मेरा पहला स्टार्टअप पहले ही वर्ष में बंद हो गया, मैं 15 लाख रुपये के नुकसान में रहा

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मुझे लगता था कि मैं अपने स्टार्टअप से करोड़ों रुपये बनाने में कामयाब रहूंगा लेकिन मैं बहुत बुरी तरह से विफल रहा। मैंने फ्लिपकार्ट और जोमेटो की शानदार कहानियां तो पढ़ी थीं लेकिन किसी ने भी मुझे यह नहीं बताया कि 90 फीसदी स्टार्टअप अपनी स्थापना के दो वर्ष के भीतर ही असफल हो जाते हैं। मेरा तो पहले ही वर्ष में धराशायी हो गया। कई बार मैं खुद को ठगा हुआ महसूस करता था लेकिन यह भी सच्चाई है कि गलती मेरी ही थी। मैंने कहानी के सिर्फ एक ही पक्ष को सत्य मान लिया था।

आज मैं आपको कहानी के दूसरे पक्ष से रूबरू करवाता हूं।

वह वर्ष 2013 में अप्रैल के महीने का समय था जब मैंने अपने कार्यस्थल पर असहज महसूस करना प्रारंभ कर दिया था। काम छोड़ने के विचार मेरे ऊपर हावी होते जा रहे थे और मैं काम से अपनी रुचि खोता जा रहा था।

मैं अभी अमरीका से लौटा ही था और मैंने भारत में दोबारा अपने घर की स्थापना के बहाने से अपने मैनेजर से कुछ समय मांगा। हालांकि अगर मैं सच कहूं तो वास्तविक समस्या काम को लेकर मेरी अप्रसन्नता थी।

मैं अपने दम पर कुछ स्थापित करने के सपने तो देखता था लेकिन मुझमें ऐसा करने का साहस नहीं था।

मैंने इस बारे में अपने एक मित्र से वार्ता की और हमनें एक कंपनी शुरू करने का फैसला किया। मैंने अपनी सारी बचत इस स्टार्टअप को समर्पित कर दी।

हमनें पहला कदम उठाते हुए एक प्राईवेट लिमिटेड कंपनी की स्थापना की और दोनों ने 5 लाख रुपये की बराबर इक्विटी का निवेश किया। हमनें गुडगांव में एक बेसमेंट आफिस से प्रारंभ किया।

हमें लगता था कि शिक्षा का क्षेत्र अरबों डाॅलर का उद्योग है इसलिये हम स्कूलों से संबंधित समस्याओं को हल करना चाहते थे। हमें ऐसा लगा कि हम स्कूलों के लिये कोई उत्पाद तैयार करके बड़ा मुनाफा कमा सकते हैं।

काफी लंबे विचार-विमर्श के बाद हम स्कूलों के लिये एक ईआरपी के विचार के साथ सामने आए जो एक ऐसा आॅनलाइन साफ्टवेयर है जिसकी सहायता से बच्चों के अभिभावकों के साथ संचार करने से लेकर फीस और इन्वेंटरी सहित हर काम का प्रबंधन किया जा सकता है।

मुझे इस बात का पूरा विश्वास था कि हमें काम के लिये आसानी से लोग मिल जाएंगे। हमारे पास वह सब मौजूद था जो एक बेहतरीन टीम को तैयार करने के लिये चाहिये। एक कार्यालय, बैंक एकाउंट में पैसा, भर्ती की नीति और सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह था कि मेरे पास एक ऐसा सहसंस्थापक था जिसे भर्ती के क्षेत्र में एक दशक से भी अधिक का अनुभव था।

हम अपने साथ काम करने के इच्छुक कुछ लोगों से मिले। लेकिन हमें यह देखकर काफी आश्चर्य हुआ कि उनमें से एक भी हमारे स्टार्टअप का हिस्सा बनने को तैयार नहीं था।

मेरे सहसंस्थापक ने टिप्पणी की, ‘‘अबतक तो मैं किसी भी कंपनी के लिये दस से अधिक लोगों को काम पर रख देता लेकिन मैं अभी तक नहीं समझ पा रहा हूं कि लोग हमारे साथ क्यों नहीं जुड़ रहे हैं।’’

चूंकि हम काॅर्पोरेट पृष्ठभूमि से संबंध रखते थे इसलिये हमने नई भर्ती नीति का मसौदा तैयार करने में कुछ दिनों का समय लगाया। हमनें मूल वेतन के अलावा राजस्व और व्यक्तिगत प्रदर्शन के आधार पर बोनस के रूप में इन्सेंटिव देने वाले कंपनी की स्थापना की।

हम अपने नए कार्यालय में आ गए। हमनें एक नौसखियों को अपने साथ काम पर रखा और काफी माथपच्ची करने के बाद हम एक ऐसा व्यक्ति पाने में सफल रहे जिसकी तकनीकी क्षमताएं हमें प्रभावित करने में सफल रहीं लेकिन हम उसके प्रबंधकीय और नेतृत्व कौशल को लेकर सशंकित थे। उसे रखना काफी महंगा सौदा था। हमनें उसे वेतन के अलावा कंपनी इन्सेटिव देने की पेशकश की लेकिन अगर वर्ष के अंत तक हम राजस्व बनाने में कामयाब होते।

हम दो डवलपर्स के साथ खुद को काफी खुशकिस्मत समझ रहे थे। मैं उत्पाद को आर्किटेक्ट करता और डेवलपर तुरंत ही बिना फ्रंट-एंड डिजाइन के बारे में सोचे उसकी कोडिंग प्रारंभ कर देते।

वह बहुत ही रोचक समय था। हमारा उत्पाद अब आकार लेने लगा था। हम एक डिजाइनर को अपने साथ जोड़ने में सफल रहे लेकिन हमें उसके रवैये और कौशल को लेकर कई मौकों पर समझौते करने पड़े। हमनें स्टार्टअप के लिये भर्ती की चुनौतियों को महसूस करना प्रारंभ कर दिया था।

हम अपने उत्पाद को जल्द से जल्द तैयार कर देना चाहते थे ताकि हम उसकी बिक्री प्रारंभ कर सकें।

लेकिन तभी हमारे सामने अप्रत्याशित समस्याएं आने लगीं। हमारा जूनियर डेवलपर हमारी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा था और हमनें उसे छोड़ने के लिये कह दिया। सिर्फ चार लोगों की एक टीम के साथ हमनें अपने उत्पाद के प्रथम संस्करण को तैयार करने मे कामयाबी हासिल की।

हमें इस बात का पूरा भरोसा था कि एक बार बाजार में उतरने के बाद हमारा उत्पाद तहलका मचा देगा। हमनें शीर्ष ईआरपी उत्पादों में शामिल तमाम सुविधाओं को शामिल किया ताकि हम अपने प्रतिस्पर्धियों को पीछे छोड़ने में सफल रहें। हालांकि हम अपने फ्रंट एंड डिजाइन से खुश नहीं थे और हम लगातार एक बेहतर डिजाइन की तलाश में लगे थे।

हमारी पहली संभावित उपभोक्ता जो एक जाने मानी स्कूल की प्रिंसिपल हैं, को हमारा विचार और उसका डेमो बेहद पसंद आया लेकिन उच्च प्रबंधन की तरफ से निर्णय के इंतजार में उन्होंने हमें ठंडे बस्ते में डाल दिया। हमनें उन्हें इस उम्मीद में कि जल्द ही वे हमारा साफ्टवेयर खरीदेंगी उन्हें बिक्री सामग्री भेज दी।

अबतक (छः महीने) उत्पाद के विकास की लागत इस प्रकार थीः

कंपनी निगमन 30,000 रुपये

कार्यालय का नवीनीकरण 1,20,000 रुपये

एसी/फ्रिज/इन्वर्टर 40,000 रुपये

किराया 91,000 रुपये

वेतन 3,60,000 $ 1,00,000 $ 65,000 रुपये

यात्रा, भोजन, मार्केटिंग 1,00,000 रुपये

कुल 9,56,000 रुपये

ऐसे में हमनें अपने डवलपमेंट कार्यालय को चंडीगढ़ ले जाने का फैसल किया जहां मैं संचालन का काम संभालता और मेरे सहसंस्थापक गुड़गांव में ही रहकर सेल्स का काम संभालते।

अब हमारा वरिष्ठ डेवलपर गुड़गांव-चंडीगढ़-गुड़गांव के बीच चक्कर काटने की जगह डवपलमेंट में अपना समय और ऊर्जा लगा पा रहा था।

हम कार्यालय के किराये के पैसे भी बचाने में सफल रहे।

मैं अपने रहने के पैसे बचाने में सफल रहा

इसके बाद हमें एक बार फिर झटका लगा जब हमारा डिजाइनर हमारा लैपटाॅप लेकर रफूचक्कर हो गया।

हालांकि हमनें कुछ ही समय में उसे तलाश लिया और लैपटाॅप बरामद कर लिया हम एक डिजाइनर से हाथ धो बैठे। मैंने इस चुनौती का सामना करने का फैसला किया और वेब डिजाइनिंग की मूल बातों को सीखना प्रारंभ किया। हम सिर्फ 6 महीने में ही पूरे डिजाइन दोबारा तैयार करने में सफल रहे। हमारा उत्पाद बहुत अच्छी तरह से तैयार हुआ था।

अब हमनें स्कूलों के साथ संपर्क करना प्रारंभ किया लेकिन हम सहसंस्थापकों में से कोई भी सेल्स की पृष्ठभूमि से नहीं था।

हमें एपाॅइंटमेंट पाने के लिये संघर्ष करना पड़ता

हमनें बिना किसी परिणाम के 10 से 12 स्कूलों के साथ संपर्क किया

सुरक्षाकर्मी को पार करना ही एक बहुत बड़ी बाधा थी

हमें यह पता चला कि प्रिंसिपलों के पास निर्णय लेने के अधिकार ही नहीं हैं

निर्णय लेने वाले कभी स्कूलों में मौजूद ही नहीं होते थे

अधिकतर स्कूलों के व्यवस्थापक ईमेल को देखते और जवाब तक नहीं देते

जब आप स्कूलों को कोई उत्पाद बेचने जाते हो तो पहले दो-तीन महीनों तक तो कुछ होता ही नहीं है

हमनें सेल्स के क्षेत्र में अनुभवी अहमदाबाद के शख्स को अपने साथ जोड़ा लेकिन हम अपने प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले कम लागत में अधिक सुविधाएं उपलब्ध करवाने वाले अपने उत्पाद को बेचने में असफल ही साबित हुए थे।

कुछ संदर्भों के माध्यम से हमें नये उपभोक्ता तो मिल रहे थे लेकिन राजस्व अभी भी दूर की कौड़ी था। सेल्स का काम संभालने वाले मेरे सहसंस्थापक का कहना था कि कुछ बड़े स्कूल हमारा उत्पाद खरीदने के इच्छुक हैं लेकिन अगर हम इसमें कुछ नए फीचर शामिल करें तो।

हालांकि मेरी बिकुल जुदा राय थी। मेरा कहना था कि हमारे पास किसी भी स्कूल के लिये पर्याप्त फीचर्स और कमी कहीं न कहीं सेल्स की प्रक्रिया में है। मेरा मानना था कि हमें कुछ छोटे से लेकर मझोले स्कूलों से संपर्क करना चाहिये चाहे हमें कम पैसा ही मिले। ऐसे में हमारे बीच टकराव होने लगे।

हमारे पैसे खत्म होने लगे और ऐसे में हमने स्टर्टअप में और अधिक धन का निवेश किया। हमनें एक बड़े प्रतिस्पर्धी से तोड़कर सेल्स का एक व्यक्ति भर्ती किया।

हमें लगा कि हमारे हाथ अलादीन का चिराग लग गया है क्योंकि उसनें हमें प्रतिद्वंदी के उत्पाद के बारे में जानकारी देने के अलावा स्कूलों को की जाने वाली उसकी बिक्री के रहस्यों के बारे में भी बताया।

उसनें हमारे साथ एक महीने तक काम किया लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। वह सिर्फ एक बड़े ब्रांड नाम के कारण की सफल होता रहा था।

ऐसे में हमें खुद को बनाए रखने के लिये और अधिक धन की आवश्यकता थी।

मेरे सहसंस्थापक कुछ ऐसे बड़े स्कूलों के चक्कर में लगे थे जो कुछ अग्रिम भुगतान कर सकें। इसके अलावा उन्होंने सौदे हासिल करने के लिये कुछ प्रभावशाली और राजनीतिक लोगों के साथ संपर्क स्थापित करने भी प्रारंभ किये।

मैंने स्टार्टअप से संबंधित किताबें और ब्लाॅग पढ़ने प्रारंभ किये। दुर्भाग्य से मेरे सहसंस्थापक अभी भी अपने स्टार्टअप को एक बड़े काॅर्पोरेट की तरह संचालित कर रहे थे।

ऐसे में मैंने खर्चे कम करने का प्रस्ताव दिया। आखिरकार मेरे सहसंस्थापक ने कंपनी को अपने जिम्मे ले लिया और वादा किया कि अगर कंपनी भविष्य में मुनाफा कमाती है तो वे मेरी नकदी लौटा देंगे।

अबतक हम एक ऐसे उत्पाद में जिसे कोई खरीदने को तैयार नहीं था 15 लाख रुपये बर्बाद कर चुके थे। हमारे पास भुगतान करने वाले सिर्फ दोही उपभोक्ता थे और कुछ सिर्फ परीक्षण के दौर में ही थे। और कुछ हफ्तों के संघर्ष के दौर के बाद मेरे सहसंस्थापक ने एक नौकरी कर ली। और यह स्कूलजिनी का अंत था।

आइये मैं आपको बताता हूं कि इस दौरान मैं क्या सीखने में सफल रहाः

1. अपने उत्पाद के निर्माण से पहले अपने उपभोक्ता को पहचानें

हमनें अपने उत्पाद का निर्माण अपने प्रतिस्पर्धियों की मान्यताओ और फीचर्स की सूचि के आधार पर किया। हमें अपने उत्पाद के निर्माण से पहले अपने उपभोक्ताओं से बात करनी चाहिये थी।

2. यह जानिये कि पैसा कहां खर्च करना है और कहां नहीं

हमनें कार्यालय के बुनियादी ढांचे और वेतन में अपना अधिक पैसा खर्च किया। हम घर से काम करके और सर्वाइवल सेलरी के साथ ईएसओपी पर कर्मचारियों को रखकर अपना 80 प्रतिशत तक खर्च बचा सकते थे।

हमें ऐसी चीजों पर पैसा खर्च करना चाहिये था जो अधिक सेल्स या लीड्स में बदलते। अगर उपभोक्ता अधिग्रहण का प्राथमिक स्त्रोत आपकी वेबसाइट पर है तो आपको अपना अधिक पैसा कंटेट मार्केटिंग, सेल्स डेक और सेल्स पेज पर करना चाहिये।

अर आप आॅफलाइन माध्यम से उपभोक्ता पा रहे हैं तो आप सेल्स ब्रोशर और अन्य मुद्रण सामग्री पर अधिक पैसा खर्च करें।

3. कोड में अपने हाथ जरूर आजमाएं

गैर तकनीकी सहसंस्थापक अक्सर तकनीकी कामकाज को लेकर संशय में ही रहते हैं।

मैं उन्हें सलाह देना चाहता हूं कि आप गैर-तकनीकी होते हुए भी कोडिंग जरूर करें। मैं जानता हूं कि कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन अधिकतर वे नाॅन-टेक संस्थापक बेहतर निर्णय लेने में सफल होते हैं जिन्हें यह पता होता है कि चीजें कैसे क्रियांवित होती हैं।

4. सेल्स की पृष्ठभूमि से न होने के बावजूद भी सेल्स करें

मैं हमेशा सेल्स के काम से पीछे भागता था क्योंकि मेरा मानना था कि मेरे सहसंस्थापक संचार और लोगों के बीच अपनी बात रखने में बेहतर हैं। हम उसके बेहतरीन संचार और एचआर की पृष्ठभूमि के बावजूद बिक्री करने में असमर्थ रहे। इसका मुख्य कारण यह रहा कि हम उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं के बारे में जानने के स्थान पर सिर्फ अपने उत्पाद को ही बेचने पर ध्यान दे रहे थे।

5. निर्णय लें और अपने सहजबोध पर भरोसा करें

हमनें लगभग सभी बड़े और छोटे निर्णयों को स्थगित करना प्रारंभ कर दिया। यहां तक कि रास्ते जुदा करने तक का निर्णय हम काफी दिनों तक आगे खींचते रहे। अपने पहले संस्थान के बंद होने के बाद से मैंने उस समय उपलब्ध जानकारी के आधार पर ठोस निर्णय लेना प्रारंभ किया। आपके पास हमेशा कोई भी निर्णय लेने क लिये 100 फीसदी डाटा तो नहीं हो सकता। आपको इतना काबिल होना पड़ेगा कि आप सिर्फ 60 सा 70 प्रतिशत जानकारी के आधार पर निर्णय ले सकें।

6. कभी भी सीखना मत बंद करो

किसी भी स्टार्टअप के लिये खतरे की घंटियां तभी बजने लगती हैं जब कोई एक विशेषज्ञ की तरह व्यवहार करने लगता है और नई चीजों को सीखने से पीछे हटता है। अगर आप सीखना बंद कर देते हें तो आपको विफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

7. पैसा किसी भी स्टार्टअप का सिर्फ एक उप-उत्पाद है

हालांकि मैंने यह काफी देर से सीखा लेकिन हो सकता है कि आपने में से कुछ लोग इसका अहसास अभी से कर रहे हों। हम उद्यमी सिर्फ उपभोक्ता की समस्या का समाधान करने या फिर अपने जुनून का पीछा करने के लिसे उद्यम की स्थापना करते हैं और पैसा तो उसके लिये सिर्फ एक ईंधन होता है। अगर आप अपना सारा ध्यान सिर्फ पैसे पर केंद्रित करेंगे तो आप अदूरदर्शी बनकर रह जाएंगे।

8. उदार बनें

मेरी उद्यमशीलता की दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण सबक रहा है उदार होना, विनम्र होना और एक दाता होता।

निष्कर्ष

यह मेरे पहले स्टार्टअप की कहानी थी लेकिन मुझे लगता है कि अधिकतर नए उद्यमी इसी रास्ते पर चलते हैं। मैंने एक दूसरे स्टार्टअप के सहसंस्थापक का साथ लिया और इसनें मेरे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद की। अब मैं स्टार्टअप्स के साथ काम कर रहा हूं और विकास करने में उनकी सहायता कर रहा हूं।

(लेख मूलतः स्टार्टअपकर्मा में प्रकाशित)


लेखकः प्रदीप गोयल

अनुवादकः निशांत गोयल

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