मधुमक्खी पालन से सालाना बीस लाख तक की कमाई

मधुमक्खी पालन से करें लाखों में कमाई...

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उत्तर प्रदेश में मधुमक्खियों का पालन कर अम्बेडकरनगर के मिठाई लाल हर साल चार लाख रुपए कमा रहे हैं और गोसाईंगंज के बृजेश कुमार की सालाना दस लाख रुपए तक की कमाई हो रही है। बिहार के शिवचंद्र प्रसाद सिंह और रमेश रंजन के घर-परिवार में भी इस उद्यम ने मिठास घोल रखी है। रमेश रंजन तो हर साल पंद्रह-बीस लाख रुपए तक कमा ले रहे हैं। इन ग्रामीण उद्यमियों के साथ बड़ी संख्या में युवाओं को भी रोजगार मिल रहा है।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
हमारे देश में मधुमक्खी पालन मुख्यतः वनों पर आश्रित रहा है। अनेकशः प्राकृतिक वनस्पतियों से इसका संरक्षण होता है। इस तरह शहद उत्पादन के लिए कच्चा माल प्रकृति से स्वतः उपलब्ध हो जाता है। वन प्रदेशों में मधुमक्खी पालन के लिए न तो अतिरिक्त भूमि लगती है, न ही उसे कृषि अथवा पशुपालन से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है।

हमारे देश में मधुमक्खियों से शहद निकालकर मुद्दत से कमाई हो रही है। मधुमक्खी पालन का पुराना इतिहास है। प्राचीन काल में शहद हिंदुस्तान की गुफाओं, वनों के निवासियों पहला मीठा आहार और औषधि रही है। प्रागैतिहासिक मानव मधुमक्खियों के छत्ते प्रकृति का सबसे मीठा उपहार मानता था। कंदराओं में चित्रकला के रूप में मधुमक्खी पालन के प्राचीनतम अभिलेख मिलते हैं। सभ्यता के विकास के साथ शहद ने प्राचीन भारतीयों के जीवन में अद्वितीय स्थान प्राप्त कर लिया। वे शहद को जादुई पदार्थ मानते थे, जिससे स्त्रियों, मवेशियों की स्वास्थ्य-चिकित्सा और खेती की उर्वरता नियंत्रित की जाती थी।

हमारे देश में मधुमक्खी पालन मुख्यतः वनों पर आश्रित रहा है। अनेकशः प्राकृतिक वनस्पतियों से इसका संरक्षण होता है। इस तरह शहद उत्पादन के लिए कच्चा माल प्रकृति से स्वतः उपलब्ध हो जाता है। वन प्रदेशों में मधुमक्खी पालन के लिए न तो अतिरिक्त भूमि लगती है, न ही उसे कृषि अथवा पशुपालन से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। मधुमक्खी पालकों को यह उद्यम संभालने में मात्र निगरानी के कुछ घंटे बिताने पड़ते हैं। इस तरह वहां के ग्रामीणों एवं जनजातीय किसानों के लिए यह मुफ्त का आंशिक व्यवसाय हो जाता है। परम्परागत ग्रामोद्योगों के लिए जब खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग की स्थापना हुई तो वर्ष 1980 के दशक में पहली बार एक मिलियन मधुमक्खी छत्ते उत्पादित किए गए। आज विभिन्न स्तरों पर देश में शहद उत्पादन 10,000 टन से ज्यादा होने लगा है। यह वनवासियों और जनजातियों का तो पारंपरिक व्यवसाय रहा ही है, आज देश के जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों में बड़े पैमाने पर उन्नत खेती करने वाले किसान भी एपिस सेरेना, यूरोपिय मधुमक्खी, एपिस मेलिफेरा एवं देशज प्रजातियों की मधुमक्खियों के पालन से एक वर्ष में 15 से 20 लाख रुपए तक की कमाई कर ले रहे हैं।

अम्बेडकरनगर (उ.प्र.) के गांव नारायनपुर के रहने वाले मिठाई लाल एक साल में मधुमक्खी पालन कर तीन से चार लाख रुपए की कमाई कर रहे हैं। उनके साथ एक दर्जन से अधिक बेरोजगारों को भी उद्यम मिला हुआ है। वह पढ़े-लिखे किसान हैं। जब कोई नौकरी, काम-धंधा नहीं मिला तो वह वर्ष 2002 से मधुमक्खी पालन में जुट गए। कारोबार लगातार बढ़ता गया और उन्हें लाखों रुपये की सालाना आमदनी होने लगी। उन्होंने अब साठ डिब्बों में मधुमक्खियां पाल रखी हैं। वह बताते हैं नवंबर से अप्रैल तक का महीना मधुमक्खी पालन के लिए सबसे उपयुक्त रहता है। एक डिब्बे से 25 से 40 किलो तक यानी बीस-पचीस कुंतल शहद मिल जाती है। वह शहद से तो कमाई करते ही हैं, मधुमक्खियों की भी बिक्री कर दोहरी कमाई कर लेते हैं। इस कमाई से वह घर-गृहस्थी ही नहीं चला रहे बल्कि अपने नए मकान का निर्माण भी कराया है। इसी आमदनी से उनके बच्चों को उच्च शिक्षा मिली और बेटी की शादी हुई है।

मिठाई लाल का कहना है कि कृषि से जुड़े युवाओं के लिए सबसे कम लागत पर मधुमक्खी पालन एक सफल रोजगार हो सकता है। उत्तर प्रदेश में ही गोसाईंगंज के मदारपुर गांव के एक अन्य कामयाब मधुमक्खी पालक हैं बृजेश कुमार। वर्ष 1993 में उनके गांव में जब एक प्रशिक्षण शिविर लगा था, परिजनों की उपेक्षा के बावजूद उन्होंने इस उद्यम में हाथ डाल दिया। शुरुआत में मधुमक्खी पालन से आठ-दस किलो तक शहद मिल पाती थी। लगभग तीन साल बाद जब उद्यान विभाग ने अंबेडकर विशेष रोजगार योजना शुरू की, मधुमक्खी पालन के लिए गोसाईंगंज ब्लॉक से उनके साथ ही 42 और लोगों को इस उद्यम का अवसर मिला। उस वक्त तक शहद बेचने के लिए बाजार नजर नहीं आ रहा था। वह शहद उत्पादन बढ़ाने के लिए यूपी स्टेट एग्रो की नोएडा इकाई पहुंचे। वहां के इंजीनियरों ने उनका शहद उद्योग से जुड़ी कंपनियों से तालमेल करा दिया। इसके बाद वह प्रदेश सरकार के कुछ आला अफसरों से भी मिले तो वर्ष 2001 में राज्य सरकार की ओर से गांव में ही शहद निकालने की यूनिट स्थापित कर दी गई। उसके बाद सालाना वह लगभग बीस टन तक शहद का उत्पादन करने लगे।

इस समय वह 650 डिब्बों में इसकी खेती कर रहे हैं। उनके ब्लॉक में पिछले वर्ष 280 टन शहद का उत्पादन हुआ था। अपने उद्यम से उत्साहित होकर वह फूलों की खेती कर दवा बनाने के लिए कंपनियों को पराग भी बेच रहे हैं। अब उनके साथ एक दर्जन से अधिक लोगों को रोजगार भी मिला हुआ है और शहद से ही वह सालाना दस लाख रुपए तक कमा ले रहे हैं। इसके साथ ही वह अब तक उत्तर प्रदेश और बिहार के हजारों किसानों को मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण भी दे चुके हैं। अपने उद्यम में कामयाबी के लिए वह भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान और राज्यपाल से सम्मानित भी हो चुके हैं।

एक अन्य सफल शहद उद्यमी हैं वैशाली (बिहार) के शिवचंद्र प्रसाद सिंह। वह पिछले दो-ढाई दशक से हसपुरा प्रखंड के पहरपुरा गांव में मधुमक्खी पालन का व्यवसाय कर रहे हैं। अब तो वह बिहार ही नहीं, अन्य प्रदेशों में भी मधुमक्खी का पालन कर रहे हैं। वह बताते हैं कि मधुमक्खी पालन का व्यवसाय मात्र एक लाख रुपए की लागत से शुरू किया जा सकता है। यद्यपि इसके लिए बिहार सरकार से उन्हें समुचित सहयोग नहीं मिल रहा है। वह इटैलियन प्रजाति की मधुमक्खी का पालन करते हैं क्योंकि इस प्रजाति की मधुमक्खियां शरारती नहीं होती हैं। बॉक्स से निकलने के बाद वह पुन: बॉक्स में लौट आती हैं। जब उनके कार्यक्षेत्र में सरसों की फसल कट जाती है तो वे लीची उत्पादक मुजफ्फरपुर में मधुमक्खी पालन करने पहुंच जाते हैं। इसके साथ ही वह झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ तक सक्रिय रहते हैं। वह अपनी मधुमक्खियों को चीनी भी खिलाते हैं। 

मधुमक्खियों के बॉक्स सुदूर अन्यत्र ले जाने पर उन्हें अतिरिक्त परिवहन खर्च उठाना पड़ता है। बिचौलिये सौ रुपए प्रति किलो तक उनसे शहद खरीद लेते हैं। बाद वे काफी मुनाफे के साथ बड़ी कम्पनियों को बेच देते हैं। वह चाहते हैं कि बिहार के मधुमक्खी पालक स्वयं की कंपनी बनाएं। सरकार भी प्रदेश के मधुमक्खी पालकों को बिचौलियों के चंगुल से बचा सकती है। बिहार के एक अन्य सफल मधुमक्खी पालक हैं पटना के रमेश रंजन। उनके पिता चाहते थे कि वह कोई अच्छी नौकरी करें लेकिन बीकॉम की पढ़ाई बीच में छोड़कर वह मधुमक्खी पालन करने लगे। आज वह सालाना पंद्रह-सोलह लाख रुपए की कमाई कर ले रहे हैं। साथ ही उनके साथ लगभग दो सौ लोगों को रोजगार मिला हुआ है। उन्होंने मात्र पांच बक्सों से मधुमक्खी पालन शुरू किया था और आज वह सात सौ बॉक्स में यह खेती कर रहे हैं। एक बक्से से वर्ष में औसतन अस्सी किलो ग्राम तक शहद मिल जाती है। 

अब वह ऑटोमेटिक शहद प्रोसेसिंग प्लांट लगाने जा रहे हैं। वह अपने शहद की ऑनलाइन मार्केटिंग भी करने लगे हैं। वह मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, वैशाली, समस्तीपुर, भागलपुर के युवा किसानों को मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। वह बताते हैं कि मधुमक्खी पालन के लिए एक पेटी साढ़े तीन हजार रुपये तक में मिल जाती है, जिसमें दस फ्रेम होती हैं। एक फ्रेम में लगभग तीन सौ मधुमक्खियां पाली जा सकती हैं। एक फ्रेम से दो सौ ग्राम यानी दो किलो ग्राम तक शहद मिल जाता है। दस से पंद्रह दिनों में फिर से मधुक्खियों से फ्रेम भर जाते हैं। एक महीने में एक पेटी से चार किलो ग्राम तक शहद मिल सकती है, जिसे आराम से बाजार में सौ रुपए किलो तक बेचा जा सकता है। पेटियों की संख्या बढ़ाकर एक महीने में एक लाख रुपए तक की कमाई की जा सकती है। इसे आसपास की दुकानों, शहद कंपनियों के अलावा मोम निर्माताओं को भी बेचा जा सकता है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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