तीरंदाजों का गांव छत्तीसगढ़ का शिवतराई, यहां बच्चा-बच्चा है तीरंदाज 

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यह लेख छत्तीसगढ़ स्टोरी सीरीज़ का हिस्सा है... 

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले का एक छोटा सा गांव शिवतराई इन दिनों अपनी तीरंदाजी को लेकर सुर्ख़ियों में है। यह पूरा का पूरा गांव तीरंदाजों से भरा पड़ा है और इसे लोग अब चैम्पियन गांव कहने लगे हैं।

कभी परंपरागत धनुर्धर रहे आदिवासीयों ने भी समय के साथ धनुर आखेट का परित्याग कर दिया था, लेकिन आर्चरी खेल का सहारा मिलने के बाद आदिवासी युवाओं ने एक बार फिर अपनी इस परंपरागत विद्या को जीवित कर दिया है। 

छत्तीसगढ़ का नाम लेते ही जेहन में घने वनों की तस्वीर उभरने लगती है और यहाँ के आदिवासियों की परम्पराएं भी एक रोचक एहसास कराती हैं लेकिन इन सबसे इतर एक पहचान आदिवासियों के परंपरागत खेल तीरंदाजी (आर्चरी ) को लेकर भी है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले का एक छोटा सा गांव शिवतराई इन दिनों अपनी तीरंदाजी को लेकर सुर्ख़ियों में है। यह पूरा का पूरा गांव तीरंदाजों से भरा पड़ा है और इसे लोग अब चैम्पियन गांव कहने लगे हैं। इस गांव में द्रोणाचार्य की भूमिका निभा रहे हैं छत्तीसगढ़ पुलिस के प्रधान आरक्षक इतवारी राज सिंह जिन्होंने गांव के सारे आदिवासी बालकों को एकलव्य बना दिया है।

बिलासपुर से 70 किलोमीटर दूर आदिवासी अंचल मे बसा है शिवतराई। जहां चैम्पियन्स की फौज रहती है। इस गांव का बच्चा बच्चा चैम्पियन बनकर अपने गांव और देश का नाम रौशन करना चाहता है और तीर कमान हर बच्चे की पहचान बन गई है। इस गांव में इस खेल की शुरुआत की छत्तीसगढ़ पुलिस के प्रधान आरक्षण इतवारी राज सिंह ने जिन्होंने अपनी मातृभूमि का कर्ज चुकाने के लिए अपने गांव मे यह अनूठी पहल की। सात साल पहले शुरू की गई इस पहल से अब गांव का नाम आर्चरी के क्षेत्र में देश मे अपना अलग स्थान रखने लगा है।

इतवारी सिंह ने अपने गांव के बेरोजगार युवाओं को खेल से जोड़ने के लिए अपने वेतन से इस खेल की शुरुआत की। प्रारम्भ में गांव के चार बच्चों ने तीर धनुष में निशाने बाजी का खेल शुरू किया और आर्चरी के खेल में जिले के साथ राज्य और राष्ट्रीय खेलों मे भी अपना जौहर दिखाया और गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाकर इनकी सफल शुरुआत हुई। इसके बाद इस महंगे खेल के प्रति दूसरे युवक युवतियों का भी रुझान बढ़ने लगा और अब डेढ़ हजार की जनसंख्या वाले गांव के हर घर से एक युवा आर्चरी का चैम्पियन बनने को बेताब है, जो संसाधनो की कमी के बावजूद इंटरनेशनल आर्चरी में खुद का लोहा मनवाने का इरादा रखता है।

शिवतराई गांव अब बिलासपुर जिले के उन विशेष गांव में शुमार हो गया है जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है। आदिवासी बच्चो के धनुर आखेट ने इस गाँव की अलग पहचान बना दी है। कभी परंपरागत धनुर्धर रहे आदिवासियों ने भी समय के साथ धनुर आखेट का परित्याग कर दिया था लेकिन आर्चरी खेल का सहारा मिलने के बाद आदिवासी युवाओं ने एक बार फिर अपनी इस परंपरागत विद्या को जीवित कर दिया है। आलम यह है कि हर घर का बच्चा अब आर्चरी का अभ्यास करते मैदान में दिखाई देता है।

एक दशक से इस गांव के अधिकांश युवा इसी खेल को अपना लक्ष्य बना कर रोजाना निशाना साधते हैं। मौसम चाहे कैसा भी हो मैदान में आने के बाद ये खिलाड़ी जुनून की हद पार करते हुए अलग-अलग रेंज से टारगेट में सटीक निशाना साधते हैं। इन खिलाड़ियों मे 8 साल से लेकर 20 वर्ष के खिलाड़ी शामिल हैं जो इस खेल में देश के कई महानगरो में अपना जौहर दिखा कर मेडल हासिल कर चुके हैं। बच्चा चाहता है कि तीरंदाजी के वैश्विक मानचित्र पर उनके गांव शिवतराई का नाम अंकित हो।

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