कभी 1700 पर नौकरी करने वाली लखनऊ की अंजली आज हर महीने कमाती हैं 10 लाख

इरादे फौलादी हों तो मंजिलों को सजदा करना ही पड़ता है और जब फौलादी इरादों में संवेदनाओं का इस्पात मिल जाये तो ख्वाबों की इमारत हौसलों की जमीन पर खड़ी हो, दूसरों के लिये प्रेरणा का मरकज बन जाती है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की रहने वाली अंजली सिंह की सफलता की दास्तान भी कुछ ऐसी ही है।

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अंजली सिंह के जज़्बे ने ज़माने की बंदिशों, पारिवारिक स्थितियों और महिला होने के अघोषित दायरों में दफ़्न एक ख्वाब के पूरा न होने की कसक ने सैकड़ों लोगों के ख्वाबों को पूरा करने के हौसले को जन्म दिया और हाल ही में उन्हें आउटस्टैंडिंग विमेन आंत्रेप्रेन्योर के लिए फिक्की फ्लो अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। आईये एक नज़र डालते हैं अंजली के जीवन पर...

महिला आंत्रेप्रेन्योर, लखनऊ की अंजली सिंह एक सभा को संबोधित करते हुए
महिला आंत्रेप्रेन्योर, लखनऊ की अंजली सिंह एक सभा को संबोधित करते हुए
कभी सिर्फ 1700 रुपए की नौकरी करने वाली लखनऊ की अंजलि सिंह आज हर महीने 8 से 10 लाख का बिजनेस करती हैं। इनकी खुद की कंपनी है, जिसका सलाना टर्न ओवर 1 करोड़ रुपए है।

इरादे फौलादी हों तो मंजिलों को सजदा करना ही पड़ता है और जब फौलादी इरादों में संवेदनाओं का इस्पात मिल जाये तो ख्वाबों की इमारत हौसलों की जमीन पर खड़ी हो, दूसरों के लिये प्रेरणा का मरकज बन जाती है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की रहने वाली अंजली सिंह की सफलता की दास्तान कुछ ऐसी ही है।

अंजली के जज़्बे ने ज़माने की बंदिशों, पारिवारिक स्थितियों और महिला होने के अघोषित दायरों में दफ्न एक ख्वाब के पूरा न होने की कसक ने सैकड़ों लोगों के ख्वाबों को पूरा करने के हौसले को जन्म दिया और हाल ही में 29 अप्रैल को अंजलि सिंह को आउटस्टैंडिंग विमेन आंत्रेप्रेन्योर के लिए फिक्की फ्लो अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। कभी सिर्फ 1700 रुपए की नौकरी करने वाली अंजलि आज हर महीने 8 से 10 लाख का बिजनेस करती हैं। इनकी खुद की कम्पनी है, जिसका सलाना टर्न ओवर 1 करोड़ रुपए तक है।

अतीत की पगडंडियों पर सफर करते हुये 38 वर्षीय अंजली सिंह बताती हैं, कि

'मेरा ख्वाब था एयर हॉस्टेस बनना लेकिन शायद मेरे ख्वाबों को लड़की होने और मध्य वर्गीय परिवार की बंदिशों ने परवान नहीं चढने दिया। खैर खानदान में अकेली लड़की होने की वजह से परिवार ने शहर से बाहर नहीं भेजा और मैंने लखनऊ विश्वविद्यालय से एमबीए किया।'

2001 में एमबीए की डिग्री लेने के बाद अंजली ने लखनऊ के शिवगढ़ रिजॉर्ट से अपना पेशेवर जीवन शुरू किया और फिर थोड़े समय बाद चेन मार्केटिंग की पोस्ट और सैलरी के तौर पर 1700 रुपए महीने की नौकरी उन्होंने छोड़ दी। उसके बाद 2001 में ही आईएसएफएआई यूनिवर्सिटी की लखनऊ शाखा में काउंसलर की पद पर ज्वाइन किया, जहां 4,000 रुपए वेतन मिलता था। अंजली कहती हैं,

'2009 में पदोन्नति हुई और उसी कंपनी में मैं मार्केटिंग मैनेजर बन गई। उस वक्त मेरा वेतन 20 हजार रूपये था। 2001 में ही मैंने मार्केटिंग मैनेजर की जॉब भी छोड़ दी।'

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निजी क्षेत्र के विभिन्न व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में सेवा करने वाली अंजली सिंह ने महिला उत्थान के अपने बचपन के सपने को साकार करने की सोची। उनके मन में बचपन से ही अप्राधिकृत व शोषित वर्ग की महिलाओं हेतु कुछ कर गुजरने की इच्छा थी। अंजलि के पिता बैंक ऑफ इंडिया में जॉब करते थे। उन्होंने वीआरएस लेकर 1995 में भारतीय सेवा संस्थान नाम से एक एनजीओ शुरू किया था। अंजली कहती हैं,

'पापा को नेशनल जूट बोर्ड मिनिस्टरी ऑफ टेक्सटाइल गवर्मेंट ऑफ इंडिया से जूट से डिफरेंट टाइप के आइटम बनाने का प्रोजेक्ट मिला था। साल 2009 में मैंने पापा के एनजीओ में काम करने वाली शबनम को अपने साथ लेकर जूट के बैग्स और दूसरे आइटम्स बनाने का काम शुरू किया। धीरे-धीरे 25 से 30 महिलाएं साथ जुड़ गईं। कंपनी शुरू करने के लिए सरकारी बैंक से 15 लाख रुपए लोन भी लिया।'

यहां एक बात काफी महत्वपूर्ण है, कि जो भी महिलायें अंजली के साथ जुड़ रही थीं, उनमें से अधिकांश निम्न जीवन शैली को जीने वाली दुखियारी महिलायें थीं। उनकी स्थिति को देख कर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के मन में मदद का भाव बरबस उत्पन्न हो जाये। लेकिन अंजलि ने कोरी भावुकता को व्यवहारिक जामा पहनाते हुये, चाइनीज मुहावरे 'गरीब को रोटी देने से बेहतर है उसे रोटी कमाने की कला सिखाई जाये' को चरितार्थ करने के प्रयास को अमलीजामा पहनाने की दिशा में वर्ष 2009 में वृहत-स्तर पर देश के गोल्डन फाइवर 'जूट' के उत्पादों को महिलाओं की गरीबी व बेरोजगारी दूर करने का मूल मंत्र बनाया।

जूट के उपयोगी उत्पादों के निर्माण व विपणन का कार्य 'जूट आर्टीजन्स गिल्ड एसोसियेशन' नामक स्वयं सेवी संस्था बना कर अंजली ने दलित व शोषित वर्ग की महिलाओं व सेना की वीर नारियों (वार विडोज) को प्रशिक्षण व रोजगार देकर अपने कार्यों को नया आयाम दिया।

वर्तमान समय में अंजली और उनकी कंपनी द्वारा 500 से ज्यादा गरीब महिलाओं को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार दिया गया है तथा भविष्य में और अधिक संख्या में प्रशिक्षण के उपरान्त स्वरोजगार से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें राज्य व केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों की सहभागिता सराहनीय है। एफआईसीसीआई (फिक्की) की लेडीज आर्गेनाइजेशन का योगदान अंजली सिंह के प्रयासों से महिला सशक्तीकरण की मुहिम नयी ऊंचाइयां प्राप्त कर रही है। अंजली की संस्था जूट आर्टीजन्स गिल्ड एसोसियेशन से जुड़ी महिलाओं द्वारा जूट के उपयोगी उत्पाद जैसे- शॉपिंग बैग, फाइल फोल्डर तथा सेमीनार/ कॉन्फ्रेंसिज़ हेतु डेलीगेट किट/ बैग/ फोल्डर तैयार किए जा रहे हैं, जिससे प्लास्टिकपॉलीथीन का उपयोग भी घटा है।

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इस तरह अंजली सिंह के प्रयासों से महिलाओं को समाज में अपना स्थान प्राप्त करने के साथ-साथ आर्थिक सशक्तीकरण को असीमित बल मिल पा रहा है। भविष्य में रोजगारपरक प्रशिक्षणों के उपरान्त वृहत-स्तर पर रोजगार दिलाने का कार्य मिशन मोड पर चल रहा है। वर्ष 2017 में अंजलि ने भारतीय सेवा संस्थान एनजीओ को जूटआरटीशियन्स गिल्ड प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के तौर पर रजिस्टर्ड करा लिया है। आज इस कंपनी की लखनऊ में ही 4 शाखाएं हैं, जिसमें 200 से ज्यादा महिलाएं काम करती हैं। कंपनी का सलाना टर्नओवर 1 करोड़ से ऊपर है।

मिल चुके हैं ये अवॉर्ड

-अंजली को 29 अप्रैल 2017 को गवर्नर राम नाइक ने आउटस्टैंडिंग वुमन आंत्रेप्रेन्योर के लिए फिक्की फ्लो अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
-8 मार्च 2017 को लखनऊ मैनेजमेंट एसोशिएशन ने बेस्ट वुमन आंत्रेप्रन्योर अवॉर्ड से सम्मानित किया।
-8 मार्च को ही इस्टर्न मसाला कंपनी की तरफ से भी बेस्ट विमेन आंत्रेप्रेन्योर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया, साथ ही मई 2017 में HT मीडिया द्वारा अवॉर्ड के लिए नोमिनेट भी किया जा चुका है।

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लेखक / पत्रकार

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