मुफलिसी में दिन बिताने वाली वह पहली महिला वैज्ञानिक, जिन्हें दो बार मिला नोबल पुरस्कार    

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अत्यंत विलक्षण प्रतिभा की धनी मैरी स्क्लाडोवका क्यूरी दुनिया की ऐसी शख्सियत रही हैं, जिन्हें मुफलिसी के दिनो में बटर-ब्रेड और चाय पर दिन काटने पड़े थे। जिस चीज की उन्होंने खोज की वही उनकी मृत्यु का कारण बनी। वह दुनिया की ऐसी पहली महिला रहीं, जिन्हें दो बार नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी दोनों बेटियों को भी नोबेल सम्मान मिला।

वैज्ञानिक प्रयोगों के दौरान ही प्रयोगशाला में एक और प्रयोग हुआ। मैरी पियरे से मिलीं और प्रेम का एक नया अध्याय शुरू हुआ इसकी परिणति विवाह में हुई। इस वैज्ञानिक दंपती ने 1898 में पोलोनियम की महत्वपूर्ण खोज की। 

रसायन विज्ञान और रेडियोधर्मिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण खोज के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाली पहली महिला वैज्ञानिक मैरी क्यूरी का आज (7 नवंबर) जन्मदिन है। उनका पूरा नाम मैरी स्क्लाडोवका क्यूरी था। वारसा (पोलैंड) में जन्मीं मैरी के जीवन के साथ कई सुखद-दुखद संयोग रहे हैं। नोबेल विजेता प्रथम महिला होने के साथ ही वह ऐसी भी पहली शख्सियत रहीं, जिन्हें दो बार नोबेल से सम्मानित किया गया। यह भी दुखद संयोग रहा कि जिस आविष्कार के लिए वह नोबेल से सम्मानित हुईं, उसी कारण, यानी 1934 में अतिशय रेडिएशन के प्रभाव के कारण ही उनका निधन हो गया। बाद में उनकी दोनों बेटियों को भी नोबल पुरस्कार सम्मानित किया गया। बड़ी बेटी आइरीन को 1935 में रसायन विज्ञान में नोबल मिला तो छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति के लिए। भौतिकी में अब तकसिर्फ दो स्त्रियों को नोबल पुरस्कार मिला है। पहली थीं मैरी क्यूरी, जबकि दूसरी थीं मारिया गोईपार्ट मेयर, जिन्हें 1963 में नोबल मिला।

विज्ञान की दो शाखाओं (भौतिकी एवं रसायन विज्ञान) में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाली इस पहली वैज्ञानिक को महिला होने के कारण तत्कालीन वारसॉ में सीमित शिक्षा की ही अनुमति थी। इसलिए उन्हें छिप-छिपकर उच्च शिक्षा प्राप्त करनी पड़ी। बाद में बड़ी बहन की आर्थिक सहायता की बदौलत वह भौतिकी और गणित की पढ़ाई के लिए पेरिस गईं। उन्हे फ़्रांस में डॉक्टरेट पूरा करने वाली पहली महिला होने का गौरव भी है। उन्हें पेरिसविश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर बनने वाली पहली महिला होने का गौरव भी मिला।

विलक्षण स्मरण-शक्ति वाली मैरी अपने दोस्तों के बीच मान्या नाम से लोकप्रिय थीं। सोलह साल की उम्र में हायर सेकंडरी में उन्हें स्वर्ण पदक मिला। उनके माता-पिता शिक्षक थे। गलत निवेश के कारण पिता का पैसा डूब गया। जब मैरी 11 वर्ष की थीं, तभी मां की मृत्यु हो गई। आर्थिक तंगी के दिनों में मैरी को कुछ समय शिक्षण और एक घर में गवर्नेस भी बनना पड़ा, जहां जीवन का पहला प्यार उन्हें हुआ। दुर्भाग्य से वह विफल रहा और मैरी के लिए मानसिक परेशानी का सबब बना। मैरी पेरिस में चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने वाली बहन ब्रोनिया को वह पैसा भेजती थीं, ताकि वह बाद में उन्हें मदद करे। सन् 1891 में वह आगे की पढ़ाई करने पेरिस चली गईं। मुफलिसी के दिनों में ब्रेड-बटर और चाय के सहारे उन्होंने पढ़ाई जारी रखी।

वर्ष 1894 से प्रयोगशाला में काम करना शुरू कर दिया। वैज्ञानिक प्रयोगों के दौरान ही प्रयोगशाला में एक और प्रयोग हुआ। मैरी पियरे से मिलीं और प्रेम का एक नया अध्याय शुरू हुआ इसकी परिणति विवाह में हुई। इस वैज्ञानिक दंपती ने 1898 में पोलोनियम की महत्वपूर्ण खोज की। कुछ ही महीने बाद उन्होंने रेडियम की खोज भी की। चिकित्सा विज्ञान और रोगों के उपचार में यह एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी खोज साबित हुई। मैरी क्यूरी ने 1903 में पी-एच.डी. पूरी कर ली। सन् 1903 में इस दंपति को रेडियो एक्टिविटी की खोज के लिए नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ।

मैरी के लिए मातृत्व भी बेहद प्रेरणादायक अनुभव रहा। उन्होंने दो बेटियों को जन्म दिया। सन् 1897 में आइरीन हुई और 1904 में ईव। मैरी का कहना था कि शोध कार्य व घर-बच्चों को एक साथ संभालना आसान नहीं था, लेकिन वह अपने जुनून को हर स्थिति में जिंदा रखने का प्रण कर चुकी थीं। इसी बीच एक सडक दुर्घटना में उनकेपति वैज्ञानिक पियरे क्यूरी का निधन हो गया। इसके बाद पति के सारे अधूरे कार्यों की जिम्मेदारी भी मैरी ने खुद निभाई। सन् 1911 में उन्हें रसायन विज्ञान के क्षेत्र में रेडियम के शुद्धीकरण (आइसोलेशन ऑफ प्योर रेडियम) के लिए दूसरा नोबल पुरस्कार मिला। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अपनी बडी बेटी आइरिन के सहयोग से उन्होंने एक्स-रेडियोग्राफी के प्रयोग को विकसित करने के लिए कार्य किया। सन् 1922 तक वह बौद्धिक चरम तक पहुंच चुकी थीं। सन् 1932 तक उन्होंने पेरिस में क्यूरी फाउंडेशन का सफल निर्माण कर लिया, जहां उनकी बहन ब्रोनिया को निदेशक बनाया गया।

पहले प्यार के दुखद अंत ने भी उन्हें अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होने दिया। जब उनको पेरिस से बहन का बुलावा आया था तो वह सबकुछ भूल कर एक नए भविष्य को ओर चल पड़ी थीं। नवम्बर 1891 में वह हजारो मील की रेल यात्रा करके पेरिस पहुँची थीं। वैसे तो वह काफी खुले विचारों वाली युवती थीं, गर्मी की छुट्टियों में वह खूब मजे करती थीं, बहनों के साथ नृत्य करतीं पर बहन के पास पेरिस में जीजा के दिल बहलाव से उनका अध्ययन प्रभावित होना उन्हे नागवार गुजरने लगा। उन्होंने इससे बचने के लिए अलग कमरा लेना ठीक समझा। समस्या यह थी कि आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण अच्छा और सुविधाजनक कमरा मिलना नामुमकिन था। इसलिए मैरी ने छठवीं मंजिल पर एक कमरा किराये पर ले लिया, जो गर्मी में गर्म और सर्दी में बहुत ठंडा हो जाता था।

मैरी काम पर जातीं, लौटते वक्त फल, सब्जियां और अंडे लातीं, क्योंकि खाना पकाने का उनके पास वक्त नहीं बचता था। फिर तपते गर्म या सिले-ठंडे बिस्तर में सो जाती थीं। अपनी आत्मकथा में मेरी ने लिखती हैं- 'यह मेरे जीवन का सबसे कष्टप्रद भाग था, फिर भी मुझे इसमें सच्चा आकर्षण लगता है। इससे मुझ में स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की बहुमूल्य भावनाएं पैदा हुईं। एक अनजानी लड़की पेरिस जैसे बड़े शहर में गुम सी हो गई थी, किन्तु अकेलेपन में भी मेरे मन में शांति और संतुष्टि जैसी भावनाएं बची रहीं।'

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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