शहनाई को वर्ल्ड क्लास बनाने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खां

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दुनियाभर में शहनाई के मधुर स्वर को पहचान दिलाने का श्रेय बिस्मिल्लाह खान को ही जाता है। वे संगीत से देश को एकता के सूत्र में पिरोना चाहते थे। वे कहते थे 'सिर्फ संगीत ही है, जो इस देश की विरासत और तहज़ीब को एकाकार करने की ताकत रखता है।' 

उस्ताद बिस्मिल्लाह (फोटो साभार: गूगल प्ले)
उस्ताद बिस्मिल्लाह (फोटो साभार: गूगल प्ले)
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को अपने शहर बनारस से बेइंतहा प्यार था। वह जिंदगी भर मंगलागौरी और पक्का महल में रियाज करते हुए जवान हुए, तो कहीं ना कहीं बनारस का रस उनकी शहनाई में तो टपकना ही था।

आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अल सुबह बजने वाली मंगल ध्वनि उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की तान है। एक समय था जब इस मंगल ध्वनि से ही पूरे देश की सुबह होती थी।

संगीत-सुर और नमाज इन तीन बातों के अलावा बिस्मिल्लाह खां की जिंदगी में और दूसरा कुछ न था। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान शहनाई का दूसरा नाम है। उस्‍ताद के लिए जीवन का अर्थ केवल संगीत ही था। उनके लिए संगीत के अलावा सारे इनाम-इक़राम, सम्मान बेमानी थे। दुनियाभर में शहनाई की मधुर स्वर को पहचान दिलाने के श्रेय बिस्मिल्लाह खान को ही जाता है। वे संगीत से देश को एकता के सूत्र में पिरोना चाहते थे। वे कहते थे 'सिर्फ संगीत ही है, जो इस देश की विरासत और तहज़ीब को एकाकार करने की ताकत रखता है।' उन्हें अपने शहर बनारस से बेइंतहा प्यार था। वह जिंदगी भर मंगलागौरी और पक्का महल में रियाज करते हुए जवान हुए तो कहीं ना कहीं बनारस का रस उनकी शहनाई में टपकेगा ही। मजहबी शिया होने के बावजूद खां साहब विद्या की हिन्दू देवी सरस्वती के परम उपासक थे।

एक ऐसे दौर में जबकि गाने-बजाने को सम्‍मान की निगाह से नहीं देखा जाता था, तब बिस्मिल्ला खां ने बजरी, चैती और झूला जैसी लोकधुनों में बाजे को अपनी तपस्या और रियाज से खूब संवारा और क्लासिकल मौसिकी में शहनाई को सम्मानजनक स्थान दिलाया। उनकी शहनाई की गूंज से फिल्‍मी दुनिया भी अछूती नही रही। आखिरी बार उन्होंने आशुतोष गोवारिकर की हिन्दी फिल्म स्वदेश के गीत 'ये जो देश है तेरा' में शहनाई की मधुर तान बिखेरी। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अल सुबह बजने वाली मंगल ध्वनि उस्ताद बिस्मिला खान की शहनाई की तान है। एक समय था जब इस मंगल ध्वनि से ही पूरे देश की सुबह होती थी।

मधुरतम तान का आगाज

बिस्मिल्ला खान के बचपन का नाम कमरुद्दीन था। वे अपने माता-पिता की दूसरी सन्तान थे। चूंकि उनके बड़े भाई का नाम शमशुद्दीन था इसलिए उनके दादा रसूल बख्श ने कहा 'बिस्मिल्लाह' जिसका मतलब था अच्छी शुरुआत। आगे चलकर वे बिस्मिल्ला खां के नाम से ही मशहूर हुए। बिस्मिल्ला खां को संगीत विरासत में मिला था क्योंकि उनके खानदान के लोग दरवारी राग बजाने में माहिर थे, जो बिहार की भोजपुर रियासत में अपने संगीत का हुनर दिखाने के लिये अक्सर जाया करते थे। उनके पिता बिहार की डुमरांव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई बजाया करते थे। महज 6 साल की उम्र में बिस्मिल्ला खां अपने पिता के साथ बनारस आ गये। वहां उन्होंने अपने चाचा अली बख्श 'विलायती' से शहनाई बजाना सीखा। उनके उस्ताद चाचा 'विलायती' विश्वनाथ मन्दिर में स्थायी रूप से शहनाई-वादन का काम करते थे। 14 साल की उम्र में पहली बार इलाहाबाद के संगीत परिषद् में बिस्मिल्ला खां ने शहनाई बजाने का प्रोग्राम किया। जिसके बाद से वह कम समय में पहली श्रेणी के शहनाई वादक के रूप में निखरकर सामने आए।

दिलरुबा गंगा और शहनाई

बिस्मिल्ला खान को मोक्षदायिनी गंगा से बेहद लगाव था। वे मानते थे कि उनकी शहनाई के सुरों में जब गंगा की धारा से उठती हवाएं टकराती थीं तो धुन और मनमोहक हो उठती थीं। यही वजह थी कि मुंबई जब बॉलीवुड की शक्ल ले रहा था तो उनके पास हमेशा के लिए वहीं बसने के प्रस्ताव आए, इस पर उस्ताद का एक ही जवाब होता था, अमा यार ले तो जाओगे, लेकिन वहां गंगा कहां से लाओगे। बिस्मिल्लाह खां की आत्मा में बसती थी गंगा-जमुनी तहजीब। उनकी गंगा-जमुनी तहजीब, काशी विश्वनाथ हो या मां शीतला, खां साहब की कानों में रस घोलती शहनाई की गूंज सुबह दर्शनार्थियों के लिए किसी सौगात से कम नहीं है। वह गंगा को संगीत सुनाते थे। उनकी आत्‍मा का नाद उनकी शहनाई की स्‍वरलहरियों में गूंजता हुआ हर सुबह बनारस को संगीत के रंग से सराबोर कर देता था। शहनाई उनके कंठ से लगकर नाद ब्रम्‍ह से एकाकार होती थी और विश्राम के भीतर मिलन के स्‍वर गंगा की लहरों से मिलते हुए अनंत सागर की ओर निकल पड़ते थे।

जब देश में चली नई रवायत

15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ और उन्मुक्त वातावरण की पहली बयार बही, तो फिजा में उस्ताद की शहनाई की धुन दिल्ली के लालकिले से गूंजी। 26 जनवरी 1950 को जब देश गणतंत्र बना तब तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के अनुरोध पर उस्ताद ने मौजूं का इस्तकबाल अपनी खास धुनों से किया। कमाल की बात ये है कि हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्लाह ख़ान का शहनाई वादन देश के स्‍वतंत्रता उत्‍सव की एक प्रथा बन गई।

सितारे चमकते रहेंगे

संगीत के क्षेत्र का कोई ऐसा सम्मान नहीं था, जो शहनाई के इस शहंशाह को नहीं मिला। उन्हें 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1961 में पद्मश्री, 1968 में पद्मभूषण, 1969 में एशियाई संगीत सम्मेलन के रोस्टम पुरस्कार, 1980 में पद्मविभूषण, तालार मौसिकी, 1992 में इरान गणतंत्र, 1994 में फेलो ऑफ संगीत नाटक अकादमी, और 2001 में भारत रत्न से उनको नवाजा गया। मध्य प्रदेश में उन्हें सरकार द्वारा तानसेन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय और शांतिनिकेतन ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान करके सम्मानित किया था।

दी गई 21 तोपों की सलामी

भारतीय शास्त्रीय संगीत और संस्कृति की फिजा में शहनाई के मधुर स्वर घोलने वाले प्रसिद्ध शहनाई वादक बिस्मिल्ला खां शहनाई को अपनी बेगम कहते थे और संगीत उनके लिए उनका पूरा जीवन था। पत्नी के इंतकाल के बाद शहनाई ही उनकी बेगम और संगी-साथी दोनों थी, वहीं संगीत हमेशा ही उनका पूरा जीवन रहा। उन्होंने अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्छा व्यक्त की थी लेकिन उस्ताद की यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई और 21 अगस्त, 2006 को 90 वर्ष की आयु में इनका देहावसान हो गया। उनके शहनाई के प्रति प्रेम को देखते हुए उनके शव के साथ शहनाई भी दफनाई गई और भारतीय सेना द्वारा 21 तोपों की सलामी दी गई।

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IIMC दिल्ली से पत्रकारिता की एबीसीडी सीखी। नेटवर्क-18 और इंडिया टुडे के लिए दो साल तक काम किया। घूमने का जुनून है। इस जुनून को chalatmusaafir.in पर देखा जा सकता है। देश के कोने-कोने में जाकर वहां की विरासत और खासियत को सामने लाने का सपना है।

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