बुलंदियों पर ठहरने का कमाल है रघुराम राजन की ज़िंदगी का सफ़र

नायाब कामयाबियों से भरे रघुराम राजन के जीवन  में बहुत है सीखने-समझने को....‘मेरी किस्मत ने मुझे बहुत बुलंदियाँ अता कीं। जब मुझे आईआईएम में अपने भविष्य के बारे में पूछा गया था कि मैं क्या बनना चाहता हूँ, तो मेरी ज़ुबान से निकल गया था कि मैं आरबीआई का गवर्नर बनना चाहता हूँ।’

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बुलंदियाँ किसी को आसानी से नहीं मिलतीं, अगर मिल भी जाती हैं, तो उन बुलंदियों पर बने रहना आसान नहीं होता। कुछ लोग बुलंदियों पर पहुँच भी जाते हैं, बने भी रहते हैं, लेकिन देश और दुनिया उनके लिए कोई मायने नहीं रखते। जो लोग जीवन में ऊँचे मुकाम पर पहुँच जाते हैं और वहाँ भी देश, दुनिया और लोग उनके लिए प्रथम होते हैं ऐसे चंद चेहरों में एक चेहरा रघुराम गोविंद राजन का है।

हिंदी उर्दू के विख्यात शायर अशोक साहिल ने कहा था -

बुलंदियों पे पहुँचना कोई कमाल नहीं....बुलंदियों पर ठहरना कमाल होता है

विश्वि के प्रमुख दस अर्थशास्त्रियों में से एक रघुराम गोविंद राजन इस शेर को चरितार्थ करते हैं। 4 सितम्बर 2013 को भारतीय रिज़र्व बैंक के 23 वें गवर्नर के रूप में जब उन्होंने पदभार संभाला तो उनपर गिरते रुपए को संभालने के साथ-साथ देश की अर्थव्योवस्थात को फिर से पटरी पर लाने की सबसे बड़ी चुनौती थी। इस पर व न केवल खरे उतरे, बल्कि अपनी सूझ बूझ से भारत बल्कि विश्व भर की अर्थ व्यवस्था पर अपना प्रभाव छोड़ा।

दर असल रघुराम राजन ने रिज़र्व बैंक का गवर्नर बनने का सपना अपनी आँखों में बहुत पहले संजोया था। उस समय जब वो आईआईएम अहमदाबाद में पढ़ रहे थे। राजन ने राज्यपाल बनने के बाद उस घटना का उल्लेख करते हुए बताया था,

‘मेरी किस्मत ने मुझे बहुत बुलंदियाँ अता कीं। जब मुझे आईआईएम में अपने भविष्य के बारे में पूछा गया था कि मैं क्या बनना चाहता हूँ, तो मेरी ज़ुबान से निकल गया था कि मैं आरबीआई का गवर्नर बनना चाहता हूँ।’

एक और घटना का उल्लेख करते हुए राजन बताते हैं,

 ‘जब मैंने अमेरिका के एमआईटी में पीएचडी में प्रवेश के लिए आवेदन दाखिल किया तो मुझे प्रवेश देने से इन्कार किया गया। क्योंकि मैंने पत्र में लिखा था कि मैं ग़रीब भारतीय नागरिक हूँ, मैं पीएचडी के लिए निर्धारित फीस दाखिल नहीं कर सकता।...लेकिन कुछ दिन बाद अचानक एमआईटी का पत्र छात्रवृत्ति के प्रस्ताव के साथ मेरे हाथ में था।’

राजन आईएमएफ के मुख्य अर्थ शास्त्री थे। वह छोड़कर वापिस आना सहज निर्णय नहीं होता था, लेकिन उनके सपने को अचानक 2012 में उस समय रास्ता मिल गया, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार के रूप में उन्हें भारत वापस बुला गया। राजन मानते हैं कि दिल से खुश होकर काम करों तो मंज़िल मिल ही जाती है।

टाइम पत्रिका द्वारा विश्व के 100 अति प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किये गये भारतीय रिज़र्व बैंक के 23 वें गवर्नर रघुराम राजन भारत के भविष्यदर्शी बैंकर माने जाते रहे हैं। टाइम पत्रिका के अनुसार राजन भारत के ऐसे महान अर्थशास्त्री हैं, जिन्होंने भारत को एक ऐसे समय में उभरते बाज़ारों में बनाये रखने में महत्वपूर्ण भुमिका निभाई, जब विश्व की अर्थव्यवस्था लगातार गिर रही थी।

राजन की यह महानता उनके कार्य और विचार दोनों के कारण होती है। चाहे किसी भी प्रकार का जोखम हो, उपने विचार खुलकर दुनिया के सामने रखने वाले रघुराम राजन दुनिया की अर्थव्यवस्था के लगातार गिरने के कारणों को रेखांकित करते रहे रहे हैं। हालाँकि कभी इनको अपनी इन टिप्पणियों के कारण आरोपित भी होना पड़ा, लेकिन उन्होंने खरी बात कहने से कभी हिचकिचाहट महसूस नहीं की।

2003 से 2006 तक आईएमएफ के सब से युवा मुख्य अर्थशास्त्री रहे राजन को कभी अमेरीकी सेक्रेट्री लारी समर्स ने अर्थव्यवस्था के विरोधी होने का आरोप लगाया था, लेकिन उन्होंने अपनी पारदर्शिता से अर्थ के बाजार को नयी दिशा दी। जब वे भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर चुने गये तब भी उन्होंने साफ कहा कि भारत के आर्थिक विकास में हमारी सरकार की मेहनत का परिणाम रहा है, लेकिन यह प्रदर्शन हमें लगातार 20 वर्षों तक करते रहना है, वरना लक्षित मंज़िलों की ओर आगे बढ़ना आसान नहीं होगा।

रघुराम राजन का पूरा नाम: रघुराम गोविंद राजन है। उनका जन्म: 3 फ़रवरी 1963 को भोपाल शहर में एक तमिल परिवार में हुआ। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बनने से पूर्व वे प्रधानमन्त्री, मनमोहन सिंह के प्रमुख आर्थिक सलाहकार व शिकागो विश्वविद्यालय के बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में एरिक॰ जे. ग्लीचर फाईनेंस के प्रोफेसर थे।

बालअवस्था में वे लगातार अपने परिवार के साथ श्रीलंका, इंडोनेशिया तथा बेल्जियम जैसे देशों में घूमते रहे और इनकी प्रारंभिक शिक्षा भी चलती रही। दिल्ली पब्लिक स्कूल, दिल्ली मंन प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने वाले रघुराम को स्नातक की परीक्षा में उत्तम प्रदरर्शन के लिए डायरेक्टर्स स्वर्ण पदक प्रदान किया गया था।

राजन घर परिवार में संपन्नता होने के बावजूद दुनिया के लिए कुछ करने की भावना के साथ पूरे पैशन के साथ अर्थ शास्त्र में अध्ययन एवं शोध से जुड़े रहे। अर्थशास्त्र उनका पैशन था। 1985 में उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेण्ट, अहमदाबाद से 1987 में एमबीए की उपाधि प्राप्त की। यहाँ वे रुके नहीं, आगे बढ़ते गये। शिकागो विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस में शिक्षा प्राप्त की। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से 1991 में उन्होंने अर्थशास्त्र विषय में पीएच डी. की।

राजन ऐसे अर्थ शास्त्रियों में से हैं, जिन्होंने पहले अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभाओं को मनवाया और फिर बाद में देश का रुख किया। वे जनवरी 2003 में अमेरिकन फाइनेंस एसोसिएशन द्वारा दिए जाने वालेफिशर ब्लैक पुरस्कार के प्रथम प्राप्तकर्ता थे। यह सम्मान 40 से कम उम्र के अर्थशास्त्री के वित्तीय सिद्धान्त और अभ्यास में योगदान के लिए दिया जाता है।

राजन वर्ष 2003 में वे इंटरनेशनल मोनेटरी फंड (आईएमएफ) में सबसे कम उम्र के आर्थिक सलाहकार और शोध के निदेशक बने । 2003 से 2006 तक वे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख अर्थशास्त्री व अनुसंधान निदेशक रहे और भारत में वित्तीय सुधारों के लिये योजना आयोग द्वारा नियुक्त समिति का नेतृत्व भी किया।

राजन ने अर्थ एवं प्रबंधन की दुनिया में बड़ी मानी जाने वाली संस्थाओं में अपने पदचिन्ह छोड़े हैं। मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी, और स्लोन स्कूल ऑफ मैनेजमेण्ट; नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी का केलौग स्कूल ऑफ मैनेजमेण्ट और स्टॉकहोम स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स जैसे संस्थानो में वे अतथि प्रोफेसर रहे। उन्होंने भारतीय वित्त मन्त्रालय, विश्व बैंक, फेडरल रिजर्व बोर्ड और स्वीडिश संसदीय आयोग के सलाहकार के रूप में भी काम किया है। राजन सन् 2011 मे़ं अमेरिकन फाइनेंस ऐसोसिएशन के अध्यक्ष थे तथा वर्तमान समय में अमेरिकन अकैडमी ऑफ आर्ट्स एण्ड साइंसेज़ के सदस्य हैं।

राजन ने अपनी विचारों की स्वतंत्रता पर कभी आँच आने नहीं दी। अपने अध्ययन से जो कुछ समझा। पूरी निडरता से उसे दुनिया के सामने रखा। 2005 में ऐलन ग्रीनस्पैन अमेरिकी फेडरल रिजर्व की सेवानिवृत्ति पर उनके सम्मान में आयोजित एक समारोह में राजन ने वित्तीय क्षेत्र की आलोचना कर एक शोधपत्र प्रस्तुत किया। उस शोधपत्र में उन्होंने स्थापित किया कि अन्धाधुन्ध विकास से विश्व में आपदा हावी हो सकती है। राजन ने विश्व की 2007-2008 के लिए वित्तीय प्रणाली के पतन की 3 वर्ष पूर्व ही भविष्यवाणी कर दी थी। रघुराम राजन ने यूरोप तथा यूएस में 2008 के दौरान आए आर्थिक संकट को लेकर 2008-12 की समयावधि के लिए रिसर्च पेपर लिखा जिसमें इस आर्थिक संकट के कारणों पर विस्ता्रपूर्वक जानकारी दी।

अप्रैल 2009 में, राजन ने द इकोनोमिस्ट के लिए अतिथि स्तम्भ लिखा, जिसमें उन्होंने प्रस्तावित किया कि एक नियामक प्रणाली होनी चाहिए जो वित्तीय चक्र में होने वाले अप्रत्याशित लाभ को कम कर सके। 2004 में राजन की पुस्तक सेविंग कैपिटलिज्म फ्रॉम कैपिटलिस्ट प्रकाशित हुई, जिसके सह लेखक उनके साथी शिकागो बूथ के प्रोफेसर लुईगी जिन्गैल्स थे। इस पुस्तक ने पूंजी तथा अर्थ के क्षेत्र में हलचल मचा दी थी।

एक अर्थ शास्त्री के तौर पर राजन को कई सम्मान मिले।

• ग्लोबल इंडियन ऑफ द ईयर (2011 नासकोम)

• आर्थिक विज्ञान के लिए सम्मान- इन्फोसिस (2012)

• सैंटर फार फाइनेंशियल स्टडीज़, ड्यूश बैंक सम्मान (2013)

• भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए कठोर मौद्रिक उपाय करने के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ केंद्रीय बैंक गवर्नर’ पुरस्कार (2014)

• ‘यूरोमनी’ पत्रिका पुरस्कार (2014)

• पुस्तक ‘फाल्ट लाइंस : हाउ हिडेन फ्रैक्चर्स स्टिल थ्रीटेन द वर्ल्ड इकॉनोमी को फाईनैंशियल टाईम्स-गोल्डमैन सैक का अर्थ-व्यापार श्रेणी की सर्वोत्तम पुस्तक के सम्मान का पुरस्कार (2010)

• फाइनेंशियल टाइम्स समूह के मासिक प्रकाशन ‘द बैंकर’ से सेंट्रल बैंकर आफ द ईयर अवार्ड (वैश्विक एवं एशिया प्रशांत) 2016

गवर्नर के रूप में राजन ने 4 सितम्बर 2013 को पदभार ग्रहण करने के बाद अपने प्रथम भाषण में ही राजन ने भारतीय बैंकों की नयी शाखाएँ खोलने के लिये लाईसेंस प्रणाली की समाप्ति की घोषणा कर दी।

अब जब कि उनके आरबीआई गवर्नर के रूप में कार्यकाल बढ़ाने की बात हो रही है तो कई उद्योगपति खुलकर उनके समर्थन में हैं। हालाँकि कुछ राजनीतिज्ञों ने विरोध भी जताया है।

उद्योगपति आदि गोदरेज रघुराम राजन के पक्ष में उतरते हुए उनको दूसरा कार्यकाल दिए जाने की वकालत की है। गोदरेज ने कहा कि वह राजन के प्रशंसक हैं। वे कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि उन्होंने अच्छा काम किया है. दुनिया भर में उनका सम्मान है। वह काफी क्षमतावान व्यक्ति हैं। यदि उनका कार्यकाल बढ़ाया जाता है तो यह भारत के लिए अच्छी बात होगी।’

राजन का तीन साल का मौजूदा कार्यकाल इस साल सितंबर में पूरा हो रहा है। 



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