लाखों मे बिकती हैं इस नन्हें पिकासो की पेंटिंग्स

अपनी पेंटिंग से पूरी दुनिया पर छा गया नन्हा अद्वैत... 

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चार साल की उम्र में कोई पिकासो तो नहीं बन सकता, असंभव, लेकिन कनाडा में अपनी चित्रकार मां श्रुति कोलार्कर के साथ रह रहा पुणे का नन्हा अद्वैत इन दिनो अपनी अद्भुत पेंटिंग से धूम मचाए हुए है। उसे कनाडा का सबसे कम उम्र का सफल चित्रकार माना जा रहा है। इससे पहले जनवरी में न्यूयॉर्क में भी उसकी पेंटिंग ने तहलका मचा दिया था, जब उसकी पेंटिंग एक लाख तीस हजार में बिकी।

नन्हा अद्वैत
नन्हा अद्वैत
अद्वैत की कामयाबी से लगता है कि हुनर कभी उम्र का मोहताज नहीं होता है। चित्रकार नन्हा सा हो या उम्रदराज, वह हमेशा अपने दिल की सुनता है। जो उसे अच्छा लगता है, वही करता रहता है। उसकी कला को जितनी स्वतंत्रता मिलती है, उसमें उतना ही निखार आता जाता है।

पेंटिंग की अपनी अलग दुनिया है, अलग उत्सवी अंतरमुग्धता और अलग-सा हुनर, जिस पर कोई भी रीझ जाता है। पेंटिंग कलाधर्मिता के साथ ही एक पेशा भी है। महंगी पेंटिंग से दुनिया के अनेक चित्रकार लाखों की कमाई करते रहे हैं। अमेरिका में स्पेनिश चित्रकार पाब्लो पिकासो की एक पेंटिग लगभग 773 करोड़ रुपए ( 11.5 करोड़ डॉलर ) में नीलाम हुई थी। ये पेंटिंग 1905 में बनाई गई थी, जिसमें एक लड़की को हाथ में फूल की टोकरी लिए दिखाया गया है। इसी तरह मॉनेत का चित्र जल में खिला कमल (निमफियाश एंड फ्लेउर) करीब 569 करोड़ रुपए में बिका था। करीब पांच सौ साल पहले लियोनार्डो दा विंची ने 'सल्वाटोर मुंडी' पेंटिंग बनाई, जिसमें ईसा मसीह की तस्वीर थी।

कुछ लोग इसे लियोनार्डो दा विंची की आखिरी पेंटिंग कहते हैं, तो कुछ मोनालिसा का पुरुष रूप। पिछले साल 15 नंवबर को जब ये पेंटिंग करीब 29.25 अरब रुपए में नीलाम हुई तो बाजार सारे रिकॉर्ड टूट गए। ये तो रही दुनिया के कुछ एक महान चित्रकारों की महंगी पेंटिंग्स की बातें, अभी हाल ही में पुणे (महाराष्ट्र) के एक नन्हे चित्रकार ने अपनी पेंटिंग के हुनर से पूरी दुनिया को चौंका दिया है। उस मासूम चित्रकार नाम है अद्वैत कोलार्कर, जिसकी उम्र अभी मात्र चार साल है। किसी चित्रकार की इतनी कम उम्र भी उसकी बहुमूल्य कामयाबी से लोगों को हैरतअंगेज लगती है।

कनाडा के सेंट आर्ट सेंटर में अद्वैत के सोलो एग्जिबीशन में उसकी डायनासॉर और ड्रैगन से प्रेरित पेंटिंग हजारों डॉलर में बिकी हैं। आर्ट वर्ल्ड में नन्हे अद्वैत की पेटिंग ने तहलका सा मचा दिया। पिछले महीने उनकी पेटिंग्स न्यूयॉर्क के आर्ट एक्सपो में दिखाई गई थी। न्यूयॉर्क आर्ट एक्सपो में उसकी एक पेंटिंग एक लाख तीस हजार रुपए में बिकी थी। गौरतलब है कि करण आचार्य हाल ही में अपनी पेंटिंग से सोशल मीडिया में एक पल में छा गए थे। आचार्य ने पहले तो पीएम नरेंद्र मोदी की 'गुस्से वाले हनुमान' पेंटिंग बनाई, फिर मोदी की मुस्कुराती हुई पेंटिंग, जो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई।

मोदी जब कर्नाटक चुनाव के दौरान रैलियों में पहुंचे तो उन्होंने उस दौरान आचार्य के आर्ट की जमकर तारीफ भी की थी। इस पर आचार्य लिखा- 'सर, नरेंद्र मोदी, मेरे काम को देखने और सराहना करने के लिए धन्यवाद! आपको धन्यवाद देने के लिए छोटा सा गिफ्ट है। उम्मीद है आपको पसंद आएगा। हालांकि उन्होंने एक बार में यह तस्वीर शेयर नहीं की। उन्होंने एक के बाद एक पेंटिंग पूरी करते हुए फोटो शेयर की। सबसे पहले उन्होंने पीएम की आंखें बनाते हुए फोटो डाली, इसके बाद एक-एक कर अंत में पूरी तस्वीर शेयर कर दी थी। इस तरह पेंटिंग की दुनिया में तो आए दिन कुछ न कुछ विशेष होता ही रहता है। फिलहाल, अद्वैत की कामयाबी पर कुछ बातें और।

अद्वैत का परिवार मूलतः पुणे का रहने वाला है। वर्ष 2016 में यह परिवार रहने के लिए कनाडा चला गया था। ये भी दावा है कि मात्र चार साल का ये बच्चा कनाडा के इतिहास का सबसे कम उम्र का चित्रकार है। अद्वैत की मां श्रुती कोलार्कर भी व्यावसायिक आर्टिस्ट हैं। वह बताती हैं कि जब अद्वैत एक साल का था, तभी उसने हाथ में ब्रश पकड़ लिया था। वह तभी से कुछ न कुछ बनाता, रचता रहा है। वह सिर्फ रंगों से खेलता नहीं है बल्कि उसे रंगों को सही तरीके से भरने की समझ भी है। इसी साल जनवरी में सेंट जॉन आर्ट सेंटर में उसकी पहली सोलो एग्जिबिशन थी। उसकी एक पेंटिंग एक लाख 30 हजार रुपए (दो हजार डॉलर) में बिकी।

विश्व कला मंच पर अद्वैत की इस अदभुत कामयाबी से उसकी मां श्रुति काफी खुश हैं। वह कहती हैं कि हमारे लिए हमारे बेटे की खुशी बहुत जरूरी है। हम चाहते हैं कि हमारा बेटा ऐसे ही आर्ट को एन्जॉय करे। वह जिंदगी भर ऐसे ही खुश रहे। अद्वैत को कोई भी पेंटिंग बनाने के लिए किसी की मदद की कोई आवश्यकता नहीं होती है। अद्वैत को सबसे ज्यादा गैलेक्सी, डायनासोर और ड्रैगन की पेंटिंग बनाना अच्छा लगता है। वह अक्सर ब्रश और रंगों के लेकर कुछ न कुछ बनाता रहता है। धीरे-धीरे उसने अपने इस हुनर में और भी ज्यादा महारत हासिल कर ली।

अद्वैत की कामयाबी से लगता है कि हुनर कभी उम्र का मोहताज नहीं होता है। चित्रकार नन्हा सा हो या उम्रदराज, वह हमेशा अपने दिल की सुनता है। जो उसे अच्छा लगता है, वही करता रहता है। उसकी कला को जितनी स्वतंत्रता मिलती है, उसमें उतना ही निखार आता जाता है। इतनी कम उम्र में अपनी काबिलियत और हुनर की बदौलत अद्वैत आज दुनियाभर में करोड़ों दिलों पर राज कर रहा है। बचपन से पेंटिंग के एक ऐसे ही कला-साधक हैं मथुरा के प्रेम चौधरी। बृजवासियों को गर्व होता है कि उनकी पेंटिंग्स की लंदन में प्रदर्शनी लग चुकी है। उनका बचपन से ही चित्रकारी के प्रति गहरा लगाव था। उन्होंने मात्र आठ वर्ष की आयु में ही पेन्सिल हाथ में थाम ली थी। जिस तरह अद्वैत की कला के पीछे उनकी चित्रकार मां श्रुति की प्रेरणा रही है, उसी तरह प्रेम अपने बड़े भाई जयप्रकाश की चित्रकारी से प्रेरित हुए। इसके बाद जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई, उनकी चित्रकारी भी निखरती गई।

शुरू में उनकी चित्रकारी का लोग मजाक बनाया करते थे। वह दिल्ली गए तो लोगों ने उनको देहाती कहकर चिढ़ाया पर उन्होंने कभी हार नहीं मानी। अपनी धुन में लगे रहे। अब वह कम उम्र में ही चित्रकारी के क्षेत्र में जानी मानी शख्सियत बन चुके हैं। यदि कोई बच्चा अच्छा आर्टिस्ट लगे तो उसे भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। हर बच्चा, हर छात्र अपने बचपन में कागज पर चित्र उकेरता है, रंगों का संसार बनाता है पर कुछ बच्चों के बनाए चित्र देख उनके माता-पिता, उनके सहपाठी, उनके शिक्षक हैरत में रह जाते हैं। बावजूद इसके उनकी यह जन्मजात प्रतिभा, यह शौक, यह हुनर धीरे-धीरे खत्म हो जाता है, क्योंकि हम सब, चाहे शिक्षक हों या अभिभावक, अपनी इच्छाएं, अपनी सोच उन पर लाद देते हैं और उन्हें ऐसे विषयों की तरफ धकेल देते हैं, जिनमें न तो उनका मन लगता है और न ही उनमें उनसे जुड़ी प्रतिभा होती है।

हम आज सामने आ रहे करियर के अनूठे एवेन्यूज के बावजूद उन्हें इंजीनियर, डॉक्टर, एम.बी.ए. प्रोफैशनल के दायरे से बाहर नहीं निकलने देते। इस सोच को बदलना होगा। यह सब जान-सुनकर लगता है कि पैशन के तौर पर आर्ट को भी अपना करियर बनाया जा सकता है। इसमें नौकरी के भी बेशुमार मौके हैं। फ्रीलांसिंग करके भी अच्छा पैसा कमाया जा सकता है। पेंटिंग और एप्लाइड आर्ट के चार-चार साल के डिग्री कोर्स बीएफए (बैचलर इन फाइन आर्ट) के लिए अभ्यर्थी का किसी भी संकाय से 12वीं पास होना जरूरी है। इन्हीं में दो-दो साल के एमएफए (मास्टर्स इन फाइन आर्ट) के डिग्री पाठ्यक्रमों के लिए किसी भी संकाय में स्नातक होना चाहिए। इसके अलावा डिप्लोमा कोर्स भी उपलब्ध हैं। पेंटिंग और एप्लाइड आर्ट विद ग्राफिक डिजाइनिंग के चार-चार साल के डिप्लोमा पाठ्यक्रमों (डीएफए) के लिए अभ्यर्थी का 12वीं पास होना जरूरी है। कोर्स के दौरान छात्रों को बेसिक ड्राइंग एंड पेंटिंग, मीडियम एंड टैक्नीक्स, आर्ट एंड क्राफ्ट, म्युरल्स, ग्राफिक्स, एडीशनल आर्ट तथा थ्यूरी की पढ़ाई करवाई जाती है। थ्यूरी में हिस्ट्री ऑफ आर्ट, एस्थैटिक्स और मैथड एंड मैटीरियल पढ़ाया जाता है।

अद्वैत कोलार्कर तो, फिर भी एक नन्हा सा चित्रकार है, और भी कई हिंदुस्तानी चित्रकारों की मनोहर पेंटिंग्स पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट कर रही हैं। इंदौर की डॉ. सुधा वर्मा ऐसी ही एक चित्रकार हैं, जिन्होंने थंका पटचित्रों पर पीएचडी की है और इन पर एक किताब भी लिखी है। करीब 70 बरस की उम्र में भी वे कला के क्षेत्र में सक्रिय हैं और इस प्राचीन कला को जीवित रखने की कोशिश कर रही हैं। गौतम बुद्ध पर केंद्रित उनकी पेंटिंग्स देखकर कोई भी मुग्ध हो जाता है। उनकी विधा थंका आर्ट है। एक ऐसी प्राचीन और समृद्ध कला, जो पूरी तरह से बौद्ध धर्म और भगवान बुद्ध पर केंद्रित है। थंका तिब्बती भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ऐसी वस्तु, जिसे लपेट कर रखा जा सके। थंका चित्र कपड़े बनते हैं। इसलिए इन्हें थंका पटचित्र कहा जाने लगा और ये कला की एक शैली की तरह विकसित हो चुका है।

देहरादून में पली-बढ़ी डॉ. सुधा वर्मा ने वहीं पर 1967 फाइन आर्ट में एमए किया और उसके बाद उनकी शादी हो गई और पति का ट्रांसफर पटना हो गया। पटना के म्यूजियम में उन्होंने पहली बार थंका पटचित्र देखे और उन्हें देख कर ही इस कला में रुचि जागी। उन्होंने थंका पटचित्रों की अपनी पीएचडी का विषय बनाया। थंका आर्ट के बारे में गहरी जानकारी के लिए वह बिहार के बोधगया और हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में भी गईं जो कि बौद्ध धर्म का बड़ा केंद्र है। डॉ. वर्मा बताती हैं कि थंका कला पूरी तरह से गौतमबुद्ध के जीवन और बौद्ध धर्म पर केंद्रित है। इस कला का विषय बुद्ध, बुद्ध के अवतार, बोधिसत्व और उनसे जुड़ी कहानियां, मान्यताएं आदि हैं। बौद्ध मंदिरों में ही ये कला विकसित हुई और फली फूली है। उनके थंका पटचित्रों में गौतम बुद्ध और उनके अवतार जैसे अवलोकितेश्वर, पद्मसंभव, अमितायु, रत्न संभव आदि के साथ मैत्रेय यानी भविष्य के बुद्ध को भी बनाया जाता है। चित्रों में बुद्ध के बचपन, विवाह, तपस्या, निर्वाण आदि के साथ बौद्ध दर्शन नजर आता है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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