मणिपुर का 'माँ बाज़ार' (इमा केइथेल)

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वर्ष के आरंभ में आए भूकंप ने भले ही इमा केइथेल (मां बाजार या ईमा बाजार) की इमारत को नुकसान पहुंचाया हो लेकिन यह झटका उसे चलाने वाली और वहां काम करने वाली महिला उद्यमियों के साहस को नहीं डिगा सका है। महिलाएं इस बाजार को अपनी जीविका का स्रोत और स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में देखती हैं।

महिला या ‘मां’ बाजार के नाम से प्रसिद्ध ‘ईमा केइथेल’ की शुरूआत संभवत: 1500 ईसवी में हुई। राज्य के विभिन्न समुदायों से ताल्लुक रखने वाली महिलाएं इसे चलाती हैं। 

‘लघु मणिपुर’ के रूप में देखे जाने वाले इस बाजार में 4,000 से ज्यादा महिलाएं काम करती हैं। राज्य के लिए यह उसकी जीवन रेखा और बेहद महत्वपूर्ण बाजार भवन है।

बाजार परिसर में महिलाएं दुकान की मालकिन हैं या फिर वे दुकान लगाने के लिए जगह किराए पर लेती हैं। लेकिन भूकंप के बाद भवन के खंभों में दरारें आने के कारण बाजार अब सड़कों पर लगने लगा है।

यहां काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में जीविका कमाने वाली एकमात्र व्यक्ति होती हैं। ऐसे में उनके लिए इमारत की मरम्मत के लिए इंतजार करना और फिर वहां अपना व्यापार शुरू करने का विकल्प नहीं था।

बाजार में मछली बेचने वाली एक दुकानदार का कहना है, ‘यदि हम अपनी दुकानें वापस लगाने से पहले, इमारत की मरम्मत होने का इंतजार करते, तो हमारा घर कैसे चलता? बाजार को फिर से बनाने में वक्त लगेगा, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है, कि हमारी जिन्दगी ठहर जाएगी।’ महिलाओं के लिए यह बाजार सिर्फ आय का जरिया नहीं है, बल्कि वह लोगों को स्वतंत्रता का आभास भी कराता है।

करीब 60 वर्ष की प्रेमा कहती हैं, ‘मेरा परिवार मुझ पर निर्भर नहीं है। मेरे सभी बच्चे अच्छी नौकरी करते हैं। मैं पिछले सात वर्षों से यहां दुकान लगाती हूं, क्योंकि घर में मेरे करने के लिए कुछ खास नहीं होता है।’ 

कांगला फोर्ट के पास लगने वाले इस बाजार में चहल-पहल सुबह सात बजे से ही शुरू हो जाती है और सूर्यास्त के साथ ही दुकानें भी उठने लगती हैं।

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