झूठी खबरों के इस मायाजाल में...

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वास्तविक समाचार और जानकारियां, झूठी सूचनाओं और अफरातफरियों के एक स्खलन में दफन हो रही हैं। भारत और समूची दुनिया में फेक न्यूज का ट्रेंड जंगली आग की तरह फैल रहा हैं। ये खतरनाक चलन विभिन्न समुदायों, जातियों और धर्मों के बीच विवाद पैदा कर रहा है। हाल के दिनों में, नकली समाचारों से लोगों को गुमराह करने वाले कई उदाहरण सामने आए हैं।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
झूठे प्रचार की आड़ में कुछ लोगों के साथ-साथ संपूर्ण समुदायों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति तीव्र हो रही है क्योंकि लोगों को सोशल मीडिया से खबरें और सूचनाएं तेजी से प्राप्त होती हैं। इस तेजी में लोग ये क्रॉस चेक करना भूल जाते हैं कि सूचना का स्रोत कितना वैलिड है, उस पर कितना भरोसा किया जा सकता है।

पिछले महीने से एक चौंकाने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर घूम रहा है, जिसमें एक लड़की को जमीन पर मरी पड़ी है और दूसरी लड़की बालकनी से कूद जाती है और अपनी बहन के बगल में ही मर जाती है। इस वीडियो को भारत में शूट होने का दावा किया गया था लेकिन बाद में यह पाया गया कि ये दोनों बहनें इंडोनेशिया से हैं। 2006 में उनकी मां की मृत्यु के बाद वे अवसाद से पीड़ित थीं। 

वास्तविक समाचार और जानकारियां, झूठी सूचनाओं और अफरातफरियों के एक स्खलन में दफन हो रही हैं। भारत और समूची दुनिया में फेक न्यूज का ट्रेंड जंगली आग की तरह फैल रहा हैं। ये खतरनाक चलन विभिन्न समुदायों, जातियों और धर्मों के बीच विवाद पैदा कर रहा है। हाल के दिनों में, नकली समाचारों से लोगों को गुमराह करने वाले कई उदाहरण सामने आए हैं। झूठे प्रचार की आड़ में कुछ लोगों के साथ-साथ संपूर्ण समुदायों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति तीव्र हो रही है क्योंकि लोगों को सोशल मीडिया से खबरें और सूचनाएं तेजी से प्राप्त होती हैं। इस तेजी में लोग ये क्रॉस चेक करना भूल जाते हैं कि सूचना का स्रोत कितना वैलिड है, उस पर कितना भरोसा किया जा सकता है।

पिछले महीने से एक चौंकाने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर घूम रहा है, जिसमें एक लड़की को जमीन पर मरी पड़ी है और दूसरी लड़की बालकनी से कूद जाती है और अपनी बहन के बगल में ही मर जाती है। इस वीडियो को भारत में शूट होने का दावा किया गया था लेकिन बाद में यह पाया गया कि ये दोनों बहनें इंडोनेशिया से हैं। 2006 में उनकी मां की मृत्यु के बाद वे अवसाद से पीड़ित थीं। alt न्यूज़ (जोकि एक एक न्यूज़ फीचर-चेकिंग वेबसाइट है) के संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने डीडब्ल्यू को बताया, हम लगातार लोकप्रिय अफवाहों को उजागर करने और नकली समाचारों के रचनाकारों को बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन चिंता का विषय है कि फेक न्यूज के विस्तार का यह चलन सामाजिक अशांति पैदा कर रहा है।

कुछ दिनों पहले ही सोशल मीडिया पर रोहिंग्या विरोधी बयानबाजी के रूप में तमाम फेक, टैम्पर्ड, फोटोशॉप्ड, मिसलीडिंग वीडियो और फोटोज को तैराया जा रहा था। जिसमें विभाजनकारी तरीके से बच्चों की तस्वीरों का दुरुपयोग किया गया। अगस्त से म्यांमार के रखाइन प्रांत में हिंसा का नंगा नाच चल रहा है। और इसमें विद्वेष को बढ़ावा देने का काम सोशल मीडिया पर ये फेक खबरें कर रही हैं। जुलाई में, एक अफवाह थी कि पुरुषों का एक समूह है जो झारखंड में बच्चों का अपहरण कर लेता है। व्हाट्सएप के माध्यम से ये घबड़ा देने वाला मेसेज फैल गया था। इस मेसेज ने सैकड़ों लोगों की हिंसक भीड़ पैदा कर दी जिसने सात लोगों की हत्या कर दी। बाद में ये अफवाह झूठी साबित हुई और मारे गए लोगों निर्दोष साबित हुए।

कुछ महीने पहले, सरकारी वेबसाइटों और मुख्यधारा के टीवी चैनलों ने एक कहानी को परिचालित करते हुए कहा कि प्रसिद्ध उपन्यासकार अरुंधति रॉय ने कश्मीर में भारतीय सेना की भारी-भरकम उपस्थिति की आलोचना की है। परेश रावल जैसे बड़े नेता-अभिनेता ने भी इस फेक न्यूज की सच्चाई को बिना चेक किए हुए अरुंधति को लताड़ लगानी शुरू कर दी थी। तथाकथित राष्ट्रवादी दलों ने अरुंधति के खिलाफ प्रदर्शन भी शुरू कर दिया था। लेकिन बयानों के बारे में रॉय ने बाद में स्पष्ट किया कि उन्होंने भारत के द्वारा कश्मीर को नियंत्रित करने के बारे में वो टिप्पणियां नहीं की थीं। न ही ऐसा कोई ट्वीट मौजूद है। कुछ महीनों पहले, एक मृत सैनिक की तस्वीर वायरल की गई। उसमें एक संदेश के साथ यह दावा किया गया कि ये शरीर एक सिपाही तेज बहादुर यादव का था। बताया गया कि ये वही तेज बहादुर हैं, जिन्होंने अपने वीडियो में सीमा सुरक्षा में भोजन की खराब गुणवत्ता के बारे में शिकायत की थी। शोध के बाद यह पाया गया कि ये फोटो छत्तीसगढ़ के केंद्रीय राज्य में माओवादी हमले से थी।

भारत में इंटरनेट कनेक्टिविटी के बड़े पैमाने पर प्रसार से हर किसी के पास कुछ भी शेयर कर लेने का अधिकार आ गया है। अध्ययन बताते हैं कि भारत में अब 355 मिलियन इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। यह पूरी आबादी की लगभग 27% आबादी है। चीन के बाद भारत में अब दुनिया में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या सबसे ज्यादा है। कई सोशल मीडिया और संचार कंपनियों के लिए भारत सबसे बड़े बाजारों में से एक है, इसमें व्हाट्सएप के एक बिलियन से अधिक मासिक सक्रिय उपयोगकर्ता 160 मिलियन, 148 मिलियन फेसबुक यूजर और 22 लाख से अधिक ट्विटर अकाउंट होल्डर हैं।

इंटरनेट और मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया और आईएमआरबी इंटरनेशनल द्वारा निष्पादित एक अध्ययन ने निष्कर्ष निकला है कि 77 प्रतिशत शहरी इंटरनेट उपयोगकर्ताओं और 9 2 प्रतिशत ग्रामीण उपयोगकर्ताओं को इंटरनेट तक पहुंच बनाने के लिए प्राथमिक उपकरण के रूप में देखते हैं, जो काफी हद तक उपलब्धता और स्मार्टफोन की सामर्थ्य की तरफ इशारा करती है। कुछ टेलीफोन कंपनियां उपयोगकर्ताओं को प्रति दिन 4 जीबी की डाटा कैप के साथ मुफ्त डेटा प्रदान करती हैं। इसके कारण अन्य नेटवर्क प्रदाताओं को प्रतिस्पर्धी योजनाओं के साथ बहुत सस्ती दरों पर डेटा प्रस्तुत करने के लिए मजबूर कर दिया गया है। फिर हम क्या देखते हैं, नकली खबरों के संचलन की बढ़ती प्रवृत्ति सुरसा की तरह मुंह बा रही है

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