सौ करोड़ी क्लब से शॉर्ट फिल्मों की मुठभेड़

शॉर्ट फिल्मों की दुनिया...

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बॉक्स ऑफिस पर जब सौ करोड़ के क्लब की बात होती है, महंगे बजट की फिल्मों की अंधाधुंध कमाई का डंका बजता है, दबे पांव बाजार की दौड़ में आज शामिल हो रहा छोटे बजट की शार्ट फिल्मों का जमाना युवा निर्माताओं को तेजी से अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। माना जा रहा है कि भविष्य शॉर्ट फिल्मों का है, वैसे भी आज के व्यस्त समय में तीन घंटे सिनेमा हॉल में गुजारना किसी गंवारा नहीं।

वह जमाना गया, जब बॉलीवुड की मसाला फिल्में और समानांतर फिल्में दो अलग दुनिया की हुआ करती थीं। दोनों आपस में घुलमिल गई हैं और दर्शक भी दोनों को देखना चाहते हैं। शॉर्ट फिल्मों ने फिल्ममेकर को आजादी दी है कि वह अपने मनमुताबिक फिल्म बनाए। 

फिल्म की भाषा, कला की नैतिकता, नाटकीय शुद्धता, मनोरंजन की क्रूरता और व्यावसायिकता के प्रश्न मायावी इंटस्ट्री ही ने देश-दुनिया के एक बड़े बौद्धिक वर्ग को अभिव्यक्त करने के साथ ही सामयिक शार्ट फिल्म उद्योग की हकीकतों से भी अब वाकिफ कराने लगे हैं। बॉलीवुड अभिनेत्री जैकलिन फर्नाडीज तो कहती हैं कि 'मनोरंजन एक क्रूर और अप्रत्याशित व्यवसाय है, जहां चीजें हर शुक्रवार बदल जाती हैं। यहां सफलता या विफलता का कोई पुख्ता सूत्र नहीं है।' जहां तक भाषा का प्रश्न है, इतना जान लेना काफी होगा कि अखबारों, विज्ञापनों और फिल्मों के नाम में अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू की खिचड़ी भाषा ‘हिन्दुस्तानी’ भले कही जाए, मनोरंजन का मिजाज पूरी तरह अंग्रेजियत सराबोर हो चुका है।

ऐसे में महंगे बजट की फिल्मों के नए गलाकाटू बाजार के बीच लगातार तेज होती जा रही शार्ट फिल्मों की दस्तक हमे कला और व्यवसाय जैसे गैरमनोरंजनीय सवालों से भी रूबरू करा रही है। शॉर्ट फिल्मों की एक खास बात है इनका कम बजट। 15-20 मिनट की फिल्म बनाकर अगर मैसेज पहुंच जा रहा है तो तीन घंटे की फिल्म की क्या जरूरत है। आज शॉर्ट फिल्म और वेब सीरीज का ट्रेंड बढ़ा है। अनुराग कश्यप, सुरजीत सरकार जैसे बड़े फिल्ममेकर शॉर्ट फिल्में बनाकर लोगों के हमेशा करीब रहना चाह रहे हैं। कम लागत में ज्यादा मुनाफा वाली थ्योरी ने भारत में शॉर्ट फिल्मों के बाजार को बढ़ाया है।

मसलन, पंद्रह मिनट की एक शॉर्ट फिल्म है- 'गधो', एक बूढ़े आदमी और उसके पालतू गधे के बीच प्यार की कहानी, जिसमें जानवर और इंसान के बीच इमोशनल बॉन्ड को बेहद खूबसूरती से दिखाया गया है। जितनी बड़े बजट की फिल्मों की प्रशंसा होती है, उससे कहीं ज्यादा इस मामूली बजट की शॉर्ट फिल्म को केरल में इंटरनेशनल डॉक्युमेंट्री ऐंड विडियो फेस्टिवल अलावा देश के बाहर 29वें साओ पाउलो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, 35वें बुसान शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल, एथेंस इंटरनैशनल फिल्म ऐंड विडियो फेस्टिवल और मिनीकीनो में आयोजित बाली इंटरनेशनल फेस्टिवल में जमकर तारीफ मिली है। आने वाले वक्त में बाजार में ऐसी फिल्मों की प्रतिस्पर्धा और बढ़ सकती है।

जहां तक कलात्मक शुद्धता की बात है, शॉर्ट फिल्मे किसी हीरो की नहीं, मामूली इंसानी रिश्तों की कहानियां कह रही हैं तो यहां उसकी जेब की हालत का तकाजा भी सामने है। शॉर्ट फिल्मों की खासियत है कि ये बॉलिवुड की चमक के बजाए नए ट्रेंड को भांपने को तरजीह दे रही हैं। इन फिल्मों में प्रेम करने के नए तरीके जैसे ब्लाइंड डेट, लीक से हटकर करियर चुनने की चाहत या हीनभावना से जूझते रहने जैसे कई पहलुओं को दिखाने की कोशिशें हो रही हैं। आज के युवा इनसे एक जुड़ाव महसूस कर रहे हैं। फिल्म 'कुछ भीगे अल्फाज़' के निर्देशक ओनीर कहते हैं, 'वह जमाना गया, जब बॉलीवुड की मसाला फिल्में और समानांतर फिल्में दो अलग दुनिया की हुआ करती थीं। दोनों आपस में घुलमिल गई हैं और दर्शक भी दोनों को देखना चाहते हैं। शॉर्ट फिल्मों ने फिल्ममेकर को आजादी दी है कि वह अपने मनमुताबिक फिल्म बनाए। दर्शकों को आजादी है कि अगर उन्हें 15 मिनट की फिल्म पसंद नहीं आई तो वे किसी और फिल्म पर क्लिक कर सकते हैं। इंटरनेट ने दोनों का सशक्त बनाया है। अभिनेत्री गीतांजलि थापा का कहना है कि 'सब्जेक्ट अच्छा हो तभी लोग फिल्म देखने आएंगे, चाहे फीचर फिल्म हो या शॉर्ट फिल्म।'

कभी सिर्फ़ फ़िल्म फ़ेस्टिवल या किसी विशेष मौक़ों पर दिखाई जाने वाली शॉर्ट फ़िल्मों का बाज़ार धीरे-धीरे बढ़ रहा है। पहले जहां सिर्फ़ सिनेमा और मीडिया के छात्र प्रयोग के तौर पर शॉर्ट फिल्में बनाते थे, वहीं अब बड़े-बड़े फ़िल्ममेकर भी इस विधा में हाथ आज़मा रहे हैं। दरअसल डिजिटलीकरण के इस दौर में शॉर्ट फ़िल्में बनाना अब काफ़ी आसान और कम ख़र्चीला हो गया है और एक शॉर्ट फ़िल्म बनाने के लिए सिर्फ़ एक अच्छी स्क्रिप्ट और एक मोबाइल कैमरा चाहिए। इसलिए आजकल शॉर्ट फ़िल्मों के माध्यम से छोटे फ़िल्मकार लोकप्रियता तो पा ही रहे हैं साथ ही साथ पैसा भी कमा रहे हैं। अब तक ‘मखमल’ समेत चार शॉर्ट फ़िल्में बना चुके अब्बास सैय्यद का कहना है कि 'शॉर्ट फ़िल्म देखने वाले लोग बहुत हैं लेकिन उनसे आने वाला पैसा बेहद कम है। ऐसे में, या तो किसी कंपनी से फ़ंड लेकर फ़िल्म बनाई जाए या फिर डेली मोशन, वीडियो ऑन डिमांड जैसी वेबसाइट्स पर अपनी फ़िल्म अपलोड कर पैसा कमाया जा सकता है। जहां तक कमाई का सवाल है, ऐसा भी नहीं है कि पहले दिन से ही घर चलाने लायक आय होने लगेगी। इसमें वक़्त लगता है।

शॉर्ट फ़िल्म मेकर चैतन्य तमाहाने का कहना है कि 'उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक शॉर्ट फ़िल्म से की थी और शुरुआत में ये 'जुगाड़' यानी दोस्तों या परिवार से पैसा लेकर बनती हैं पर बाद में फ़ायदा भी होता है। मीडिया के चलते शॉर्ट फ़िल्मों का भविष्य उज्ज्वल है और आई ट्यून्स, वीडियो आन डिमांड, शॉर्ट फ़िल्म्स क्लब, क्राउड फ़ंडिंग (लोगों से पैसा लेना), शॉर्ट फ़िल्म मार्केट और पिचिंग फ़ोरम्स के माध्यमों से कोई भी शॉर्ट फ़िल्मों से पैसा कमा सकता है, बशर्ते फ़िल्म अच्छी हो।' कई बार चैनल या सिनेमाघर भी शॉर्ट फ़िल्मों को ख़रीद लेते हैं।

यूट्यूब (भारत) के कंटेंट ऑपरेशन्स के अध्यक्ष सत्या राघवन के मुताबिक यूट्यूब पर फ़िल्म अपलोड करते ही पैसा आने लगता है। इसके लिए बस अपना एक यूट्यूब चैनल बना कर यूट्यूब पर पहले से मौजूद ‘मोनेटाइज़’ का ऑप्शन सेलेक्ट करना होता है, इसके बाद फ़िल्म में विज्ञापन आने शुरू हो जाते हैं। ज़ाहिर सी बात है कि जितने लोग यहां फ़िल्म से पहले दिखाए जाने वाले विज्ञापन देखते हैं, एक पूर्वनिश्चित दर से प्रति व्यू पैसा मिलने लगता है। विज्ञापन से होने वाली इस कमाई का 55 प्रतिशत वीडियो अपलोड करने वाले को और 45 प्रतिशत यूट्यूब को जाता है। आंकड़ों के मुताबिक यूट्यूब की ऑडियन्स बहुत बड़ी है और कई फ़िल्मों को 20 लाख़ से ज्यादा दर्शक मिल जाते हैं और शायद इसलिए, एआईबी, वायरल फ़ीवर और आजकल तो यशराज फ़िल्मस भी अपनी वेब सीरीज़ और शॉर्ट फ़िल्मों पर ज़्यादा ध्यान दे रहा है।

किसी को फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी का शौक हो, बेहतर तरीके से कैमरा संभाल लेता हो, साथ में क्रिएटिव सोच का भी हो तो शॉर्ट फिल्मों के निर्माण में अपना करियर बना सकता है। वीडियोग्राफी एक बेहतर रोजगार साबित हो सकती है। हां, इस फील्ड में करियर बनाने के लिए पहले खुद की योग्यता का पूरी तरह आंकलन जरूर कर लेना चाहिए क्योंकि क्रेजी होना ही काफी नहीं, इस बिजनेस में काबिलियत के साथ पर्याप्त धैर्य भी जरूरी है यानी लंबी रेस का घोड़ा बनना पड़ेगा।

जहाँ तक कमाई का सवाल है, उस स्तर तक पहुंचने के लिए अच्छी स्क्रिप्ट ही नहीं, अच्छा कैमरा पर्सन, अच्छा एडिटर, अच्छा निर्देशक भी चाहिए। यह सब हायर करने से भी मिल जायेगा लेकिन एक फिल्मकार को खुद भी यह योग्यताएं रखनी पड़ती है। दिल्ली यूनिवर्सिटी की बीकॉम की छात्रा प्रियंका बताती हैं कि उन्होंने अपनी पहली शॉर्ट फिल्म कॉलेज के पहले साल मोबाइल से शूट की थी। धीरे-धीरे इंट्रेस्ट बढ़ा तो उन्होंने खुद का कैमरा ले लिया। फिर उन्होंने अपने दोस्तों की मदद से ट्रांसजेन्डर पर एक शॉर्ट फिल्म बनाई, यूट्यूब पर अपलोड कर दिया और दर्शकों ने तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए। उनका मानना है कि बाजार में शॉर्ट फिल्में बनाने वाले निर्देशकों के लिए कई तरह के खुले विकल्प हैं।

फिल्म समीक्षकों का ऐसा भी मानना है कि हमारे देश में शॉर्ट फिल्म बनाना आमतौर पर आर्थिक रूप से फायदे का सौदा साबित नहीं हो रहा है। न तो इन फिल्मों की बाजार में जगह है, न ही इनके लिए बढ़िया मंच। डॉक्यूमेंटरी और शॉर्ट फिल्म बनाने वाले कलाकारों को फिल्म बेचने के लिए विदेशी डिस्ट्रिब्यूटरों का सहारा लेना पड़ रहा है। फिल्म 'प्रभात फेरी' के समर्थ दीक्षित बताते हैं कि जब पहली बार उनके मन में डॉक्यूमेंट्री बनाने का आइडिया आया तो उन्होंने ये नहीं सोचा कि इसकी बाजार में मांग है या नहीं, बिकेगी या नहीं। कलाकार के लिए आइडिया खास होता है, जबकि एक फिल्ममेकर के लिए यह सबसे गंभीर मसला होना चाहिए। पिछले पांच सालों में फिल्म बनाना बहुत आसान हो गया है।

अब फिल्म बनाना बड़ा मुद्दा नहीं, सबसे बड़ी मुश्किल है इस तरह की फिल्मों को बेचना। इस बारे में समय से सोच लेना बहुत जरूरी है कि इसे बाजार में कैसे देखा जाएगा, यह शॉर्ट फिलम बिकेगी या नहीं। वैसे भी मुंबई में रह कर फिल्म बनाने के लिए बहुत पैसे की जरूरत रहती है। मुंबई फिल्म उद्योग को लेकर मन में तमाम छवियां बनती-बिगड़ती रहती हैं। धारणा है कि यह इच्छाओं और सपनों को पूरा करने वाला शहर है। ये शहर अपनी चमक-दमक के साथ ऐसे बहुत से बिंब रचता है जिसमे अकूत धन-दौलत और संपन्नता झलकती है। फिल्म उद्योग में संघर्ष कर रहे लोगो से पता चलता है कि यह शहर सभी को एक बार मौका जरूर देता है। यहां हर रोजगार एक जुए की तरह है। यहां किस्मत संवरने की उम्मीदें संघर्ष के लिए प्रेरित करती हैं। यहां फर्श से अर्श तक पहुंचने की ऐसी तमाम दास्तानें हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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