HIV पीड़ित बच्चों की तकदीर बनाने में जुटा एक दंपति, पति ने छोड़ी बैंक मैनेजर की नौकरी

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17 एचआईवी पीड़ित बच्चों की उठा रहे हैं जिम्मेदारी...

100 एचआईवी पीड़ित बच्चों की कर रहे हैं देखभाल...

6 सालों से एचआईवी पीड़ित बच्चों के लिए कर रहे हैं काम...

एचआईवी बच्चों के लिए छोड़ी बैंक मैनेजर की नौकरी...


हिन्दी फिल्म का एक गाना है “नन्हे मुन्हे बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है...मुट्ठी में है तकदीर हमारी” कुछ यही सोच है उन सत्रह एचआईवी पीड़ित बच्चों की, जिनकी जिम्मेदारी उठा रहे हैं पुणे में रहने वाले सुजाता और महेश। ये दोनों न सिर्फ इन बच्चों की जिम्मेदारी उठा रहे हैं बल्कि पुणे के आसपास के गांव में रहने वाले करीब सौ दूसरे एचआईवी पीड़ित बच्चों की भी देखभाल कर रहे हैं। कभी बैंक में मैनेजर रहे महेश ने इन बच्चों की खातिर अपनी नौकरी तक को ठोकर मार दी। इतना ही नहीं अपनी पत्नी सुजाता से शादी करने के लिए भी उनको अपने माता पिता का काफी विरोध झेलना पड़ा, क्योंकि सुजाता के माता पिता की मृत्यु एड्स की वजह से हुई थी।

महेश और सुजाता महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक गांव के रहने वाले हैं। सुजाता के माता पिता को एड्स जैसी गंभीर बीमारी थी और जब उनको इस बीमारी का पता चला, तब तक काफी देर हो गयी थी। इसके बाद सुजाता के माता पिता छह महीने के अंदर ही चल बसे। हालांकि सुजाता को ऐसी कोई बीमारी नहीं थी लेकिन जागरूकता की कमी के कारण गांव वालों ने सुजाता से नाता तोड़ लिया। उसी दौरान महेश एक बैंक में मैनेजर बन गये थे। जब महेश को सुजाता की तकलीफ के बारे में पता चला तो उन्होने फैसला लिया कि वो उनकी मदद करेंगे और सुजाता से शादी करेंगे। जिसका महेश के घरवालों ने काफी विरोध किया और उनको समझाने की काफी कोशिश की। महेश का परिवार काफी सम्पन्न था और सुजाता गरीब परिवार से थी इसलिये उनके माता पिता ने कहा कि ये मेल नहीं हो सकता। परिवार के विरोध के बावजूद महेश ने सुजाता से शादी करने के बाद ये सोच कर गांव छोड़ दिया कि भले ही उनका परिवार उनको ना समझे लेकिन उनके रिश्तेदार और दोस्त उनकी भावनाओं को समझेंगे। महेश को तब बड़ा झटका लगा जब उनकी सोच गलत साबित हुई और एक बार उनको भी लगने लगा था कि कहीं उनसे कोई बड़ी गलती तो नहीं हो गई।

तब महेश के मन में विचार आया कि अगर सामान्य बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार होता है तो जो बच्चे एचआईवी से पीड़ित हैं उनका क्या हाल होता होगा। इसके बाद महेश और सुजाता पुणे आ गए और फैसला लिया की वो अपनी नौकरी छोड़ ऐसे एचआईवी बच्चों के लिए काम करेंगे। साथ ही लोगों को जागरूक करेंगे कि एचआईवी को लेकर उनकी जो सोच है वो कितनी गलत है। इस तरह वो पुणे आकर एक स्वंय सेवी संस्था के साथ जुड़ गये जो एड्स के क्षेत्र में काम कर रहा थी। संस्था के जरिये वो गांव गांव जाते और लोगों को एचआईवी के प्रति जागरूक करने का काम करते। इस दौरान इन्होने एक आदिवासी गांव में देखा कि गांव वालों ने एक लड़के को गांव से बाहर रखा हुआ था क्योंकि उसका शरीर सड़ गया था और गांव का कोई भी व्यक्ति उसको अस्पताल ले जाने को तैयार नहीं था। तब महेश और उनकी पत्नी सुजाता उस लड़के को पुणे लेकर आये और उसका इलाज कराया।

इसके बाद महेश और सुजाता ने तय किया वो गांव गांव जाकर ऐसे बच्चों को ढूंढकर लाएंगे जिनका अपना कोई नहीं है। इसके बाद इन्होने गांव गांव जाकर ऐसे आदिवासी बच्चों को अपने साथ जोड़ा जो एचआईवी से पीड़ित हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। आज ये 17 बच्चों को अपने बच्चों की तरह पाल रह हैं। महेश का कहना है कि “मैं अपने बच्चों को बोलता हूं कि हमें मांग कर नहीं बल्कि लड़ कर मरना है।” यही वजह है कि महेश कभी भी मदद मांगने के लिए किसी के पास नहीं गये। आज ये अपने बच्चों की मदद से परफ्यूम, फिनाइल, फ्लॉवर पॉट, ग्रीटिंग कार्ड, दीये और मोमबत्ती बनाने का काम करते हैं ताकि ये बच्चे आत्मनिर्भर बन सकें। ये सारा समान आईटी कंपनियों को बेचा जाता है। महेश के मुताबिक “इन बच्चों को खाने से ज्यादा परिवार का प्यार चाहिए इन बच्चों को ये नहीं पता कि परिवार होता कैसा है।”

आज महेश और सुजाता के साथ रह रहे सभी 17 आदिवासी बच्चे जो एचआईवी से पीड़ित हैं वो सरकारी स्कूल में जाते हैं। इन बच्चों में 7 लड़कियां और 10 लड़के हैं। ये सभी बच्चे 6 साल से 16 साल तक के बीच हैं। खास बात ये हैं कि ये सभी बच्चे पढ़ाई में होशियार भी हैं। इन बच्चों में से दो लड़कियां 10वीं क्लास में हैं। महेश के मुताबिक इन बच्चों का इलाज पास के एक सरकारी अस्पताल से चल रहा है। पिछले 6 सालों से एचआईवी पीड़ित बच्चों के साथ जुड़े महेश और सुजाता बताते हैं कि जब उन्होने इस काम की शुरूआत की थी तो पुणे में एक मकान किराये पर लिया था। जिसके बाद आस पड़ोस के लोगों ने इनके साथ काफी बुरा व्यवहार किया लेकिन वक्त के साथ उनके रवैये में बदलाव आने लगा और आज वही लोग ना सिर्फ इनके साथ उठते बैठते हैं बल्कि जरूरत पड़ने पर मदद को भी तैयार रहते हैं।

महेश और सुजाता ना सिर्फ अपने साथ रह रहे 17 बच्चों की देखभाल का जिम्मा उठा रहे हैं बल्कि पुणे के आसपास के कई गांव के सौ और एचआईवी पीड़ित बच्चों की देखभाल भी कर रहे हैं। ये बच्चे भले ही अपने परिवार के साथ रहते हों लेकिन ये उनकी हर तरह की मदद के लिए तैयार रहते हैं। ये लोग इन बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य के अलावा उनके खाने पीने का भी ख्याल रखते हैं। महेश और सुजाता की शादी को करीब 9 साल हो गये हैं। आज इनका एक 7 साल का बेटा भी है जो एचआईवी पीड़ित दूसरे बच्चों के साथ स्कूल जाता है, उनके साथ खेलता है, खाना खाता है। अब महेश की कोशिश है कि इन बच्चों के लिए अपना कोई आशियाना हो जहां पर ये बेरोक टोक अपनी जिंदगी को और बेहतर तरीके से जी सकें।