छोटे से कमरे में की मशरूम की खेती, 50 पैकेट मशरूम में कमाया 15 हजार का मुनाफा

पचास पैकेट मशरूम में पंद्रह हजार का मुनाफा...

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मोहित शर्मा सम्भल (मुरादाबाद) के मुहल्ला कोट पूर्वी में रहते हैं। अपने मकान के एक रूम में वह 'ऑयस्‍टर' मशरूम की खेती कर दिल्ली, चंडीगढ़ और बेंगलूरू तक सप्लाई कर रहे हैं। उनको दवा कंपनियों से भी मशरूम की सप्लाई के लगातार अॉर्डर आ रहे हैं। सबसे अच्छी बात है, कि मोहित की देखादेखी अब उस इलाके के दूसरे लोग भी उसी विधि से मामूली-सी जगह में 'ऑयस्‍टर' मशरूम की फसल से मुनाफा लेने में जुटे हैं।

मशरूम की खेती (सांकेतिक तस्वीर), फोटो साभार: Shutterstock
मशरूम की खेती (सांकेतिक तस्वीर), फोटो साभार: Shutterstock
मुरादाबाद के मोहित शर्मा ने पहली बार अपने घर के एक छोटे-से कमरे में मशरूम की फसल उगाई। मात्र 25-30 रुपए की लागत से मोहित को मिला प्रति पैकेट 300 रुपए का मुनाफा और एक कमरे के स्पेस में मिल गया पंद्रह हजार का मुनाफा।

मशरूम की खेती तो तमाम लोग कर रहे हैं, लेकिन मोहित शर्मा की खेती की दास्तान ही कुछ और है। वह अपने घर के रूम में ही मशरूम की खेती कर दिल्ली से बेंगलूरू तक फसल की सप्लाई कर रहे हैं। वह बताते हैं कि अपने घर के रूम में विशेष किस्म का 'ऑयस्‍टर' मशरूम की खेती करने के लिए वह एक टैंक में लगभग सौ लीटर पानी भर देते हैं। फिर उसमें दस किलोग्राम भूसा भिगोकर घोल देते हैं। उसके बाद पांच ग्राम वेबस्टीन पाउडर और 125 एमएल फार्मेटिन भी टैंक में डाल देते हैं। यह सब टैंक के पानी में मिलाने के बाद वह पूरे एक दिन तक यानी चौबीस घंटे उसे फर्श पर सुखाते हैं। सूखने के बाद इसमें सात सौ ग्राम बीज मिलाकर अलग-अलग लगभग पांच पैकेट तैयार कर लेते हैं और उन सभी पैकेटों को अपने रूम में ही लटका देते हैं। यह पैकेटों में झूलती फसल एक महीने में मशरूम के रूप में तैयार हो जाती है।

मोहित शर्मा सम्भल (मुरादाबाद) के मुहल्ला कोट पूर्वी में रहते हैं। अपने मकान के एक रूम में वह 'ऑयस्‍टर' मशरूम की खेती कर दिल्ली, चंडीगढ़ और बेंगलूरू तक सप्लाई कर रहे हैं। उनको दवा कंपनियों से भी मशरूम की सप्लाई के लगातार अॉर्डर आ रहे हैं। उनकी देखादेखी कई और लोग क्षेत्र में उसी विधि से मामूली सी जगह में 'ऑयस्‍टर' मशरूम की फसल से मुनाफा लेने में जुटे हैं। मोहित बताते हैं कि वह पिछले सात-आठ महीने से ही अभी इस काम में लगे हैं, लेकिन अपेक्षा से अधिक आय ने उन्हें अब इसे बड़े स्तर पर आजमाने के लिए प्रोत्साहित किया है। नई विधि से 'ऑयस्‍टर' मशरूम की खेती शुरू करने से पहले उन्होंने एक साल पहले हिमांचल प्रदेश के सोलन जिला स्थित खुम्भ निदेशालय में मशरूम की खेती के लिए करीब डेढ़ सप्ताह का प्रशिक्षण लिया था। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने यह गंभीरता से जानने की कोशिश की थी कि खेती किस तरह से कम से कम स्थान का उपयोग कर की जा सकती है। दरअसल, उनका विचार था कि बड़े स्पेस में खेती कहीं सफल हो, न हो। कम जगह में खेती करते हैं, मुनाफा नहीं भी होता है तो बाद में कोई पश्चाताप नहीं होगा। उनका ऐसा सोचना ही उनका खास आइडिया बन गया। वह अपने घर के एक रूम में ही 'ऑयस्‍टर' मशरूम की खेती में जुट गए। पहली बार उन्होंने घर के टैंक का इस्तेमाल कर अपनी विधि से लगभग पचास पॉलीथिन में 'ऑयस्‍टर' मशरूम की फसल लगाई और उन पचासो पैकेट को छत से लटका दिया।

वह बताते हैं कि 'ऑयस्‍टर' मशरूम की फसल तैयार करने के लिए उन्होंने कमरे का तापमान दस से पचीस डिग्री सेल्सियस के बीच रखा। फसल तैयार होने के दौरान कमरे में नमी का स्तर सत्तर से नब्बे के बीच रहा। उनकी पहली फसल एक महीने में तैयार हो गई। इसके बाद बाजार की टोह में लग गए। एक खास काम और उन्होंने ये किया कि अपना 'ऑयस्‍टर' मशरूम दवा कंपनियों को उपलब्ध कराने का निर्णय लिया। संपर्कों के दौरान उन्हें चंडीगढ़, दिल्ली और बेंगलूरू की दवा कंपनियों में अपनी फसल बेचने के आर्डर मिले। तब तक क्षेत्र में भी उनकी 'ऑयस्‍टर' मशरूम की खेती की चर्चा फैल गई। उनके पास अब खुद चलकर लोग उनकी खेती की विधि जानने आने लगे। वह बताते हैं कि उन्हें अपनी 'ऑयस्‍टर' मशरूम प्रति पैकेट पर तीन सौ रूपए तक का मुनाफा हो जा रहा है, जबकि गुणाभाग में इन पर लागत मात्र तीस रुपए तक आ रही है।

अपनी फसल आम बाजार में बेचने की बजाय उन्होंने दवा कंपनियों को बेचना इसलिए मुफीद समझा कि वह यह खेती शुरू करने से पहले 'ऑयस्‍टर' मशरूम के औषधीय गुणों से वाकिफ हो चुके थे। 'ऑयस्‍टर' मशरूम की उपयोगिता भोजन और औषधि दोनों ही रूपों में है। ये पोषण का भरपूर स्रोत है और स्‍वास्‍थ्‍य खाद्यों का एक बड़ा हिस्‍सा। इसमें वसा की मात्रा बिल्‍कुल कम होती है, विशेषकर प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की तुलना में, और इस वसायुक्‍त भाग में मुख्‍यतया लिनोलिक अम्‍ल जैसे असंतप्तिकृत वसायुक्‍त अम्‍ल होते हैं। ये स्‍वस्‍थ हृदय के लिए आदर्श भोजन होता है। 

पहले, 'ऑयस्‍टर' मशरूम का सेवन विश्‍व के विशिष्‍ट प्रदेशों और क्षेत्रों त‍क ही सीमित था पर वैश्‍वीकरण के कारण विभिन्‍न संस्‍कृतियों के बीच संप्रेषण और बढ़ते हुए उपभोक्‍तावाद ने सभी क्षेत्रों में मशरूमों की पहुंच को सुनिश्चित किया है। 'ऑयस्‍टर' मशरूम का वैज्ञानिक नाम है प्‍लयूरोटस। देश के कई भागों में यह ढींगरी के नाम से जाना जाता है। इसकी कई प्रजातियां हैं- प्‍लयूरोटस ऑस्‍टरीयटस, पी सजोर-काजू, पी. फ्लोरिडा, पी. सैपीडस, पी. फ्लैबेलैटस, पी एरीनजी तथा कई अन्‍य भोज्‍य प्रजातियां।

उधरी दूसरी तरफ रोहित शर्मा का एक्सपेरिमेंट इस मामले में औरों से थोड़ा अलहदा है, कि इस विधि से वह छह महीने तक लगातार मशरूम का उत्पाद प्राप्त करते रहते हैं। 'ऑयस्‍टर' मशरूम का बीज वह दिल्ली से ले आते हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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