किसानों को समृद्ध करने के साथ ही शुगर जैसी बीमारियां कम कर सकता है यह चावल

यूपी के एक किसान का सीएम को अनूठा सुझाव...

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नकदी फसल के तौर पर गन्ने की जगह पर भदोही के किसान अनिल सिंह ने यूपी सरकार को ब्लैक राइस प्रजाति के धान की खेती करने की सलाह दी है। अनिल सिंह के मुताबिक अगर इस सुझाव पर अमल किया जाए तो किसानों की आय बढ़ेगी ही साथ ही इसे खाने वाले लोग कैंसर और डायबिटीज जैसी बीमारियों से भी दूर रहेंगे।

अपने खेतों में अनिल सिंह (तस्वीर  साभार- एनबीटी)
अपने खेतों में अनिल सिंह (तस्वीर  साभार- एनबीटी)
अनिल सिंह ने बताया कि हमने धान की फसल में किसी प्रकार के रासायनिक उर्वरक का उपयोग नहीं किया है। लेकिन धान की फसल में अब बालिया आ रही हैं, पूरी फसल लहलहा रही है। 

उत्तर प्रदेश के अधिकांश किसान नकदी फसल के रूप में गन्ने की खेती पर निर्भर होते हैं। लेकिन मौसमी फसल होने की वजह से उन्हें सिर्फ साल में एक बार ही इसका फायदा मिल पाता है। इसके साथ ही चीनी मिलों द्वारा सही समय पर भुगतान न मिल पाने की वजह से उन्हें परेशानियां होती हैं। नकदी फसल के तौर पर गन्ने की जगह पर भदोही के किसान अनिल सिंह ने यूपी सरकार को ब्लैक राइस प्रजाति के धान की खेती करने की सलाह दी है। अनिल सिंह के मुताबिक अगर इस सुझाव पर अमल किया जाए तो किसानों की आय बढ़ेगी ही साथ ही इसे खाने वाले लोग कैंसर और डायबिटीज जैसी बीमारियों से भी दूर रहेंगे।

दरअसल अनिल सिंह इस धान की पहले खेती कर चुके हैं वह भी बिना किसी रासायनिक खाद के। वे बताते हैं कि यह धान रोग प्रतिरोधक क्षमता से युक्त है। उनका दावा है कि यह सुगर और कैंसर जैसी बीमारियों के रोकथाम में भी कारगार साबित हो रहा है। बाजार में इसकी कीमत ढ़ाई सौ रुपये से 500 रुपये किलो तक है। एनबीटी की खबर के मुताबिक भदोही जिले के उप कृषि निदेशक अरविंद कुमार सिंह ने बताया कि कृषि विभाग जिले में पहली बार मणिपुर से ब्लैक राइस का बीज मंगाकर इसकी खेती करवाई है। जिले के सुरियावां ब्लाक के पूरेमनोहर अभिया वन गांव के प्रगतिशील किसान पहली अनिल सिंह ने पहली बार इसकी खेती की है।

अनिल सिंह ने बताया कि हमने धान की फसल में किसी प्रकार के रासायनिक उर्वरक का उपयोग नहीं किया है। लेकिन धान की फसल में अब बालिया आ रही हैं, पूरी फसल लहलहा रही है। किसान ने बताया कि अभी हमने प्रयोग के तौर पर इसकी खेती थोड़े से हिस्से पर किया है। यह खेती पूरी तरह आर्गेनिक यानी जैविक पद्धति पर आधारित है। हमने जिन खेतों में रसायानिक खाद का उपयोग किया है, उसकी अपेक्षा ब्लैक राइस की फसल कई गुणा अच्छी है। इसकी लंबाई चार फीट तक पहुंच गयी है। जबकि सिर्फ घरेलू गोबर की खाद डाली है। किसान ने बताया कि अभी ही एक कंपनी ने मुझसे संपर्क किया और ढाई सौ रुपये प्रति किलों तक का भुगतान करने के लिए तैयार है।

भदोही जिले के कृषि उपनिेदेशक अरविंद कुमार सिंह का दावा यह सुगर जैसे बीमारी को भगाने में बेहद उपयोगी है। रिसर्च से इसकी गुणवत्ता साबित हो गई है। यह एंटी आक्सीडेंट गुणों से भरपूर है। यह पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर राज्य की स्थानीय प्रजाति है। 135 दिन में तैयार हो जाती है। हमने मणिपुर से पांच किलो बीज मंगाया था। अगर आपको डायबिटिज की बीमारी है तो ब्लैक राइस के उपयोग से यह बीमारी आपको नहीं होगी, बीमारी है भी तो यह खत्म हो जायगी। किसान ने फसल की उपज जैविक पद्धति से किया है तो इसकी मांग बाजार में बढ़ जाती है। जिसकी किसान को अच्छी आय मिलती है। यह किसानों के लिए यह बरदान है। भदोही जिले में इसकी खेती प्रयोग के तौर पर पहली बार की गयी है।

ब्लैक राइस की खेती सबसे पहले सम और मणिपुर में शुरू की गयी। इसके बाद अब यह पंजाब, पश्चिमी यूपी और दूसरे राज्यों में खूब पसंद आ रही है और किसानों की आय का अच्छा जरिया साबित हो रही है। गन्ना की तुलना में यह किसानों की आय सुधार में बेहद लाभकारी फसल है। प्रगतिशील किसान अनिल सिंह पहली फसल को लेकर इतने उत्साहित हुए कि मुख्यमंत्री की प्रदेश में शुगर के मरीजों के बढ़ने की संख्या को लेकर चिंता जाहिर करते हुए गन्ना कम बोने की सलाह पढ़ने के बाद मणिपुर के ब्लैक राइस को बढ़ावा देने का सलाह दिया है।

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