अंग प्रत्यारोपण के माध्यम से पुनर्जीवन को प्राप्त हो रहे मरीजों को देख कर लाखों मायूस चेहरों को खुश होने की ठोस वजह मिल रही है किन्तु विडम्बना है कि उत्तर प्रदेश में प्रत्यारोपण के सहारे 'जीवन देने का यज्ञ' अपने अभीष्ट को प्राप्त नहीं कर पा रहा है। अंग प्रत्यारोपण के पुख्ता इंतजाम न होने से बीमारों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
उत्तर प्रदेश को अन्य राज्यों से सीखने की जरूरत है सिर्फ तमिलनाडु में ही 40 अस्पतालों में प्रत्यारोपण होता है। यहां इस पर ध्यान न दिए जाने के कारण अच्छे चिकित्सक भी नहीं रुकते हैं। आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु सहित कुछ राज्यों ने तो अतिविशिष्टता (डीएम, एमसीएच आदि) की पढ़ाई करने के बाद कम से कम दो वर्ष तक उसी राज्य में सेवा करने की शर्त तक लगा रखी है। 

सबसे बड़ा सवाल कि संसाधन तो मुहैया कराये जा सकते हैं और सरकार को आज नहीं तो कल यह कराना भी होगा किन्तु प्रत्यारोपण हेतु आवश्यक अंग की दरकार कैसे पूरी होगी? उसके तो दो ही तरीके हैं या तो मरीज के परिजन दें अथवा किसी ने देह दान की हो। अर्थात लिविंग डोनर और कैडबर डोनेशन। हालत यह है कि 20 करोड़ की आबादी वाले प्रदेश में एक वर्ष में 20 अंगदान भी नहीं होते हैं।

अंग प्रत्यारोपण के माध्यम से पुनर्जीवन को प्राप्त हो रहे मरीजों को देख कर लाखों मायूस चेहरों को खुश होने की ठोस वजह मिल रही है। किन्तु विडम्बना है कि उत्तर प्रदेश में प्रत्यारोपण के सहारे 'जीवन देने का यज्ञ' अपने अभीष्ट को प्राप्त नहीं कर पा रहा है। अंग प्रत्यारोपण के पुख्ता इंतजाम न होने से बीमारों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। विज्ञान कहता है कि अंग प्रत्यारोपण के माध्यम से तमाम लोगों को जीवन दिया जाना सम्भव है किन्तु सूबे में अंग प्रत्यारोपण के लिए पर्याप्त केन्द्र विकसित न होने के कारण समस्या विकराल हुई जा रही है। एक चिकित्सकीय आंकलन के अनुसार उत्तर प्रदेश में हर वर्ष एक लाख लोगों के गुर्दे किसी न किसी संक्रमण का शिकार बनते हैं। इनमें से चार हजार लोगों को गुर्दा प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, इसके सापेक्ष प्रदेश में प्रत्यारोपण की 10-15 फीसद की क्षमता होने के कारण लोग डायलिसिस पर रहने को विवश हैं। 

दरअसल अंग प्रत्यारोपण का पूरा भार राजधानी लखनऊ स्थित संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान के कन्धों पर है। यहां गुर्दा व यूरोलॉजी विभाग संयुक्त रूप से संचालित होता है और प्रत्यारोपण भी अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ही किया जाता है अत: गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए इतनी लम्बी कतार है कि एक साल तक की प्रतीक्षा सूची बनी रहती है। संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. राकेश कपूर कहते हैं कि सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं आस-पास के राज्यों और नेपाल, बांग्लादेश तक से मरीज एसजीपीजीआई में आते हैं। ऐसे में प्रतीक्षा सूची बनना स्वाभाविक है। बावजूद इसके हम हर वर्ष औसतन 130 से 150 गुर्दा प्रत्यारोपण कर लेते हैं। यद्यपि प्रदेश के कई अन्य संस्थानों को भी प्रत्यारोपण केन्द्रों के रूप में विकसित करने की क्षमता है। यदि उनमें आधारभूत ढांचा मुहैया करवा कर प्रत्यारोपण शुरू कर दिया जाए तो स्थितियां सुधर सकती हैं। प्रदेश में अंग प्रत्यारोपण का वातावरण बनाने की भी पहल होनी चाहिए ताकि लोग अधिक से अधिक संख्या में आगे आ सकें।

इस मामले में उत्तर प्रदेश को अन्य राज्यों से सीखने की जरूरत है सिर्फ तमिलनाडु में ही 40 अस्पतालों में प्रत्यारोपण होता है। यहां इस पर ध्यान न दिए जाने के कारण अच्छे चिकित्सक भी नहीं रुकते हैं। आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु सहित कुछ राज्यों ने तो अतिविशिष्टता (डीएम, एमसीएच आदि) की पढ़ाई करने के बाद कम से कम दो वर्ष तक उसी राज्य में सेवा करने की शर्त तक लगा रखी है। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश में यदि कोई ट्रांसप्लांट सर्जन रुकना चाहे, तो उसे सुविधाएं ही नहीं मिलतीं। इसका खामियाजा मरीजों को उठाना पड़ता है। अंग प्रत्यारोपण को लेकर शासन व प्रशासन के स्तर पर गम्भीर प्रयास न होने के कारण यहां प्रत्यारोपण बढ़़ने के बजाय घटने की स्थिति है। बीएचयू से सम्बद्ध अस्पताल में कुछ समय पहले तक प्रत्यारोपण होते थे, किन्तु अब बन्द हो गए। यहां जो चिकित्सक प्रत्यारोपण करते थे, वे दिल्ली चले गये और उनके जाने के बाद कोई वैकल्पिक प्रबन्ध नहीं किया गया। 

लखनऊ की किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में प्रत्यारोपण विभाग शुरू किया गया था, किन्तु वह प्रभावी नहीं साबित हुआ। वहां प्रत्यारोपण शुरू होकर बन्द हो गए। चिकित्सक की कमी इस समस्या का कारण मानी जा रही है। राजधानी के ही लोहिया संस्थान को भले ही उच्च स्तरीय मेडिकल कॉलेज में तब्दील करने की तैयारी हो रही हो, सभी सुपर स्पेशियलिटी विभाग भी कार्यरत हैं, ऑपरेशन थियेटर से लेकर अन्य सुविधाएं भी उच्च स्तरीय हैं, किन्तु प्रत्यारोपण अभी भी शुरू नहीं हुए। चिकित्सकों का मानना है कि आगरा, कानपुर, इलाहाबाद, मेरठ मेडिकल कॉलेजों में आधारभूत ढांचा उपलब्ध है, बस वहां थोड़ी कोशिशों से प्रत्यारोपण शुरू किया जा सकता है। कानपुर मेडिकल कॉलेज से सम्बद्ध हृदय रोग संस्थान एक अलग सुपर स्पेशियलिटी संस्थान है। वहां परास्नातक के बाद अतिविशिष्टता वाली एमसीएच तक की पढ़ाई भी होती है किन्तु प्रत्यारोपण सुविधा की पहल ही नहीं की जा रही है।

दीगर है कि संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में गुर्दे के साथ दिल, फेफड़ों व लिवर प्रत्यारोपण भी होता है किन्तु लिवर व दिल प्रत्यारोपण की सुविधा का पूरा लाभ मरीजों को नहीं मिल पा रहा है। एसजीपीजीआई में लिवर ट्रांसप्लांट कार्यक्रम को बार-बार ब्रेक लग रहा है। विशेषज्ञों की टीम, अलग यूनिट, पांच मंजिला भवन फिर भी सारी कवायद बेकार। लिवर ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ.अभिषेक यादव के जाने के बाद से एक भी प्रत्यारोपण नहीं हो सका है जबकि दावा किया गया था कि यहां ट्रांसप्लांट के लिए विशेषज्ञों की पूरी टीम है पर, यह टीम अब तक एक भी ट्रांसप्लांट नहीं कर सकी। यही नहीं लिवर ट्रांसप्लांट एवं हिपैटोबाइलियरी साइंस के नाम से अलग यूनिट बनाई गई। इसका पांच मंजिला भवन बन कर तैयार है पर यहां काम शुरू नहीं हो सका। एसजीपीजीआई में साल 2000 में पहला लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था। इसके बाद वर्ष 2003 में एक बच्चे का लीवर ट्रांसप्लांट किया गया। यह बच्चा अब युवा हो चुका है। 

इन्हीं सब कवायद के बीच वर्ष 2005 में सर्जिकल गैस्ट्रो एंट्रोलॉजी विभाग में लिवर ट्रांसप्लांट यूनिट बनाई गई। इसके पांच मंजिला भवन के लिए 200 करोड़ रुपये खर्च किए गए। संजय गांधी पीजीआई में जब लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा शुरू हुई थी तब खर्च पांच लाख रुपये आता था आज से लगभग 15 साल पहले भी यह शुल्क देश में सबसे कम था। लेकिन पीजीआई में चल रही आपसी खींचतान के चलते मरीजों को दूसरे प्रदेशों में 30 लाख रुपये खर्च कर ट्रांसप्लांट कराना पड़ रहा है। एसजीपीजीआई में लिवर ट्रांसप्लांट शुरू हो जाए तो प्रदेश ही नहीं, बिहार, मध्य प्रदेश, नेपाल तक के मरीजों का लाखों रुपये का खर्च बच जाएगा। प्राइवेट हॉस्पिटल में लिवर ट्रांसप्लांट जहां 30 से 35 लाख रुपये में होता है, वहीं एसजीपीजीआई ने न्यूनतम 12 और अधिकतम 15 लाख रुपये में ट्रांसप्लांट करने का दावा किया गया था लेकिन अचानक एक विशेषज्ञ के चले जाने से इस पर ब्रेक लग गया है।

अब सबसे बड़ा सवाल कि संसाधन तो मुहैया कराये जा सकते हैं और सरकार को आज नहीं तो कल यह कराना भी होगा किन्तु प्रत्यारोपण हेतु आवश्यक अंग की दरकार कैसे पूरी होगी? उसके तो दो ही तरीके हैं या तो मरीज के परिजन दें अथवा किसी ने देह दान की हो। अर्थात लिविंग डोनर और कैडबर डोनेशन। हालत यह है कि 20 करोड़ की आबादी वाले प्रदेश में एक वर्ष में 20 अंगदान भी नहीं होते हैं। 

यहां वर्ष 2016 में सिर्फ सात शरीर दान हुए, वह भी तब जब इसके लिए तमाम अतिरिक्त कोशिशें की गईं। उत्तर प्रदेश की तुलना में एक तिहाई आबादी वाले तमिलनाडु में वर्ष 2014 में 136 लोगों ने शरीर दान किया है। इसके बाद 58 शरीरदानों के साथ केरल दूसरे और 52 के साथ महाराष्ट्र व आंध्र प्रदेश तीसरे स्थान पर है। छह करोड़ की आबादी वाले कर्नाटक व गुजरात राज्यों से भी क्रमश: 28 व 20 लोगों ने शरीर दान किया है, वहीं महज 13 लाख आबादी वाले पुड्डुचेरी में 13 और 11 लाख आबादी वाले चंडीगढ़ से छह लोगों ने वर्ष 2014 में शरीर दान किया है। उत्तर प्रदेश के लिए संतोष की बात बस यह हो सकती है कि जहां वर्ष 2012 व 2013 में यहां एक भी शरीर दान में नहीं मिला था, वर्ष 2014 में सात लोगों ने शरीर दान किया। 

यहां विचारणीय बिन्दु यह है कि प्रदेश में प्रत्यारोपण के लिए हर वर्ष औसतन छह हजार दिलों-फेफड़ों की जरूरत होती है। चिकित्सकों के मुताबिक गुर्दा रोगियों को तो डायलिसिस के सहारे जिन्दा रखा जा सकता है किन्तु दिल के प्रत्यारोपण वाले मरीजों की तो इस इंतजार में मौत ही हो जाती है। चिकित्सकों के मुताबिक लिवर खराब होने की समस्या सर्वाधिक चिन्ताजनक स्थिति में है। हर वर्ष औसतन 15 हजार मरीजों के लिवर प्रत्यारोपण की स्थिति में होते हैं। इनके प्रत्यारोपण की व्यवस्था न होने से बेहद दिक्कत होती है। कई मरीज तो बिना जाने ही मौत के मुंह में समा जाते है। 

उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक गुर्दा प्रत्यारोपण होते हैं, किन्तु उनमें भी लिविंग डोनर ही ज्यादा होते हैं। गुर्दा प्रत्यारोपण के मामले में भी लिविंग डोनर मिलने में दिक्कत आती है। मधुमेह के कारण किडनी सर्वाधिक खराब होती हैं और ऐसे में जब गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए दानदाता की पड़ताल शुरू होती है, तो कई बार घर में सभी की किडनी पूरी तरह स्वस्थ नहीं मिलती। चिकित्सकों के मुताबिक 40 से 50 फीसद मामलों में ऐसा ही होता है। यदि अंगदान का वातावरण बने और लोग आगे आएं तो हालात बदल सकते हैं। आशा है कि आने वाले वक्त में उत्तर प्रदेश भी प्रत्यारोपण के सहारे 'जीवन देने के यज्ञ' को सफल कर पाएगा। 

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