सेक्स वर्कर्स बनीं सुपर वुमन

बात चाहे कॉन्डोम के इस्तेमाल से इंकार करने वाले ग्राहकों की हो या फिर न्यायालयों में हिंसक मामलों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने की, सेक्स वर्कर्स अब हर बात पर खुल कर सामने आयेंगी, क्योंकि 'स्वास्ति' है न।

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स्वस्ति, एक एनजीओ से अधिक महिला सेक्स वर्कर्स को सक्षम बनाने में सिद्धहस्त है, जिसने इन महिलाओं को एक ऐसा मंच दिया है, जहां रहते हुए वे अपनी आवाज़ उठा सकती हैं। बात चाहे कॉन्डोम के इस्तेमाल से इंकार करने वाले ग्राहकों की हो या फिर न्यायालयों में हिंसक मामलों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने की- इसी तरह के कई उदहारण इस बात को साफ करते हैं कि ये औरतें कितनी स्वतंत्र और सक्षम हो गई हैं, जो सिर्फ पीड़िता नहीं हैं, बल्कि अपने लिए आवाज़ उठाना जानती हैं।

राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम III और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के एक अनुमान के मुताबिक, देह व्यापार में शामिल महिलाओं की जिस संख्या की बात कर रहे हैं वो 12 लाख से लेकर 30 लाख के बीच है। संख्या में ये आश्चर्यजनक अंतर और विरोधाभास इस बात का संकेत है कि अभी भी इस मामले में और अधिक शोध किये जाने की आवश्यकता है, लेकिन इस प्रतिबंधित मामले को गहराई से समझने के लिए सबसे पहले इस पर खुल कर बात करनी होगी।

भारत एक ऐसा देश है, जहां सेक्स जैसे गंभीर और ज़रूरी मुद्दे पर दबी ज़ुबान में बात की जाती है। हमारे आसपास ऐसी तमाम औरतें हैं, जो देह व्यापार के काम में लिप्त हैं। कोई औरत ये काम जानबूझ कर नहीं करती बल्कि उसके साथ कई तरह की मजबूरियां जुड़ी होती हैं, लेकिन हमारा समाजा ऐसी औरतों को कलंक मानता है। ये बात सिर्फ कहने तक ही है, कि समय बदल गया है समाज बदल गया है, अब चीज़ें पहले जैसी नहीं रहीं, लेकिन चीज़े पहले जैसी ही हैं क्योंकि आज भी औरतें भारी मात्रा में इस काम को कर रही हैं। इन सब पर कभी बात नहीं की जाती। कभी-कभी बात उठती है और फिर मामला पूरी तरह से शांत हो जाता है। National AIDS control program III और Ministry of Women and Child Development के एक अनुमान के मुताबिक, देह व्यापार में शामिल महिलाओं की जिस संख्या की बात कर रहे हैं वो 12 लाख से लेकर 30 लाख के बीच है। संख्या में ये आश्चर्यजनक अंतर और विरोधाभास इस बात का संकेत है कि अभी भी इस मामले में और अधिक शोध किये जाने की आवश्यकता है, लेकिन इस प्रतिबंधित मामले को गहराई से समझने के लिए सबसे पहले इस पर खुल कर बात करनी होगी।

इस बीच सबसे अच्छी बात है, कि बेंगलुरु स्थित एक गैर-लाभकारी स्वास्थ्य संसाधन केंद्र ‘स्वस्ति’, न केवल इस मुद्दे पर बात कर रही है, बल्कि 15 साल से सेक्स वर्कर्स के आसपास के नकारात्मक वातावरण को भी बदलने का काम कर रही है। नशीली दवाओं के इंजेक्शन लेनेवालों, ट्रांसजेंडर्स,और अन्य पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुषों के साथ ही सेक्स वर्कर्स एचआईवी और अन्य यौन संक्रमित संक्रमणों के उच्च जोखिम वाले समूहों में आती हैं। सामाजिक रूप से बहिष्कृत और गरीब समुदायों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणामों को प्राप्त करने की कोशिश करते हुए, 'स्वस्ति' को एहसास हुआ कि HIV/AIDS पर जागरूकता कार्यक्रम ही स्वास्थ्य हस्तक्षेप के रूप में पर्याप्त नहीं है। जैसा कि उन्हें पता चला, यौन कार्य में लगी महिलाओं को एचआईवी की तुलना में अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं थीं जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं था।

जब 'स्वस्ति' ने आह्वान इंडिया एड्स पहल का नेतृत्व किया (जो गेट्स फाउंडेशन द्वारा 2003 में शुरू किया गया था) तो इस कार्यक्रम के माध्यम से, उन सभी छह राज्यों में (जहां ये कार्यान्वित किया गया था) 1,09,336 महिला सेक्स वर्कर्स तक पंहुचा गया। इसकी मदद से 600,000 से अधिक नये संक्रमणों को रोका गया और एचआईवी के नये संक्रमण में गिरावट दर्ज की गई। 'स्वास्ति' के वैकल्पिक हस्तक्षेप रणनीतियों की वजह ये संभव हो सका, जिसने दिलचस्प रूप से इस रोग को कम करने के लिए एड्स से संबंधित हर चीज को लक्षित किया। था।

महिला सेक्स वर्कर्स के मुश्किल ज़मीनी हालात

नैतिक रूप से निषिद्ध सेक्स व्यवसाय में एक औरत खुद को कैसा पाती है? हो सकता है कि लोगों द्वारा उसके साथ जबरदस्ती नहीं की जाती हो, लेकिन यह दुखद तथ्य यह है कि उसकी परिस्थियां उसे मजबूर करती हैं। 'स्वस्ति' संस्था के अनुसार बेंगलुरु में ही लगभग 60-70 प्रतिशत सेक्स वर्कर्स सड़कों पर ही काम करती हैं। आसपास के गांव से आने वाली ज्यादातर औरतों को पैसे की सख्त ज़रूरत होती है। सड़कों पर होने का मतलब है कि पुलिस, स्थानीय गुंडों और दलालों से हिंसा और उत्पीड़न का आसान शिकार होना। हालांकि छत के नीचे रहने वाली औरतों को भी नहीं बख्शा जाता और उसे भी उसके परिवार, ग्राहकों और समाज द्वारा बड़े पैमाने पर परेशान किया जाता है।

वेश्यावृत्ति भारत में कानूनी है, फिर भी हिंसा के ज्यादातर मामले रिपोर्ट नहीं होते, क्योंकि औरतों के सामने पहला सवाल नैतिकता का आकर खड़ा हो जाता है और कानूनी अधिक कहीं पीछे छूट जाते हैं।

सेक्स व्यवसाय में अधिकतर औरतों को तो एचआईवी के बारे में पता भी नहीं होता और साथ ही इन महिलाओं की एक बड़ी संख्या उन कानूनों से भी परीचित नहीं है, जो उनकी सुरक्षा कर सकते हैं। असुरक्षा की भावना इस कदर इनके ऊपर हावि है, कि एचआईवी जानकारी का ग्राफ बहुत नीचे चला जाता है।

एक सेक्स वर्कर को केवल तभी गिरफ्तार किया जा सकता है जब वह सार्वजनिक स्थानों पर ग्राहकों को आकर्षित कर रही हो, लेकिन इस कानून का दुरूपयोग पुलिसकर्मियों द्वारा बड़े पैमाने पर उन्हें उस समय गिरफ्तार कर के किया जाता है, जब वे अपने सार्वजनिक घरों में आराम कर रही होती हैं। ‘स्वस्ती’ और कर्नाटक हेल्थ प्रमोशन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया, "गिरफ्तार होने के बाद, महिलाओं को अदालत में पेश किया जाता है, जहाँ उन्हें माफी मांगने और 500 रुपये का जुर्माना देकर अपनी जमानत करवानी होती है।" इस तरह का उत्पीड़न लगातार एचआईवी से उनके जोखिम को बढ़ा देता है, जो इस समस्या का मूल कारण है।

'स्वस्ति न्याय संजीवनी' 24X7 कानूनी हैल्पलाइन हिंसा कि शिकार महिलाओं की अदालती कानूनी मामलों में मदद करती है।

ऐसा नहीं है सेक्स वर्कर्स को कंडोम का इस्तेमाल करने के लिए कहने मात्र से ही इस बीमारी का प्रसार कम हुआ हो, इस पर 'स्वस्ति' के अध्यक्ष शिवकुमार का तर्क है; "ये महिलाएँ ग्राहकों पर कंडोम के इस्तेमाल के लिए दबाव बनाने में सक्षम नहीं हैं।"
इस का एक स्पष्ट उदाहरण मालती नाम की एक महिला का मामला है, जो अब 'स्वस्ति' से जुड़ी है। हालाँकि वह जानती थीं कि एचआईवी एक खतरा है और कंडोम इस खतरे से बचने में मदद करता है, फिर भी ग्राहक से इसके इस्तेमाल करने के लिए आग्रह करना अपनी एक दिन की रोजी-रोटी को खतरे में डाल कर अपने अस्तित्व पर सवाल खड़ा करने जैसा है। कई मामलों में जब ग्राहकों से कंडोम का इस्तेमाल करने का आग्रह किया गया तो इन महिलाओं के साथ और अधिक हिंसा की गई।

इस तरह किया ‘स्वस्ति’ ने हस्तक्षेप

जल्दी ही 'स्वस्ति' को इस बात का एहसास हो गया था, कि सेक्स वर्कर्स में जिंदगी को खतरे में डाल देने वाली इस बीमारी के फैलाव को रोकने से पहले उनके ऊपर होने वाली हिंसा, उनको इस इस बीमारी के जोखिम और उन्हें नैतिक कलंक की वजह से निरन्तर घुटते रहने जैसे मुद्दों से काम करने की शुआत करनी होगी और इस तरह से बेंगलुरु के सेक्स वर्कर्स के संगठन 'स्वाति महिला संघ' की भागीदारी में प्रोजेक्ट 'प्रगति' की शुरुआत हुई। ये प्रोजेक्ट महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक पहल थी, जिसके साथ उन्होंने कई स्वयं-सहायता समूहों का भी गठन किया, जिसमें अब एक-दूसरे की जम कर सहायता करने वाली महिलाएं शामिल हैं।

शहर में इस प्रकार के कुछ स्थान (हब) बनाये गए हैं, जो इन महिलाओं के लिए स्वर्ग जैसे हैं और जहां वे शारीरिक और भावनात्मक रूप से स्वयं को सुरक्षित पाती हैं। किसी भी प्रकार की सहायता प्राप्त करना अब उनके के लिए बहुत सरल और सुनिश्चित गारंटी है क्योंकि 'स्वस्ति' द्वारा उनके लिए, उनकी हर समस्याओं के लिए विशेष समाधान हैं।
सामाजिक अधिकार कार्यक्रम के तहत, इन महिलाओं के लिए विधवा पेंशन, राशन कार्ड, आय और जाति प्रमाण पत्र, मतदाता पहचान पत्र, इत्यादि सरकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित किया जाता है। इनका स्वयं का कानूनी सलाह का सेल 'कानु मन्तपा' इन्हें इनके अधिकारों के बारे में जागरूक करता है। इस सेल में एक वकील भी है, जो हिंसा की शिकार महिलाओं की कानूनी मदद करता है। साथ ही 'स्वस्ति न्याय संजीवनी' 24X7 कानूनी हेल्पलाइन हिंसा कि शिकार महिलाओं की अदालती कानूनी मामलों में मदद करती है।

एचआईवी पॉज़िटिव शराब की लत से पीड़ित महिलाओं के लिए प्रगति परियोजना 'स्वस्ति ज्योति' कार्यक्रम के अंतर्गत एक माइक्रो फाइनेंस संस्था बनायी गयी है, जहां महिलाएं अपनी आय और बचत का प्रबंधन कर सकती हैं।

प्रगति परियोजना के प्रभावों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। सभी 'हब' या 'स्वस्ति माने' से हर महीने लगभग 3,000 महिलाएं जुड़ती हैं, जिन्हें जागरूक करके सशक्त बनाया जाता है। जो महिलाएं कभी पुलिस थाने में जाने से डरती थीं अब वे अदालतों में अपने हक़ की लड़ाई लड़ रही हैं। जहाँ पहले वे कॉन्डोम के इस्तेमाल पर जोर नहीं दे पाती थी वहीं अब कॉन्डोम के इस्तेमाल से इनकार करने वाले ग्राहकों को वे मना कर देती है, क्योंकि अब वे आर्थिक और भावनात्मक रूप से अधिक मजबूत और स्वतंत्र हैं। जिन महिलाओं ने अतीत में अकल्पनीय आघात और हिंसा का सामना किया था, अब 'प्रगति' में ‘पीयर एडुकेटर्स’ या ‘जीविका’ के रूप में काम कर रहीं है।

'स्वस्ति' की सफलता का रहस्य

'स्वस्ति' की रणनीति है, कि वो परदे के पीछे से काम करे और उन महिलाओं को आगे रखे जो सशक्त रूप से अपने जैसी दूसरी औरतों के लिए काम कर सके। इतनी संवेदनशील, गंभीर और ज़रूरी दिशा में जिस तरह 15 साल पुराने इस संगठन ने काम किया है वो वास्तव में उल्लेखनीय है। 'स्वस्ति' की निदेशक क्षमा करकल बताती हैं, कि 'स्वस्ति, एक सक्षमकर्ता के रूप में काम करता है और इस तरह से 'स्वस्ति' का दृष्टिकोण समुदायों को आत्मनिर्भर बनाने का है। हम एक सदस्य आधारित संगठन हैं। हमारे यहां कोई निदेशक मंडल नहीं है, बल्कि सभी सदस्य मिलकर तय करते हैं कि क्या किया जाना चाहिए। हमने सबसे पहले संस्था से सदस्यों को जोड़ना शुरू किया, जिसकी वजह से संगठन को सदस्यों तक पहुंच कर उन्हें समझने में मदद मिली। हमारा अगला कदम महिलाओं में नेतृत्व क्षमता का विकास करना था, जिसकी वजह से समुदायों और स्वयं-पंजीकृत संगठनों द्वारा चुने गए सदस्यों को नियमों के अनुपालन या वित्तीय प्रबंधन में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए सक्षम बनाया गया

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए क्षमा कहती हैं, कि संसाधन जुटाने को लेकर 'स्वस्ति' का दृष्टिकोण सबसे नया है। आमतौर पर, किसी भी संगठन के लिए धन केवल तब आता है जब किसी परियोजना का प्रस्ताव तैयार किया जाये, लेकिन हमने महसूस किया कि इस तरह की फंडिंग पर निर्भर रहने की कोई ज़रूरत नहीं है। स्वस्ति ने पैसा जुटाने के लिए रचनात्मक तरीकों के बारे में समुदाय के साथ विचार विमर्श किया और समाचार पत्रों को एकत्र करना और बेचना, लॉटरी में शामिल होना, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करना और उनके लिए प्रायोजक तलाशना और यहां तक ​​कि उद्यमशील महिलाओं द्वारा घर पर खाद्य उत्पाद बना कर बेचने का काम किया गया। सदस्यों ने ऑफिस के संचालन के लिए आवश्यक संसाधनों दिये और अधिक से अधिक लोगों को संगठन से जोड़ा, जिसकी मदद से आर्थिक ज़रूरतों को भी पूरा किया जा सका।

अपनी बात को अंतिम रूप देते हुए क्षमा कहती हैं, कि इस दृष्टिकोण ने 'स्वस्ति' को आखिकार संसाधनों की दृष्टि से स्थिर कर दिया। 'स्वति' ने यह सुनिश्चित किया कि सभी सामुदायिक संगठन सरकारी विभागों और निजी क्षेत्रों के साथ मिलकर काम करते रहें, ताकि वे इस तंत्र के बारे में लगातार जानकारी रख सकें। उदाहरण के लिए समुदाय के सदस्यों को राष्ट्रीय कानूनी सेवा अधिकारियों द्वारा प्रशिक्षित किया गया ताकि कानूनी सहायता हमेशा समुदाय के भीतर ही उपलब्ध हो सके

-वर्षा रॉयसम
अनुवाद: प्रकाश भूषण सिंह

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