मिलिए तमिलनाडु की पहली ट्रांसजेंडर वकील सत्यश्री शर्मिला से

तमिलनाडु में सत्यश्री शर्मिला ऐसी पहली वकील बन गई हैं जो ट्रांसजेंडर समुदाय से ताल्लुक रखती हैं...

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देश में LGBTQ समुदाय के लिए रोजगार में सहूलियतों को लेकर देश में तमाम बहसें चलती रहती हैं। इन बहसों से हमें कई बार लगता है कि ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए कभी तो ऐसा दिन आएगा जब उन्हें बाकी इंसानों की तरह ही बराबरी का दर्जा मिलेगा। इसी बीच तमिलनाडु से एक ऐसी खबर आई है जिससे धुंधली ही सही एक नई उम्मीद नजर आती है।

सत्यश्री शर्मिला
सत्यश्री शर्मिला
शर्मिला कहती हैं कि उनके पिता भी चाहते थे कि वह एक दिन वकील बनें। इस बात ने भी उन्हें काफी प्रेरित किया। शर्मिला कहती हैं कि हमें बराबर प्रतिनिधित्व के साथ ही सम्मान की भी जरूरत है।

देश में LGBTQ समुदाय के लिए रोजगार में सहूलियतों को लेकर देश में तमाम बहसें चलती रहती हैं। इन बहसों से हमें कई बार लगता है कि ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए कभी तो ऐसा दिन आएगा जब उन्हें बाकी इंसानों की तरह ही बराबरी का दर्जा मिलेगा। इसी बीच तमिलनाडु से एक ऐसी खबर आई है जिससे धुंधली ही सही एक नई उम्मीद नजर आती है। तमिलनाडु में सत्यश्री शर्मिला ऐसी पहली वकील बन गई हैं जो ट्रांसजेंडर समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। तमिलनाडु बार काउंसिल ने उन्हें वकील के रूप में नियुक्त किया है। अभी तक पूरे राज्य में एक भी ट्रांसजेंडर वकील नहीं था।

36 वर्षीय शर्मिला उन 485 युवाओं में से एक हैं जो तमिलनाडु बार काउंसिल में वकील के रूप में नामित होने का इंतजार कर रहे थे। वह तमिलनाडु की पहली ट्रांसजेंडर वकील बनने के साथ ही देश भर के उन चुनिंदा ट्रांसजेंडर वकीलों में शामिल हो गई हैं जिन्हें इस मुकाम तक पहुंचने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। वकील बनने से पहले शर्मिला ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए कार्यकर्ता के रूप में 11 सालों से काम कर रही थीं।

हालांकि शर्मिला के लिए इस मुकाम तक पहुंचना कतई आसान नहीं था। उन्हें कई तरह से अपमानित होना पड़ा और पढ़ा। इस खुशी के मौके पर काफी भावुक शर्मिला ने हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए कहा, 'जैसे ही जज ने मुझे राज्य की पहली ट्रांसजेंडर महिला कहा, मैं सब कुछ भूल गई। यह सुनकर मुझे खुशी का ठिकाना नहीं रहा।' शर्मिला का जन्म तमिलनाडु के रामनंतपुरम जिले में हुआ। उनका बचपन का नाम उदय कुमार था। पड़ोसियों के तानों की वजह से 18 वर्ष की उम्र में ही उन्हें घर छोड़ना पड़ा।

अपने बीते दिनों को याद करते हुए वह कहती हैं, 'मैं अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती थी। मैंने परमाकुड़ी से बी. कॉम किया। मैं देखती थी कि ट्रांसजेंडरों के साथ हर जगह भेदभाव होता है, इसलिए मैंने वकालत की पढ़ाई करने के बारे में सोचा। मैंने 2004 में सलेम गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में एलएलबी में दाखिला लिया। 2007 में अपना कोर्स खत्म किया।' लेकिन दुखद बात ये है कि उन्हें बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए 10 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा। शर्मिला कहती हैं कि उनके पिता भी चाहते थे कि वह एक दिन वकील बनें। इस बात ने भी उन्हें काफी प्रेरित किया। शर्मिला कहती हैं कि हमें बराबर प्रतिनिधित्व के साथ ही सम्मान की भी जरूरत है।

वह कहती हैं, 'ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ होने वाले बुरे बर्ताव के कारण मुझे बहुत दुख होता था। लेकिन मेरे अंदर आत्मविश्वास नहीं आ पा रहा था कि मैं वकालत की प्रैक्टिस शुरू कर पाऊं। हालांकि धीरे-धीरे चीजें बदलीं और अब जाकर मैंने बार काउंसिल में अपना रजिस्ट्रेशन करवा लिया है।' शर्मिला कहती हैं कि एक वकील के तौर पर वह अपने समुदाय के लिए हर जगह मजबूती से खड़ी रहेंगी।

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