एक ओर मौखिक तलाक का विरोध तो दूसरी ओर मुस्लिम महिलाओं की बेहतरी में जुटी हैं नूरजहां

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वो मजबूत इरादों वाली महिला हैं और टक्कर दे रही हैं पुरुष प्रधान समाज को, अपना वाजिब हक पाने के लिये। उनका नजरिया दूसरों से अलग और प्रगतिशील है इसलिए वो निशाने पर रहती है कट्टरवादी सोच रखने वाले लोगों के। दकियानूसी विचारों के खिलाफ और आजाद सोच रखने वाली नूरजहां सफिया नियाज ने अपनी सहयोगी जकिया सोमन के साथ मिलकर भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की नींव रखी। जिसके बाद वो मुस्लिम समाज में मौखिक तलाक के खिलाफ मुहिम में जुटी हैं। ये उनकी ही कोशिशों का असर है कि उन्होने मुस्लिम फैमली लॉ का ड्रॉफ्ट तैयार किया। जिसके बाद वो इस कोशिश में है कि कोर्ट या सरकार पर्सनल लॉ में दखल दे और मुस्लिम महिलाओं के साथ मौखिक तलाक जैसे मामलों में लगाम लगे। इतना ही नहीं ये उन्ही की कोशिशों का नतीजा है कि तीन राज्यों में महिलाएं शरिया अदालतें चला रही हैं, जबकि पहले ये काम पुरुष ही संभालते थे।


मुंबई की रहने वाली नूरजहां सफिया नियाज ने विल्सन कॉलेज से फिलासफी जैसे विषय से ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से मास्टर्स इन सोशल वर्क में डिग्री हासिल की। कॉलेज के दिनों से ही नूरजहां का झुकाव सामाजिक कार्यों की ओर हो गया था इस दौरान वो एनएसएस की सदस्य भी रहीं। तब वो कई सामाजिक कार्यों में हिस्सा लेती थीं। नूरजहां के मुताबिक “समाज के लिए मुझे कुछ करना है ये समझ और इच्छा मेरे अंदर काफी समय से थी और जब मुझे कॉलेज में ऐसा काम करने का मौका मिला तो मेरा जुड़ाव इस ओर और ज्यादा हो गया।” एक ओर नूरजहां की मास्टर्स की पढ़ाई पूरी हुई ही थी कि उसी वक्त बाबरी ढांचे को ढहा दिया गया जिसके बाद कई जगह हालात खराब हो गये थे। तब नूरजहां राहत और पुर्नवास के काम में जुट गईं। इस दौरान उन्होने काफी करीबी से दंगों के बाद मुस्लिमों की स्थिति को जाना और समझा था। नूरजहां का कहना है कि “उस दौरान मुझे लगा कि अगर हम जैसे पढ़े लिखे लोग अपनी कौम और अपने समाज के लिए आगे नहीं आएंगे तो ये समाज आगे कैसे बढ़ेगा।” इस तरह उन्होने कई अलग अलग संस्थाओं के साथ काम किया और मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों को एकजुट करने और उनके सवालों को समझने की कोशिश की।


नूरजहां का सबसे ज्यादा जोर मुस्लिम महिलाओं को एकजुट करने और उनमें आत्मविश्वास पैदा करने पर रहा। साथ ही उन्होने कोशिश की कि जो मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे हैं उनके लिये खुद मुस्लिम महिलाएं आगे आएं। इस तरह साल 2007 में उन्होने जकिया सोमन के साथ मिलकर तय किया कि क्यों ना राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार किया जाये जिसमें मुस्मिल महिलाओं के सवालों को उठाया जा सके, मुस्लिम महिलाओं की लीडरशिप को बढ़ावा दे सके। जिसके बाद दोनों ने मिलकर भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की नींव रखी। नूरजहां के मुताबिक “तब मुझे लगा कि मुस्लिम महिलाओं में शिक्षा, सुरक्षा, वॉकेशनल ट्रेनिंग जैसे क्षेत्र पर तो काम करने की जरूरत तो है ही इसके अलावा मुस्लिम महिलाओं को कानूनी मदद की भी काफी ज्यादा जरूरत है।” क्योंकि तब नूरजहां के पास ऐसी कई महिलाएं आती थीं जो उनसे कहती थी कि उनके शौहर ने उनको छोड़ दिया है ऐसे में वो क्या करें? या उनका शौहर उनके साथ मारपीट करता है, या उनके शौहर ने दूसरी शादी कर ली है।


ऐसे तमाम कानूनी मुद्दों से जब नूरजहां का वास्ता पड़ा तो वो सोच में पड़ गई कि ऐसे मुद्दे पैदा ही क्यों होते हैं, क्यों ना ऐसे मुद्दों की जड़ को छुआ जाए, ताकि ऐसे मामले पैदा ही ना हो। नूरजहां ने जब इसकी तह में जाने की कोशिश की तो उनको पता चला कि संविधान में मुस्लिम फैमली लॉ नाम की कोई चीज ही नहीं है। जहां पर इस तरह के मुद्दों की सुनवाई हो सके। जबकि संविधान में हिन्दू कोड बिल है या पारसी या ईसाई समाज का कानून है। नूरजहां सफिया के मुताबिक “हमको लगने लगा था कि हमें कानून में सुधार के लिये काम करना चाहिए क्योंकि अगर मुस्लिम औरतें ऐसी आवाज नहीं उठाएंगी तो हमारे मुस्लिम भाई तो इसके लिये तैयार ही नहीं होंगे और सरकार मुस्लिम पर्सनल लॉ पर हाथ डालने को तैयार नहीं होती। जबकि पाकिस्तान और बंग्लादेश जैसे मुस्लिम देशों में भी अपना फैमली लॉ है। तो हमारे देश के मुसलमान एक बेहतर कानून क्यों नहीं चाहते हैं।” जिसके बाद इन लोगों ने एक मुहिम छेड़ी और 2014 में मुस्लिम फैमली लॉ पर एक ड्रॉफ्ट तैयार किया। जिसके बाद मानवाधिकार आयोग, लॉ कमीशन और सुप्रीम कोर्ट तक में ये अपने इस ड्रॉफ्ट को भेज चुके हैं। जिसके बाद इनकी कोशिश है कि सरकार या कोर्ट इस मामले में दखल दे ताकि दूसरे समुदाय के तरह मुस्लिम समाज को भी फैमली लॉ मिल सके। नूरजहां का कहना है कि अगर ऐसा कानून बनाने में वक्त लगता है तो कम से कम मौखिक तौर पर तलाक पर पाबंदी लगानी जरूरी है। इसके लिए ये देश भर में एक मुहिम भी चला रही हैं। नूरजहां इस बात पर जोर देती हैं कि “तलाक का ये पूरा तरीका ही गलत है क्योंकि कुरान में लिखा है कि अगर किसी को तलाक चाहिए तो पति पत्नी को बैठकर बात करनी चाहिए, जरूरत पड़े तो मध्यस्थ का इस्तेमाल करें, अपने घरेलू मामलों को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए। अगर बातचीत से मामला ना सुलझे तब तलाक की बात होनी चाहिए। तो क्यों नहीं हमारे मुल्ला मौलवी इन बातों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं।” वहीं दूसरी ओर नूरजहां मानती हैं कि मुस्लिम समाज में ऐसे भी काफी सारे लोग हैं जो आगे की सोचते हैं औरतों के सवाल पर इनके साथ खड़े हैं। बावजूद इनका कई स्तर पर विरोध होता है लेकिन नूरजहां और उनकी टीम इन सब से बेपरवाह लोगों को जगाने के काम में लगी है।


मस्लिम महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ने के अलावा भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन आज तीन जगहों पर शरिया अदालतें चला रहा है। हालांकि अब तक सिर्फ पुरुष ही शरिया अदालतें चलाते थे जिसके बाद इस संगठन ने तय किया कि महिलाएं खुद शरिया अदालत चलाएंगी। क्योंकि कई बार ऐसी शिकयतें मिली की जहां पर पुरुष लोग शरिया अदालतें चलाते हैं वहां पर महिलाओं की बिल्कुल सुनवाई नहीं होती और उनको तलाकनामा भेज दिया जाता था। नूरजहां के मुताबिक “ऐसी समस्याओं के तोड़ के लिए इस बात की जरूरत समझी गई कि महिलाओं की अपनी शरियत अदालतें हों जहां पर उनकी सुनवाई हो और उनको इंसाफ मिले।” नूरजहां के मुताबिक महिलाओं की ये शरिया अदालतें मुंबई के अलावा राजस्थान और तमिलनाडु में साल 2013 से चल रही हैं। इन शरिया अदालतों में घरेलू हिंसा, तलाक, शॉर्ट टाइम मैरिज जैसे कई मसले सामने आते हैं। पिछले ढ़ाई साल के दौरान महिलाओं की ये शरिया अदालतें एक हजार से ज्यादा मामलों को देख रही हैं।


इसके अलावा आजादी के बाद पहली बार भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने देश भर में एक सर्वे किया था जिसमें इन्होने महिलाओं से पर्सनल लॉ में बदलाव के बारे पूछा था कि उनको किस तरह का कानून चाहिए। ये सर्वे करीब 5 हजार मुस्मिल महिलाओं पर किया गया था। जिसमें कई चौकाने वाले परिणाम सामने आये। सर्वे के मुताबिक 92 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं ने कहा कि जुबानी तलाक की प्रथा को बंद किया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा होने से इनके साथ नाइंसाफी होती है। इसी तरह 91 प्रतिशत से ज्यादा महिलाओं ने अपने पतियों की दूसरी शादी का विरोध किया था। सर्वे में ये बात भी सामने आई की 78 प्रतिशत महिलाओं का तलाक एकतरफा हुआ। जबकि 82 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं ऐसी थी जिनके नाम पर कोई संपत्ति नहीं थी। नूरजहां के मुताबिक “जब हमारे सामने इस तरह की जानकारी आई तो इससे साफ हुआ कि मुस्लिम महिलाएं परेशान हैं और अब वो बदलाव चाहती हैं। इतना ही नहीं वो अपनी जिंदगी बेहतर तरीके से जीना चाहती हैं और अगर उसके लिए कोई बेहतर कानून होगा तो वो भी आत्मसम्मान से अपनी जिंदगी जी सकेगी।” इससे इनकी मुहिम को आगे बढ़ाने में मदद मिली। क्योंकि ये पहली बार था जब इनके पास कोई आंकडा था। नूरजहां का ये संगठन सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं लड़ता बल्कि मुस्लिम समाज की तरक्की के लिये कई दूसरे कार्यक्रम भी चलाता है। आज भारतीय मुस्मिल महिला आंदोलन मुंबई, भोपाल, कटक के अलावा दूसरे 4 शहरों में लड़कियों और लड़कों के लिये कारवां सेंटर चला रहा है। जहां पर इन लड़के लड़कियों को वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाती है ताकि वो अपने पैरों पर खड़े हो सकें। इसके अलावा ये युवाओं की समझ बढ़ाने की कोशिश करते हैं, उनको संवैधानिक अधिकारों की जानकारी देते हैं। साथ ही समाज में कैसे भाईचारा बनाये रखा जा सकता है उस पर ये काम करते हैं।  

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