सचमुच बहुत कठिन परिश्रम किया और हमलोगों को अच्छे पब्लिक स्कूल में भेजा। मेरी मां के दिमाग में बिल्कुल साफ था कि हमलोगों को अच्छे पब्लिक स्कूल में भेजना है। उन्होंने मेरे पिताजी से कहा था, "जो भी हो, हमलोगों को पक्के तौर पर तय करना होगा कि वे अंग्रेजी माध्यम के अच्छे स्कूल में पढ़ें।" हमलोग बहुत ऐश-आराम से नहीं रहे, लेकिन कुछ कमी भी नहीं महसूस होती थी। हमलोग अगर कुछ करना चाहते थे, तो कर डालते थे।

मैंने देखा था कि मेरी मां ने बिल्कुल शून्य से अपना घर खड़ा किया था। पिताजी वित्तीय मामलों की देखरेख करते थे। वह काम करने वाली मां थीं लेकिन वह साइट पर हर रोज जाती थीं और निर्माण कार्यों की निगरानी करती थीं। उनके लिए कोई चीज ऐसी नहीं थी जो महिला का काम नहीं हो।

जिस दूसरी चीज ने मुझे गढ़ा, वह था खेल, जो मैं खेलती थी। बास्केटबाॅल का खेल है। कोई भी खेल सिखाता है कि अच्छे दिन भी आते हैं और बुरे दिन भी। और आपको बस आगे बढ़ते रहना होता है। कोई खेल खेलना जिंदगी में बड़ा अंतर लाता है और टीम वाला खेल खेलना तो उससे भी बड़ा अंतर लाता है।

मूल-श्रृद्धा शर्मा

अनुवाद -राज वल्लभ

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