एक कशमीरी मुस्लिम दंपत्ति ने अपनी जान जोखम में डालकर अपने पंडित दोस्त के घर पहुँचाया अनाज

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ऐसे समय जब हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वाणी की मौत के बाद कश्मीर जल रहा है और आधे से ज्यादा कश्मीर में कर्फ्यू है, हालात काफी तनावपूर्ण हैं, इसके बावजूद एक बहादुर मुस्लिम कश्मीरी महिला ज़ुबेैदा बेगम और उनके पति अपनी जान जोखिम में डालकर अपने पंडित मित्र के घर अनाज पहुँचाने का काम कर रहे हैं। यह दृश्य देश की मिली जुली संस्कृति की अनूठी कहानी बयान करता है। श्रीनगर की तनावग्रस्त सड़क पर अनाज की बोरी पीठ पर लादे चल रहे हैं, उस दोस्त के लिए जिसने जेहलम के उस पार से उन्हें याद किया है।

छायाचित्र - साभार इंडिया टुडे
छायाचित्र - साभार इंडिया टुडे

ज़ुबैदा बताती हैं कि उनकी दोस्त ने उन्हें फोन करके बताया कि उनके घर में अनाज की ज़रूरत है। उनके साथ बीमार दादी रहती हैं। ‘ मैंने अपनी दोस्त की आवाज़ पर उसके घर अनाज पहुँचाने का निर्णय लिया। यह काफी मुश्किल था, लेकिन हमने उनके घर तक पहुँचने की कोशिश की।’

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे समय जब दुकानें बंद हैं। परिवहन का कोई साधन नहीं है। इस दंपति ने पैदल चलकर ही अपनी पंडित दोस्त के घर जाने का निर्णय लिया। हालाँकि पुलिस ने भी वहाँ आने जाने की मनाही कर रखी है। इसके बावजूद यह दंपत्ति जवाहरनगर में दीवानचंद के फ्लैट पर पहुँच ही गयी।

दीवानचंद कहते हैं कि यहाँ सब लोग परेशान हैं। हम खुश हैं कि इस मित्र परिवार की अपनी जान को जोखम में डालकर मानवता को जीवित रखा है।

दीवानचंद का परिवार बरसों से वैली में रहता है। वो ऑल इंडिया रेडियो में काम करते हैं। उनकी पत्नी एक स्थानीय स्कूल में काम करती है, जहाँ जुबेदा भी उनके साथ काम करती है। दीवानचंद उनका परिवार और बूढी दादी सब उस समय मदद की गुहार कर रहे थे, जब वैली में संकट की स्थिति थी और उनकी दोस्त दंपति मदद के लिए हाज़िर हो ही गयी।

बीते पाँच वर्षों से कश्मीर में हालात ठीक नहीं हैं। हिंसा और विरोध प्रदर्शन की कई घटनाएँ सामने आ रही हैं। बुरहान वाणी की मौत को बाद हालात और भी बदतर हो गये हैं। इन सब के बावजूद ज़ुबैदा के निस्वार्थ काम के उदाहरण ने साबित कर दिया कि किस तरह मानवता आज भी जिंदा है।

- थिंक चेंज इंडिया