साढ़े 16 लाख महिलाओं को धुएं से मिला छुटकारा जब रसोई में पहुंचा उज्जवला गैस का उजियारा

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यह लेख छत्तीसगढ़ स्टोरी सीरीज़ का हिस्सा है...

छत्तीसगढ़ राज्य में एलपीजी गैस का उपयोग तेजी से बढ़ा। राज्य गठन के बाद 2003 में राज्य में केवल छह लाख 80 हजार परिवारों के पास रसोई गैस कनेक्शन था, जबकि आज 36 लाख 38 हजार परिवार इसका उपयोग कर रहे हैं।

पहले गांव की महिलाएं ईंधन के लिए लकड़ी इकट्‌ठा करने जंगल जाया करती थीं। सप्ताह में एक से दाे दिन का समय इसी काम में बीतता था। राज्य में 13 अगस्त 2016 को योजना शुरू होते ही बदलाव की बयार चली।

दो साल पहले तक गांव की रसोई धुएं से सराबोर रहती थी। इस धुएं का महिलाओं के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा था। इसी को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्जवला योजना शुरू की। इसके बाद राज्य में एलपीजी गैस का उपयोग तेजी से बढ़ा। राज्य गठन के बाद 2003 में राज्य में केवल छह लाख 80 हजार परिवारों के पास रसोई गैस कनेक्शन था, जबकि आज 36 लाख 38 हजार परिवार इसका उपयोग कर रहे हैं। उज्जवला योजना के तहत छत्तीसगढ़ का कवरेज 34 प्रतिशत से बढ़कर 65 प्रतिशत हो गया। इसने प्रदेश की महिलाओं की जिंदगी बदल दी है।

पहले गांव की महिलाएं ईंधन के लिए लकड़ी इकट्‌ठा करने जंगल जाया करती थीं। सप्ताह में एक से दाे दिन का समय इसी काम में बीतता था। राज्य में 13 अगस्त 2016 को योजना शुरू होते ही बदलाव की बयार चली। तब गैस कनेक्शन धारियों की संख्या 19 लाख 35 हजार थी। फिर 16 लाख 35 हजार गरीब परिवार की महिलाओं के नाम से गैस कनेक्शन जारी किया गया। जब लोगों को पता चला कि केंद्र सरकार मुफ्त में कनेक्शन देकर 1600 रुपए सब्सिडी उपलब्ध करा रही है तो वे आवेदन करने के लिए जागरूक हुए। इसे देखते हुए राज्य सरकार ने भी दो कदम आगे बढ़कर 200 रुपए के अंशदान पर डबल बर्नर वाला चूल्हा देने की पेशकश की। साथ ही प्रथम रिफिल की सब्सिडी भी प्रदान की। यानी इस योजना के हरेक हितग्राही को राज्य शासन की ओर से 1500 रुपए की सब्सिडी दी जा रही है।

नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग ने इस योजना के तहत 2016-17 में 10 लाख महिलाओं को गैस कनेक्शन उपलब्ध कराया, जिसकी सब्सिडी 153 करोड़ रुपए शासन ने वहन किया। एक साल बाद 15 लाख महिलाओं को कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा गया। इसके विरुद्ध साढ़े छह लाख महिलाओं को गैस उपलब्ध कराया गया। समय पर सिलेंडर की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए वितरकों की भी संख्या बढ़ाई गई। आज 413 वितरक का कर रहे हैं। प्रथम चरण में 50 वितरकों को दुर्गम क्षेत्रों के लिए नियुक्त किया गया है। उन्होंने अब सात हजार 525 कनेक्शन जारी किए हैं।

इधर विभाग ने उपभोक्ताओं के संरक्षण को लेकर भी विभिन्न काम किए हैं। विगत 14 सालों में पूर्णकालिक जिला उपभोक्ता फोरम की संख्या बढ़कर 12 हो गई है। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, बस्तर, राजनांदगांव, रायगढ़, सरगुजा, कोरिया, कबीरधाम, कोरबा, धमतरी और जांजगीर। इसी तरह अंशकालिक फोरम की संख्या 15 है। इससे पहले पूर्णकालिक पांच और अंशकालिक फोरम 11 ही थे। इसी तरह उपभोक्ताओं के हित को देखते हुए प्रदेश के कारोबारियों द्वारा उपयोग में लाए जा रहे बाट, माप और तौल उपकरणों के सम्यापन के लिए इज ऑफ डूइंग की ऑन लाइन सेवा से जोड़ा गया है।

अब जानते हैं छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े उत्पाद धान के बारे में। आपको बता दें कि प्रदेश में हो रही धान खरीदी और चावल उपार्जन की प्रक्रिया को केंद्र सरकार ने भी सराहा है। वर्ष 2008 में प्रधानमंत्री पुरस्कार, नेशनल ई-गर्वनेस अवार्ड सहित सीएसआई निहलेंट अवार्ड, ई-एग्रीकल्चर अवार्ड और मंथन अवार्ड भी मिल चुका है। समर्थन मूल्य पर धान उपार्जन मात्रा में निरंतर वृद्धि हुई है। इससे पहले 2003 में समर्थन मूल्य में धान उपार्जन केंद्रों की संख्या एक हजार 323 थी जो बढ़कर एक हजार 992 हो गई। इसी तरह बेचने वाले किसानों की संख्या आठ लाख थी जो अब 13 लाख 28 हजार हो गई है।

तब 39 लाख 61 हजार मीट्रिक टन धान खरीदकर किसानों को कुल दो हजार 130 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया। वहीं विगत 14 सालों में छह करोड़ 96 लाख मीटरिक टन धान खरीदकर किसानों को कुल 75 हजार 47 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया है। इसके बाद किसानों को हो रही असुविधा को देखते हुए सरकार ने कोर बैंकिंग शुरू की यानी अब राशि लेने के लिए किसानों को लाइन में खड़ा नहीं होना पड़ता बल्कि निर्धारित राशि सीधे उनके खाते में जमा हो जाती है। धान उपार्जन में पारदर्शिता लाने के लिए कस्टम मिलिंग को भी कंप्यूटरीकृत किया गया, जो देश में पहला और अभिनव प्रयास साबित हुआ।

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