खुले दिल से स्वीकार हो बदलाव!

दलितों में अब पहले के मुकाबले ज्यादा विश्वास पैदा हो गया है। ये उम्मीद की एक किरण है। वो पहले के मुकाबले ज्यादा प्रबुद्ध और सामाजिक बुराई के खिलाफ एकजुट हो गये हैं। यही वजह है कि अब वो इतिहास और समाज में अपनी सही जगह पाने के लिए अपनी लड़ाई लड़ने में शर्म महसूस नहीं करते। 

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मैं तब काफी युवा था जब मैं वाराणसी और इलाहाबाद के बीच मौजूद मिर्जापुर नाम के एक शहर में रहता था। मेरे पिता आयकर विभाग में नौकरी करते थे। हर शाम उनका एक चपरासी काम के सिलसिले में हमारे घर आता था और नाश्ते में हमारे साथ उसे भी चाय और बिस्कुट दिया जाता था, लेकिन यहाँ पर एक फर्क था और वो ये था कि उसकी कप और प्लेट हमारी कप और प्लेट से अलग होती थीं। हमें स्टील के बर्तनों में चाय नाश्ता दिया जाता था, वहीं उसे चीनी मिट्टी के बर्तन में ये सब परोसा जाता था। इतना ही नहीं हमारे बर्तनों को उसके बर्तनों से अलग रखा जाता था। हर शाम चीनी मिट्टी के उन बर्तनों को साफ कर अलग रखा जाता था और ये दिनचर्या में शामिल था। युवा होने के कारण मेरे लिए इस तरह के व्यवहार को समझना मुश्किल नहीं था, बल्कि मेरे लिए इसको समझना कोई बड़ी बात भी नहीं थी। बावजूद इसके एक दिन जिज्ञासा में मैंने अपनी मां से पूछा कि ऐसा क्यों होता है?

मेरी मां जो उत्तर प्रदेश के एक दूर दराज़ के गांव की रहने वाली थी जिसे पढ़ना-लिखना नहीं आता था उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया की ‘अरे वो अनुसूचित जाति का है ना’। बच्चा होने के कारण मैंने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब मैं बड़ा हुआ और कॉलेज पहुंचकर मुझे मौका मिला दुनिया देखने समझने का, तब मुझे अहसास हुआ कि उस बात का क्या मतलब था। तब मैंने जाना कि दरअसल ये हज़ारों साल पुरानी एक सोच है, जिसे समाज ने आत्मसात कर लिया है और जिसे हम आज अस्पृश्यता कहते हैं। इसके अलावा तब मैंने एक और चीज़ देखी थी और वो थी कि वो चपरासी भले ही हमारे साथ काफी घुलमिल कर रहता था, बावजूद इसके वो कभी भी हमारे खाने या बर्तनों को छूता नहीं था और अपने बर्तन खुद साफ करता था।

वक्त के साथ हम बड़े होते गये और हमारे दोस्त यार भी बढ़ने लगे। इन दोस्तों में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लड़के और लड़कियाँ सब थे। इस वजह से हमारे घर में विभिन्न जाति और धर्म के लोगों का आना जाना रहा। बावजूद इसके मेरी मां ने कभी ये जानने की कोशिश नहीं की कि कौन किस धर्म या जाति का है। मेरे घर में हर कोई आराम से आ जा सकता था। इन लोगों में मेरे दो दोस्त भी शामिल थे। इनमें से एक मुसलमान और दूसरा अनुसूचित जाति का था। यहाँ तक की जब मेरी माँ को ये बात पता चली तो उन्होंने कभी कोई हो-हल्ला नहीं किया। उन्होंने उनको वैसे ही स्वीकार किया जैसे वो थे। तो ये कहानी हमें क्या बताती है? इसका मतलब है कि घरों में छुआछूत ज्यादा पुरानी बात नहीं रह गई थी और जो लोग इसका विरोध करते थे, उन्होंने भी बिना किसी परेशानी के इस बात को मान लिया था। हालांकि वो इस बात को लेकर सतर्क रहते थे कि वो अपनी रेखा का उल्लंघन ना करें, वक्त के साथ समाज में भी बदलाव आया और वहीं लोग उन कड़े सामाजिक नियमों का त्याग करते गये।

मेरी मां में भी बदलाव आया, वो सीधी साधी एक धार्मिक इंसान थी जैसे मेरे पिता। मेरे पिता ग्रेजुएट थे और सरकारी नौकरी करते थे और उनका स्वभाव काफी उदार था। उन्होंने कभी भी मेरी मां के धार्मिक क्रिया कलापों का विरोध नहीं किया। बावजूद इसके दोनों लोग शायद ही कभी मेरे दोस्तों की जाति को लेकर परेशान हुए हों। वहीं दूसरी ओर वो दोनों सुबह जल्दी उठकर नहाते थे, रोज़ पूजा करते और उसके बाद ही खाना खाते थे। धार्मिक महत्व के दिनों में दोनों लोग पूरे दिन उपवास भी रखते थे। क्या ये हम सब के लिए सबक है? जी हाँ बिल्कुल। मेरे माता-पिता हिन्दू हैं और धार्मिक भी हैं, लेकिन वो हठधर्मी नहीं हैं। मेरे भीतर छिपे कई आदर्श उन्हीं की वजह से हैं। मैं कई बार इस बात को लेकर डर जाता हूँ कि अगर उन्होंने कभी मेरे से सामाजिक प्रथाओं को कड़ाई से पालन करने के लिए कहा होता तो क्या होता?

पिछले महीने मैं काफी परेशान रहा जब मैंने देखा कि गौ रक्षक दल के सदस्य दलितों की पिटाई कर रहे थे, तब मुझे अपने बचपन के अनुभव याद आ रहे थे। मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूँ कि गौ रक्षक कार्यकर्ताओं का अपराध हमारी मानसिकता का पूर्वाग्रह है। जिस तरह का व्यवहार किया गया वो इंसानियत के खिलाफ है। मैं इस बात को नहीं मानता हूँ कि ये काम उन्होंने गायों को बचाने के लिए किया है। अगर वो गायों के प्रति इतने अधिक चितिंत थे तो इससे पहले उनको सड़कों के किनारे और राजमार्गों के आसपास रहने वाली गायों को बचाने के बारे में सोचना चाहिए था, जो आये दिन मरती हैं। अगर उनको लड़ना ही है तो वो सरकार के खिलाफ़ लड़ें और ताकि उन गायों को बेहतर जिंदगी और इलाज मिल सके। इन लोगों ने मोदी सरकार से मांग की है कि देश भर में गोमांस पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, लेकिन उनको इस बात से निराशा लगेगी कि मोदी सरकार के कार्यकाल में गोमांस के निर्यात के क्षेत्र में भारत दुनिया में नंबर एक पर पहुंच गया है, लेकिन कभी भी गाय को बचाने वालों ने इसकी शिकायत तक नहीं की।

चलिए हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि हज़ारों साल से हिन्दू समाज में छुआछूत एक गहरी वास्तविकता रही है। समाज के अंदर दलितों के साथ हमारा व्यवहार अमर्यादित है। इन लोगों के पास कभी भी अधिकार नहीं रहे उनको सदैव सभी जातियों से बाहर रखा गया। इनके साथ कभी भी समानता का व्यवहार नहीं किया गया। ये कुछ वैसा ही था, जैसे पश्चिमी देशों में कुछ समय पहले तक दास प्रथा थी। छुआछूत मानने वाले और उसका सामना करने वाले दोनों का ये मानना ग़लत है कि पिछले जीवन में उन्होंने जो ग़लत काम किये थे, उसका फल इस जन्म में मिल रहा है और अगर वो इस जन्म में सही कर्म करेंगे तो अगले जन्म में उनका भाग्य बदल सकता है। हालांकि वो ब्राह्मण भी हो सकते हैं, लेकिन इस जीवन में उनके पास नरक की तरह रहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

हमारे संविधान में छुआछूत और असमानता को खत्म कर दिया गया। कानूनी तौर पर सब बराबर हैं और कानून सबके साथ समानता का व्यवहार करेगा। दलितों को भी वो अधिकार मिले हैं, जो अधिकार ऊंची जाति वालों के पास हैं। बावजूद इसके समाज जातिगत रेखा में बंटा हुआ है। हज़ारों साल पुरानी सोच हमारे अंदर एक रात में नहीं बदल सकती, लेकिन संवैधानिक समानता ने दलितों के दिमाग में क्रांति पैदा कर दी। वो अपने सामाजिक अधिकारों को लेकर पहले से ज्यादा मुखर तरीके से मांग करने लगे हैं और अपने उस सम्मान के लिए लड़ने लगे जो उनको संविधान से हासिल हुए हैं। जिसे समाज के उच्च वर्ग ने पसंद नहीं किया और उसका असर ये हुआ कि दोनों के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा हो गई। इस तरह की घटनाएँ कोशिश है उन कट्टरपंथियों की, दलितों को सबक सिखाने के लिए और उनको ये याद दिलाने के लिए कि जाति वर्गीकरण में उनकी स्थिति क्या रही है। ये हमारे समाज का वो दुखद पक्ष है, जहाँ पर इनको कुचलने की कोशिश की जाती है। ये कोशिश है इन लोगों से बदला लेने की क्योंकि लोकतांत्रिक अधिकार मिलने के बाद वो पहले से ज्यादा मुखर हुए हैं।

मेरे माता-पिता हज़ारों सालों पुरानी धार्मिक प्रथाओं के मोहरा बने, लेकिन जैसे ही उनका सच्चाई से सामना हुआ उन्होंने अपने में बदलाव लाना शुरू किया और इंसानियत के तौर पर अपने में बदलाव भी लाये। उन्होंने कभी भी आधुनिकता का विरोध नहीं किया बल्कि उन्होंने दोनों हाथों से इसे स्वीकार किया। लेकिन हाल ही में जिस तरह दलितों के साथ व्यवहार किया गया वो ग़लत है। ये वो लोग हैं जो बदलाव नहीं चाहते और आधुनिकता के विरोधी है। ऐसे में ज़रूरी है कि ऐसे लोगों के खिलाफ लड़ना चाहिए और उनको हराना चाहिए। वहीं दलितों में अब पहले के मुकाबले ज्यादा विश्वास पैदा हो गया है। ये उम्मीद की एक किरण है। वो पहले के मुकाबले ज्यादा प्रबुद्ध और इस सामाजिक बुराई के खिलाफ एकजुट हो गये हैं। यही वजह है कि अब वो इतिहास और समाज में अपनी सही जगह पाने के लिए अपनी लड़ाई लड़ने में शर्म महसूस नहीं करते। 

-लेखक आशुतोष आम आदमी पार्टी के नेता हैं।

(अंग्रेज़ी से इसका अनुवाद गीता बिष्ट ने किया है)