सूखे की मार झेल रहे किसानों के लिए बाजरे की खेती है वरदान

योरस्टोरी ने की उन किसान भाईयों से मुलाकात जिनकी बदौलत जलते हैं घरों के चूल्हे...

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किसान बताते हैं कि देश में लोगो की खाने की आदतों का उनके व्यक्तिगत जीवन पर क्या असर पड़ता है और उनके द्वारा लिया गया एक भी निर्णय सब कुछ बदल सकता है। ऐसे में 'योर स्टोरी' ने बात की देश की भोजन की जरूरतों को पूरा करने वाले इन किसान नायकों से...

बीजापुर जिले के किसान रफ़ीक अहमद
बीजापुर जिले के किसान रफ़ीक अहमद

बाजरा सभी कृषि समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता है, लेकिन देसी अनाज होने के नाते, यह बिना किसी शक के हमारे किसानों को सशक्त कर सकता है।

सनलाक कृषि उद्योग के संस्थापक और अर्थशास्त्री विक्रम शंकरनारायणन ने हाल ही में एक ऐसे आंकड़े का खुलासा किया जो चिंताजनक है। इसके मुताबिक कृषि कार्यों में लगी भारतीय आबादी के 60 प्रतिशत हिस्से में से केवल दो फीसदी के पास ही किसी प्रकार की स्थायी और पर्याप्त आजीविका का साधन उपलब्ध है। यही 2% लोग ही देश की जीडीपी में योगदान कर पाते हैं। फिर बाकी 58 प्रतिशत किसानों की कहानी क्या है? देश को खिलाने वाले इन लोगों के जीवन की क्या स्थिति है?

अभी कुछ सप्ताह पहले बेंगलुरु में आयोजित ऑर्गेनिक्स और मिलेट्स राष्ट्रीय व्यापार मेले में कर्नाटक के विभिन्न जिलों के किसानों ने हिस्सा लिया था, जहां उन्हें बेहतर कृषि पद्धतियों के बारे में जानकारी हासिल करने के साथ-साथ अपने उत्पाद को बेचने के लिए संभावित व्यापारियों का भी पता चला। उनमें से कुछ के साथ 'योर स्टोरी' ने बात की और उनसे यह जानने की कोशिश की, कि जब हम उपभोक्ताओं के रूप में देश के किसानों द्वारा उगाये जा रहे बाजरा जैसे सूखे में भी पैदा होने वाले सहनशील चमत्कारिक अनाजों से अनभिज्ञ होते हैं, तब एक किसान पर क्या गुजरती होगी?

बारिश की कमी से जूझना

कर्नाटक के कोप्पल जिले के एक किसान देवप्पा ने दो एकड़ जमीन में कपास की खेती करने की कोशिश की। उन्हें उम्मीद थी कि यह नकदी फसल उन्हें अच्छा फायदा देगी। उन्होंने 20,000 रुपये की पूँजी लगा दी थी लेकिन उनकी फसल कटाई तक भी नहीं पहुँच सकी। वह कहते हैं, ‘फसल उगी ही नहीं।‘ देवप्पा की कुल 10 एकड़ की जमीन बहुत उपजाऊ है और वह उसमें जैविक उर्वरकों का जिम्मेदारी से उपयोग करते हैं। फिर यह फसल क्यों नहीं उगी?

इसका जवाब एक सूखे पेड़ जैसा है। ‘बारिश का ना होना’। अधिकतर किसान अपनी फसलों को सिंचाई के लिए बोरवेल के पानी पर निर्भर हैं, लेकिन बारिश नहीं होने और अति दोहन की वजह से भूजल स्तर लगातार कम होता जाता है। एक लगातार सूखा प्रभावित घोषित किए गए चित्रदुर्ग के एक किसान धनंजय रेड्डी कहते हैं, ‘बोरिंग का पानी केवल एक महीने तक ही रहता है और फिर हमें दूसरी बोरिंग करनी पड़ती है। बारिश बिल्कुल नहीं हुई है, यहां तक ​​कि हमारे गले भी सूख रहे हैं।‘ इस वर्ष, इस जिले के 67,532 किसानों को फसल नुकसान के मुआवजे के लिए पात्र माना गया है, जो पूरे राज्य में सबसे ज्यादा है।

बाजरे की खेती क्यों?

देवप्पा की तरह ही अन्य किसान भी सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पानी के अधिक उपयोग वाली फसलों की खेती करते हैं। बेलगाम जिले के महेश तीन एकड़ की एक मामूली जमीन के मालिक है। वह गन्ने की खेती करते हैं जिसकी सिंचाई वह बोर वेल से करते हैं, जबकि धान और सोयाबीन की उनकी खेती वर्षा पर निर्भर है। इन फसलों में वह हर साल 40,000-50,000 रुपये का निवेश करते हैं। इस तरह उनके द्वारा लिया जाने वाला जोखिम उनकी स्थिति की तुलना में निश्चित ही बहुत बड़ा है। ऐसे में उनमें (किसानों में) से ज्यादातर गंभीर कर्ज में फंस जाते हैं।

कोप्पल जिले के देवप्पा (बाएं),
कोप्पल जिले के देवप्पा (बाएं),

बाजरा, रागी, ज्वार, कोदो जैसे कृषि उत्पाद किसानों के लिए सबसे आदर्श निवेश हो सकते हैं क्योंकि इनमें बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है। हालांकि कुछ किसान बाजरा पैदा करते हैं, लेकिन यह आमतौर पर केवल परिवार और पशुओं को खिलाने के इरादे से होता है।

आपको आश्चर्य होगा कि क्यों वे पानी के अधिक उपयोग वाली फसलों को जारी रखे हुए हैं? क्योंकि बाजरा जैसे फसल उत्पाद के व्यावहारिक विकल्प की बाजार में मांग नहीं हैं, क्या अंतरराष्ट्रीय सेलिब्रिटी अनाज जैसे क्विनॉआ और ओट्स बाजरे जैसे उत्पादों को स्थान नहीं बनाने देते हैं? बाजरा, रागी, ज्वार, कोदो जैसे कृषि उत्पाद किसानों के लिए सबसे आदर्श निवेश हो सकते हैं क्योंकि इनमें बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है। हालांकि कुछ किसान बाजरा पैदा करते हैं, लेकिन यह आमतौर पर केवल परिवार और पशुओं को खिलाने के इरादे से होता है। इसलिए भूमि के केवल एक नगण्य हिस्से में ही बाजरे की खेती की जाती है।

धनंजय जैसे किसान भी हैं, जो लगभग 15 वर्षों से रागी की खेती कर रहे हैं और बेंगलुरु शहरी जिले के सुरेश बाबू भी केवल रागी की ही खेती करते है। सुरेश कहते हैं, ‘इन सभी फसलों में, रागी को पानी की सबसे कम जरूरत होती है, लेकिन बारिश बहुत ही कम होने पर इसको भी नुकसान पहुंच सकता है।‘ यह दर्शाता है कि बाजरा और विशेष रूप से, रागी, आसन्न सूखे की स्थिति में भी कुछ पैदावार दे सकती है।

केवल एक ही सवाल जो जवाब की तलाश में है...

हम जिन किसानों से मिले, उनमें सभी किसानों का सबसे बड़ा उम्मीद से भरा सवाल ये था, कि क्या उन्हें उनकी फसल बाजरा की सही कीमत मिल रही है? कर्नाटक राज्य किसान संगठन के सचिव प्रकाश के अनुसार, ‘आदर्श परिस्थितियों में, रागी की एक एकड़ खेती के लिए करीब 2,000 रुपये के निवेश के साथ, यदि उपज अच्छी हो तो उत्पाद का बाजार मूल्य 5,000 रुपये मिल सकता है’, लेकिन बहुत कम ही ऐसा होता है। धनंजय सबसे गंभीर घाटे में से एक को याद करते हुए बताते हैं कि उन्होंने कभी सुना था कि 15 हेक्टेयर धान की पैदावार की कीमत केवल 2,000 रुपये मिली थी। यह एक बहुत छोटा सा अंश था, जो सिर्फ 1 रुपया प्रति एकड़ बैठता है।

खुद को किसानों का दृढ़ कार्यकर्ता मानने वाले प्रकाश कहते हैं, ‘हम सब्सिडी नहीं चाहते हैं, हम कोई प्रोग्राम भी नहीं चाहते हैं, हम केवल हमारे उपज के लिए एक अच्छी कीमत चाहते हैं।‘ प्रकाश इस सिद्धांत में विश्वास करते हैं कि केवल किसान ही एक दूसरे की मदद कर सकते हैं। हालांकि उन्होंने किसी भी तरह के व्यापार मेले को सहायक बताया है और यह स्वीकार किया है कि ऑर्गेनिक्स और मिलेट्स राष्ट्रीय व्यापार मेले जैसी पहल बाजरा की मांग में वृद्धि करने में सहायक साबित होंगी। उनके मुताबिक फसलों के इस एकमात्र समूह पर वे अपेक्षाकृत अधिक स्थिर उपज के लिए निर्भर कर सकते हैं और इसलिए इन फसलों की बेहतर कीमतें उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

बेंगलुरु जिले के सुरेश बाबू (बाएं), चित्रदुर्गा के धनञ्जय रेड्डी (मध्य में) और बीदर के प्रकाश (दाहिने)
बेंगलुरु जिले के सुरेश बाबू (बाएं), चित्रदुर्गा के धनञ्जय रेड्डी (मध्य में) और बीदर के प्रकाश (दाहिने)

बीजापुर जिले से रफीक अहमद का कहना है ‘अब तक हम इस बात के बारे में चिंतित थे कि हमारी बाजरे की उपज को हम कहां बेचें, लेकिन अब हम जानते हैं कि इसके व्यापारी कहां हैं और साथ ही हमें यह भी मालूम हुआ कि इस उत्पाद की मांग बढ़ रही है।' निश्चित रूप से उनके आत्मविश्वास का समर्थन करने के लिए धनंजय आगे आकर कहते हैं, ‘पिछले साल मुझे एक क्विंटल रागी के लिए 2,000 रुपये मिले थे जबकि इस साल 3,000 रुपये मिल रहे हैं।‘

पिछले दिनों बेंगलुरू में हुए राज्य सरकार द्वारा आयोजित राष्ट्रीय व्यापार मेले ने किसानों, खरीददारों और उपभोक्ताओं को एक मंच पर लाने का काम किया, साथ ही इसने किसानों के इस फसल में विश्वास को एक बार फिर बहाल कर दिया है।

बाजरा सभी कृषि समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता है, लेकिन देसी अनाज होने के नाते, यह बिना किसी शक के हमारे किसानों को सशक्त कर सकता है।

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