महिलाओं के हक में सुप्रीमकोर्ट के फैसले भी उन्हें बर्दाश्त नहीं!

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ये तो हद है। महिलाओं के पक्ष में हो रहे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले भी कुछ लोगों को बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं। वे हिंसक फसाद तक पर आमादा हैं। मामला पाकिस्तान में ईसाई महिला आसिया बीबी का हो या भारत में सबरीमाला मंदिर अथवा 'मीटू' का!

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर घमासान हुआ। आज भी महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश नहीं मिला है। 

क्या हिंदुस्तान, क्या पाकिस्तान, महिलाओं के लिए हर देश ऐसा, जहां महिलाओं के हक में सुनाए जा रहे सर्वोच्च अदालतों के फैसले भी पुरुष प्रधान समाज के एक बड़े वर्ग के गले नहीं उतर रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या किसी लोकतांत्रिक देश में किसी पार्टी, किसी संगठन, किसी व्यक्ति की आवाज सर्वोच्च अदालत के फैसले से भी ऊंची होनी चाहिए? हमारे देश के सबरीमाला मंदिर प्रकरण और पाकिस्तान में ईसाई महिला आसिया बीबी को ईशनिंदा के एक मामले में वहां के सुप्रीम कोर्ट द्वारा फांसी के फैसले से मुक्त जाने के फैसले के बाद तो ऐसा ही देखने में आ रहा है। सबरीमाला मंदिर में आज भी महिलाओं को नहीं जाने दिया जा रहा है।

कहा जा रहा है कि भारत की अदालतों को सोच-समझकर फैसला करना चाहिए यानी महिलाओं को मंदिर में नहीं जाने देना चाहिए। इस समय पाकिस्तान के कई बड़े शहरों में कट्टरपंथी उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं। वे फैसला देने वाले न्यायाधीशों तक को मारने की धमकी दे रहे हैं। वर्ष 2010 में निचली अदालत, फिर हाईकोर्ट ने ईशनिंदा के मामले में आसिया को मौत की सज़ा सुनाई तो उसे अब पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। आसिया से मुलाकात करने वाले पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल सलमान तासीर की पहले ही हत्या की जा चुकी है।

बात 14 जून, 2009 की है। आसिया नूरीन अपने घर के पास फालसे के बाग में दूसरी महिलाओं के साथ काम कर रहीं थीं। वहीं उनका झगड़ा हुआ। आसिया ने अपनी किताब 'ब्लासफेमी' में इस घटना का बाकायदा जिक्र किया है। वह लिखती हैं - 'मुझे आज भी वह तारीख याद है। उस तारीख से जुड़ी हर चीज याद है। मैं उस दिन फालसा बटोरने के लिए गई थी। उस दिन आसमान से आग बरस रही थी। दोपहर होते-होते गरमी इतनी तेज हो गई कि भट्टी में काम करने जैसा लग रहा था। मैं पसीने से तरबतर थी। गर्मी इतनी ज्यादा थी कि मेरे शरीर ने काम करना बंद कर दिया। मैं झाड़ियों से निकलकर एक कुएं तक पहुंची। बाल्टी डालकर पानी निकाल लिया। कुएं पर रखे गिलास में बाल्टी से पानी निकालकर पीया। वहां खड़ी एक प्यासी महिला को भी पानी निकालकर दिया। तभी एक महिला ने चिल्लाकर कहा कि ये पानी मत पियो क्योंकि 'ये हराम है' क्योंकि एक ईसाई महिला ने इसे अशुद्ध कर दिया है। मैंने इसके जवाब में कहा कि मुझे लगता है कि ईसा मसीह इस काम को पैग़ंबर मोहम्मद से अलग नज़र से देखेंगे। इसके बाद उन्होंने कहा कि तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, पैग़ंबर मोहम्मद के बारे में कुछ बोलने की। मुझे ये भी कहा गया कि अगर तुम इस पाप से मुक्ति चाहती हो तो तुम्हें इस्लाम स्वीकार करना होगा। मुझे ये सुनकर बहुत बुरा लगा क्योंकि मुझे अपने धर्म पर विश्वास है। इसके बाद मैंने कहा - मैं धर्म परिवर्तन नहीं करूंगी क्योंकि मुझे ईसाई धर्म पर भरोसा है। ईसा मसीह ने मानवता के लिए सलीब पर अपनी जान दी। आपके पैग़ंबर मोहम्मद ने मानवता के लिए क्या किया है?'

आसिया का मामला तो फिर भी एक मज़हबी टिप्पणी से जुड़ा है लेकिन सबरीमाला मंदिर प्रकरण तो सिर्फ धर्मांध पुरुष वर्चस्व की जीती-जागती नज़ीर है, जो हमारे देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले को भी ललकारने का दुस्साहस कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर घमासान हुआ। आज भी महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश नहीं मिला है। हैदराबाद की पत्रकार कविता और कोच्चि की रेहाना फातिमा समेत कई महिलाओं ने सबरीमाला पहाड़ी पर चढ़ने का प्रयास किया तो प्रदर्शनकारियों ने जबरन लौटा दिया। मंदिर के कर्मचारी भी प्रदर्शनकारियों की भीड़ में शामिल हो गए। इतना ही नहीं, बीएसएनएल के एर्नाकुलम बिजनेस एरिया की कर्मचारी फातिमा के कोच्चि स्थित घर में तोड़-फोड़ की भी गई। इस पूरे मामले पर केरल के राज्यपाल पी. सदाशिवम पुलिस प्रमुख लोकनाथ बेहरा को चेता चुके हैं कि वह केरल सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को जबरदस्ती लागू न करने दें। विवाद अब भी पूरी तरह थमा नहीं है। इसी 05 नवंबर से मंदिर के कपाट फिर खुलने जा रहे हैं, इसलिए प्रशासन की ओर से 4 से 6 नवंबर तक सन्नीधनम, पंबा, निलाक्कल और इलावंकुल में तीन दिन के लिए धारा 144 लगाई जा रही है। इस मामले में अब तक 3,505 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। अब देखिए, सुप्रीमकोर्ट के फैसले के खिलाफ कई राजनीतिक दल सड़क पर उतर आए हैं। दावा किया जा रहा है कि इसे बिशप और मौलानाओं का भी समर्थन है।

चलिए, हम क्षणभर के लिए इसे भी मान लेते हैं कि धार्मिक आस्था से जुड़ा मामला है लेकिन 'MeToo'? ये क्या है और इसके प्रति पुरुष वर्चस्व वाले इंसाफ का रवैया क्या है? भारतीय समाज में ये सवाल भी सीधे तौर पर महिलाओं के स्वाभिमान से जुड़े हैं। देश की अब तक 17 पीड़ित महिला पत्रकार पद छोड़ने के लिए विवश एक केंद्रीय मंत्री पर छेड़छाड़ का आरोप लगा चुकी हैं। यह मामला भी कोर्ट पहुंच चुका है। और अब अमेरिका में रह रहीं भारतीय पत्रकार पल्लवी गोगोई ने वॉशिंगटन पोस्ट में छपे एक लेख में पद छोड़ चुके 'नेता-पत्रकार' पर रेप का आरोप लगाया है। आरोपी एमजे अकबर की सफाई भी कितनी दुखद है कि 'हम दोनों सहमति के साथ रिलेशनशिप में थे।' ऐसी सहमति को क्या कहा जाए, जिसमें जयपुर के एक होटल में पल्लवी के साथ बलात्कार की भी गुंजायश रही हो! उन दिनो पल्लवी गोगोई 'एशियन एज' में काम करती थीं।

आज महिलाओं का वर्कप्लेस में अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में भी खुलकर अपनी बात रखना काफी मुश्किल और चुनौतीपूर्ण हो चुका है। ऐसा ही एक मामला मध्य प्रदेश के शहडोल स्थित ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) की नौ महिलाओं का सामने आया है, जहां न्याय मिलना तो दूर, उल्टे उन महिलाकर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। इन सभी महिलाओं का असिस्टेंट डायरेक्टर (प्रोग्रामिंग) रत्नाकर भारती पर यौन शोषण के आरोप हैं। रत्नाकर के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हो चुकी है। आंतरिक जांच कमेटी उन्हें दोषी भी पा चुकी है। बावजूद इसके रत्नाकर अभी आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र में काम कर रहे हैं और कुछ दिन पहले ही पीड़ित उन नौ महिला कर्मियों की नौकरी समाप्त कर देने की जानकारी सार्वजनिक हुई है।

आकाशवाणी के दिल्ली, धर्मशाला, ओबरा, सागर, रामपुर, कुरुक्षेत्र आदि स्टेशनों से भी ऐसे ही कई और मामले सामने आए हैं। इन केंद्रों पर भी यौन शोषण के आरोपी चेतावनी देकर छोड़ दिए गए और शिकायत करने वाली महिलाओं को नौकरी छोड़ने के लिए कहा गया है। अब आकाशवाणी कर्मियों की यूनियन की ओर से प्रसार भारती के चीफ एग्जिक्यूटिव शशि शेखर वेम्पती को पत्र लिखकर पूछा है कि आखिर क्यों पीड़ित महिलाओं का आकाशवाणी स्टेशनों में प्रवेश तक प्रतिबंधित कर दिया गया है और आरोपी आराम से नौकरी कर रहे हैं?

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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