"पापा का आख़िरी ख़त" (कहानी)

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नई कलम के लिए इटावा से 'पूजा व्रत गुप्ता' की कहानी। पूजा स्वतंत्र पत्रकार और कहानीकार हैं, जिनकी कहानियां एफएम की दुनिया में लगातार धूम मचा रही हैं।

"प्यारे पापा, आपके लिए..." किताब के पहले पन्ने पर लिखे इन चार शब्दों को पढ़कर साक्षी की आँखों में सैलाब उमड़ पड़ा। बहुत देर तक कुछ सोचते हुए वो इन शब्दों को अपनी हथेली से सहलाती रही और फिर हिम्मत करके उसने घर फोन लगाया। हैलो, फ़ोन के उस पार से आई आवाज साक्षी की माँ थी। पूरे दो महीने बाद सुनी थी उसने माँ की आवाज। माँ मेरी बुक २३ तारीख को लांच हो रही है, कहते हुए साक्षी का गला भर आया, वो इससे आगे कुछ और कहती , माँ ने ठीक है कहकर फ़ोन रख दिया। उनके इस तरह फ़ोन रखने से साक्षी को एक बार फिर बहुत बुरा लगा था। समझती थी वो कि माँ उससे अब तक नाराज हैं और उनकी नाराजगी इस बात को लेकर थी कि अपने पापा के आखिरी वक़्त में, जब वो पल-पल अपनी बेटी को याद कर रहे थे तब साक्षी अपने परिवार और किताब लिखने में व्यस्त रही। वो पापा को देखने तक नहीं आई। और जब आई तब तक पापा....

अपनी इस गलती का अपराधबोध साक्षी को हर रोज होता रहा, पर क्या करती वो ? जल्दी-जल्दी किताब पूरी करने का दबाब जो था उसके ऊपर ... पब्लिशर को किताब अगले महीने ही चाहिए थी और साक्षी को भी लगता था कि वो जितनी जल्दी किताब पूरी कर लेगी , उतनी जल्दी पापा का सपना पूरा हो जायेगा। पापा ही तो चाहते थे कि उसकी पहली किताब का विमोचन वो अपने हाथों से करें।

इसलिए साक्षी ने दिन- रात एक कर दिया था लेकिन जिस दिन वो किताब के आखिरी पन्ने लिख रही थी उसी दिन पापा ने आखिरी साँसे लीं। पापा के गुजरने के ठीक 2 महीने बाद साक्षी की पहली किताब पब्लिश होकर आ चुकी थी और 2 दिन बाद दिल्ली बुक फेयर में उसकी लांचिंग भी थी , लेकिन वो खुश नहीं थी। माँ की नाराजगी उसे हमेशा चुभती। क्या- क्या नहीं सोचा था उसने। सोचती थी पापा और वो स्टेज पर लाल फीते में लिपटी उसकी किताब खोल रहे होंगे और माँ और नवीन सामने बैठकर जोर-जोर से तालियाँ बजाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और ना अब होने वाला था। जानती थी , परसों उस भीड़ में वो अकेली ही होगी, शायद नवीन को भी उस दिन ऑफिस से वक़्त न मिले। अभी वो इन सब सवालों और जबाबो में उलझी ही थी उसका मोबाइल बजा।

साक्षी ने फ़ोन उठाया तो सामने से एक हडबडाई सी आवाज आई, अ अ अ क्या मैं लेखिका साक्षी बंसल जी से बात कर रहा हूँ ? जी... आप कौन? उसने पूछा। साक्षी जी हम, हम रायनगर से आशीष भदौरिया बोल रहे हैं , कस्बा टाइम्स के रिपोर्टर। आपका साक्षात्कार चाहते थे। वो आपकी किताब आने वाली है ना, बस उसी के लिए। रिपोर्टर बोला तो साक्षी के चेहरे के हाव–भाव बदल गए। कैसे भूल सकती थी वो इस अखबार को और कैसे भूल सकती थी वो रायनगर को !! रायनगर...उसका अपना कस्बा रायनगर...और वहाँ का लोकल अखबार “ कस्बा टाइम्स “। इसी अखबार में तो प्रकाशित हुयी थी साक्षी की पहली कविता।

"तो मैडम सबसे पहले तो आप ये बताइए कि ये लेखक बनने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली ?“ साक्षी ने जैसे ही रिपोर्टर से सवाल पूछने की हामी भरी तो उसने अतिउत्साहित तरीके से अपना पहला सवाल पूछा। ये सवाल साक्षी के लिए नया नहीं था। पिछले कुछ दिनों में बहुत सी पत्र-पत्रिकाओं में दिए अपने इंटरव्यू में उससे पहला सवाल अक्सर यही पूछा जाता और कईयों बार इसका जबाब देते-देते वो समझ गयी थी कि उसे इन सवालों के सधे-सधाए जबाब देने हैं। जैसे इस सवाल का कि लेखक बनने के लिए उसे कहाँ से प्रेरणा मिली? वो कहती, लिखने के लिए मैंने कोई कोर्स या डिग्री नहीं ली थी। ये प्रेरणा मुझे परिस्थियों और पुरानी यादों से मिली। जिन्हें संजोकर मैंने किताब की शक्ल देने की कोशिश की है। अपने इस सवाल पर साक्षी 32 शब्दों की ये लाइन कहकर अगले सवाल का इशारा तो कर देती लेकिन हर बार उसे परिस्थियों  के नाम पर हॉस्टल का वो कमरा याद आ जाता जहाँ बैठकर उसने पहली बार डायरी पर कुछ लिखा था। उस डायरी पर जो हॉस्टल जाते वक़्त पापा ने दी थी, डायरी में तब कुछ लैंडलाइन नम्बर लिखे थे, जरुरी दवाइयां लिखीं थीं और उसकी सहेलियों और घरवालों के जन्मदिन की तारीखे भीं। बाकी सारे पन्ने खाली थे और इन खाली पन्नों की तरह कभी-कभी साक्षी को सब कुछ खाली–खाली लगता। घर की याद आती तो हॉस्टल का कमरा उसे काटने को दौड़ता। और वो इन्तजार करती, हर शनिवार, रात के आठ बजने का, तब-जब घर से हॉस्टल के लैंडलाइन पर पापा-मम्मी का फोन आता था और वो सात बजे से ही हॉल में जाकर में बैठ जाती। कितनी बार तो उसे इस बात पर वार्डेन ने फटकारा भी था, "जब इतनी ही याद आती है घर की, तो हॉस्टल आई ही क्यों, घर पर ही रहती। वार्डन कहतीं तो साक्षी की आँखों में आँसू और घर की यादें एक साथ उतर आतीं। और फिर एक शनिवार जब वार्डेन ने उसे जल्दी आने की सजा देकर पापा-मम्मी से बात नहीं करने दी, तो उस रात उसने पहली बार हफ्ते भर की सारी बातें उस डायरी पर लिखीं थीं। भीगी हुयी आँखें, कपकपाते हाथ और सामने रखी डायरी में साक्षी ने तब पहला शब्द पापा ही लिखा था। लिखा था, पापा मुझे पता है आप और मम्मी भी मेरी तरह सुबह से इन्तजार कर रहे थे, अगर मैं हॉल में जल्दी ना जाती तो हमारी बात भी हो जाती। लेकिन ... वैसे वो वार्डेन बहुत खडूस है पापा, ना जाने क्यों मुझसे तो इतना चिढती है जैसे मैंने उसकी भैंस खोल दी हो। इतना लिखकर साक्षी ने भैंस खोल दी वाले शब्दों पर घिसकर पेन चलाया और उसे छिपाकर उसकी जगह लिखा, जैसे मैंने उसका कुछ बिगाड़ दिया हो, क्यूंकि उसे लगा कि ये भैंस खोलने की बात, उसके कस्बे वाली भाषा के साथ ही जंचती है, शहरी बोली के साथ बोलने में वो मजा कहाँ जो तब आता था जब वो मोहल्ले वाली खडूस अइया से कहती थी काये चिल्लाती हो इतना, का हमने तुमायी भैंस खोल लई हैउस रात पहली बार साक्षी ने डायरी के 2 पन्ने सिर्फ अपनी खडूस वार्डेन के ऊपर लिखे थे और इन्हीं पन्नों को लिखते हुए उसे अहसास हुआ कि वो लिखकर कितने आराम से हर बात कह सकती है। फ़ोन पर तो कभी मम्मी पापा को कह ही नहीं पायी, कि वो चुड़ैल कितनी खडूस है। चुड़ैल, हाँ... अब चुड़ैल शब्द भी तो वो किसी के सामने नहीं कह पाती थी, मतलब ठीक तरीके से अपना गुस्सा ही नहीं दिखा पाती थी। लेकिन जब से उसने डायरी में लिखना शुरू किया तब से वो दिल खोलकर उस खडूस चुड़ैल वार्डेन के बारे में, कॉलेज की बत्तमीज सिनिअर के बारे में, खिटपिट अंग्रेजी बोलती लड़कियों के बारे में, क्लास में ब्यूटी टिप्स देती मैडम के बारे में और हाँ कॉलेज की मेस के अजीबो–गरीब खाने के बारे में भर- भर के लिखती।“ बताओ मम्मी क्या कोई भिन्डी में आलू डालकर बनाता है? और लौकी में पालक ? ... यहाँ बनता है ऐसा अजीबों गरीब खाना, मुझे तो लगता है जैसे महंगी भिन्डी में सस्ता आलू मिलाकर कुछ और नहीं, उल्लू बनाया जा रहा है और लडकियां ये सब्जी दो–दो चार–चार बार खाती भी हैं, भुक्कड़ कहीं की।" शिकायत , भड़ास , दुःख , दर्द , गुस्सा , याद अब सब कुछ लिखने लगी थी साक्षी इस डायरी में। एक महीने में ही डायरी के सारे खाली पन्ने भर गए और इन पन्नों के साथ भरने लगा था साक्षी का खालीपन भी।

तो मैडम क्या आपको बचपन से ही हिंदी साहित्य में रूचि थी ? मेरा मतलब , आप किन – किन कवियों और लेखकों को पढ़ना पसंद करती हैं ? रिपोर्टर ने अपना अगला सवाल पूछा। और इस सवाल पर साक्षी सोचने लगी की क्या कहे? क्यूंकि अगर वो दिल पर हाथ रखकर जबाब देगी तो शायद रिपोर्टर महाशय सदमे में आ जायें। अब बात ही कुछ ऐसी थी। जिस लड़की ने अपनी पहली किताब में हिंदी की 11 बेहतरीन कहानियां लिखी थी। वो लड़की दरअसल हिंदी तो छोड़िये, बचपन में हिंदी वाले स्कूल तक में नहीं पढना चाहती थी। क्यूंकि उसे अपनी बम्बई वाली बुआ की बेटी की तरह अंग्रेजी वाले स्कूल में पढना था और रायनगर कसबे में तब अंग्रेजी वाला स्कूल तो छोडिये, कक्षा में भी अंग्रेजी छठवी के बाद पढाई जाती। लेकिन हिंदी इकलौती ऐसी थी जो आचार्यजी ना सिर्फ तन-मन-धन से पढ़ाते बल्कि कवियों और लेखकों का जिक्र आते ही उनकी तारीफों की झड़ी लगा देते और सबसे ज्यादा अजीब तो तब लगता जब दोहे की लाइनों को वो जोर–जोर से बार-बार दोहराते। काल करे सो आज कर, आज करै सो अब...बोलो बच्चों...काल करे सो आज कर, आज करै सो अब और तेज...काल करे सो आज कर, आज करै सो अब। इधर आचार्य जी तन्मयता से दोहे दोहरा रहे होते तो उधर साक्षी अपनी सहेलियों के साथ हिंदी की किताब में छपी कवि तुलसीदास की चुटिया वाली फ़ोटो का मज़ाक उडा रही होती। ध्यान से पढ़ती ही कहाँ थी वो हिंदी, क्यूंकि उसे तो हिंदी में बस पास कराने वाले 32 नम्बर चाहिए थे, लेकिन अंग्रेजी में अच्छे नम्बर लाने के लिए ना सिर्फ वो मेहनत करती, बल्कि बुआ की बेटी के देखादेखी टूटी–फूटी अंग्रेजी भी बोलती... SORRY, MENTION NOT, THANK YOU, WELCOME , और EXCUSE ME ...बस... अंग्रेजी के इन चार-पाँच शब्दों के हथियार से ही उसने मोहल्ले और स्कूल में अपना तगड़ा इम्प्रैशन बना लिया था। लेकिन हिंदी से दूरी बनाकर अंग्रेजी को जी–जान से चाहने वाली साक्षी को शहर वाले कॉलेज जाकर पता चला कि उसे ना तो ठीक–ठीक अंग्रेजी ही आती थी और ना हिंदी और ये ज्ञान उसे तब हुआ जब ग्रेजुएशन के सब्जेक्ट में उसे अंग्रेजी दी नहीं गयी और हिंदी वाली मैडम ने “श को स" स को श कहने पर उसकी जोरदार फटकार लगायी।

अब कॉलेज में अंग्रेजी तो पढनी नहीं थी , बस स्टाइल दिखाने भर को बोलनी थी, सो वो बोल लेती। लेकिन हिंदी अगले 3 साल पढनी भी थी और बोलनी भी इसलिए ना चाहते भी साक्षी को अपने हिंदी सुधार अभियान में जुटना पड़ा। साहित्यकारों और लेखकों को पढने वाले रिपोर्टर के सवाल पर साक्षी ने फिर एक सधा और रटा हुआ जबाब दिया था। कुछ ऐसे लेखकों और उनकी किताबों का जिक्र किया जिसे उसने बस तब से ही पढना शुरू किया था जब से उसे अपनी ही लिखी एक कविता पर उसकी हिंदी टीचर ने पूरी क्लास के सामने ना सिर्फ सराहा था बल्कि उस कविता का एक प्रिंट आउट निकालकर बुलेटिन बोर्ड पर लगाने की बात भी कही थी। उस दिन हिंदी वाली क्लास में तालियों की गडगडाहट के बीच साक्षी को पहली बार एक पहचान मिली थी। सहेलियां अब उसे लेखिका कहकर चिढाने लगी थीं और वो खुद को लेखिका समझने भी लगी थी। इसका फायदा ये हुआ कि साक्षी को बैठे बिठाये अपना गोल मिल गया। वरना उसे आजतक समझ ही नहीं आया था कि इतनी पढाई-लिखाई करके वो बनेगी क्या? हर बार तो उसका गोल बदल जाता। बचपन में जब घर–घर खेलती तो उसे मम्मी बनना था, स्कूल में डांस में इनाम जीता तो उसे हीरोइन बनना था, मोहल्ले वाली सुधा दीदी उसे ट्यूशन पढ़ाती तो उसे उनके जैसे टीचर बनना था और डॉक्टर तो बनना ही था, जब तक कि बायो के प्रेक्टिकल में उसके सामने मेढक नहीं रखा गया। लेकिन आखिरकार वो, वो बनी जो किसी ने सोचा ही था। एक सुबह अखबार पढ़ते हुए साक्षी के पापा ऐसे चहके थे मानों ना जाने उन्हें अखबार में क्या मिल गया हो , मिल तो गया था। अख़बार के एक कोने में छपी कविता में अपनी बेटी का नाम, साक्षी बंसल, लेखिका।

उस रोज अखबार पढ़कर घरवालों की ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था। मम्मी उस अखबार को पूरे मोहल्ले में ले–लेकर डोली थीं, ये कहते हुए कि उनकी बिटिया लेखिका बन गयी है और पापा उन्होंने तो उसी दिन ऐलान कर दिया था कि साक्षी की पहली किताब का विमोचन वो ही करेंगे। लेकिन उसकी किताब पूरी होने से पहले ही पापा उसे अधूरा छोड़कर चले गए और माँ थी जो अब उससे मिलना तक नहीं चाहती थी। साक्षी बार–बार अतीत की यादों में जाती और रिपोर्टर अपना अगला सवाल दागता। 

बहुत – बहुत शुक्रिया मैडम, अब अगर आप अपनी कोई एक रचना अगर बता पायें तो? रिपोर्टर का आखिरी सवाल था ये, और उसके इस सवाल के जबाब पर साक्षी ने अपनी लिखी उसी कविता की कुछ पंक्तियाँ दोहरा दीं , जो कविता उसने पापा के लिए लिखी तो थी पर उन्हें कभी सुना नहीं पायी।

शहर की चकाचोंध में खो जाने वाली, पापा की बेटी हूँ मैं...

आँखों में कई ख्वाब लिए , कस्बे से निकली

पापा की बेटी हूँ मैं ...

हर - पल यहाँ माँ की ममता को तरसती

पापा की बेटी हूँ मैं ...

आंसुओं को छुपाकर

गम में भी मुस्कुराती,

पापा की बेटी हूँ मैं ...

हर शाम अपनों की तस्वीरों में खोकर

आँसू पोछती हुयी

पापा की बेटी हूँ मैं ...

मैं तो आज ही आ जाऊं लौटकर घर अपने

पर आपके सपनों को पूरा करने की कोशिश करती , पापा... आपकी बेटी हूँ मैं ...

कविता कहते–कहते बिलख पड़ी थी साक्षी। उसने फ़ोन रख दिया था और फिर देर तक अपनी किताब को सीने से लगाये रोती रही। 

आज साक्षी की बुक लांच होने वाली थी और वो दिल्ली बुक फेयर में 234 नम्बर के सरस्वती प्रकाशन वाले स्टाल पर पहुँच चुकी थी, नवीन सुबह ऑफिस ये कहकर निकले थे कि वो टाइम से पहुच जायेंगे लेकिन अब तक नहीं आये थे, साक्षी ने कुछ देर इन्तजार किया और प्रोग्राम शुरू होने से टालती रही लेकिन फिर चेहरे पर झूठी मुस्कान लिए स्टेज की ओर बढ़ गयी। वो अभी अपनी किताब को लेकर स्टेज पर खड़ी ही हुयी थी कि नजर सामने से आती एक औरत पर पड़ी। जैस–जैसे वो औरत स्टाल के करीब आई, साक्षी चौंक गयी। माँ, उसके मुँह से निकला और वो दौड़ती हुयी स्टेज से नीचे उतर आई।

माँ तुम यहाँ, कहते हुए उसने उनके दोनों हाथ अपने हाथों में भर लिए। माँ के पीछे नवीन खड़ा था। वो कुछ पूछती उससे पहले ही माँ बोलीं, जा स्टेज पर जा। हम दोनों यहाँ बैठते हैं और ये ले बेटा ये... कहते हुए माँ ने साक्षी के हाथ में एक कागज का टुकडा थमा दिया। साक्षी उस कागज में लिखे शब्दों को पढ़ते हुए स्टेज की ओर जाने लगी।

प्यारी बेटी,

मैं बहुत खुश हूँ कि तुम अपनी किताब लिखकर मेरा सपना पूरा कर रही हो। जानती हो, पत्र - पत्रिकाओं में छपते तुम्हारे लेख और कवितायेँ पढ़कर जब क़स्बे के लोग मुझे मुबारक़ बाद देते हैं तो बेटा मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। तुम्हें देखने का बहुत मन है। मन करता है, कि अपनी किताब के कुछ पन्ने तुम मेरे सिरहाने बैठकर वैसे ही पढ़ो जैसे अपनी कवितायें पढ़ी थी तुमने। लेकिन तुम तो मुझे सरप्राइज़ देने के चक्कर में ये बताती ही नहीं कि तुम्हारी किताब किस बारे में हैं ? थोडा सा वक़्त निकालकर नवीन के साथ अचानक घर आकर एक सरप्राइज़ और दे दो ना बिटिया ? मैं ठीक नहीं हूँ। इस बीमारी ने मुझे अंदर तक तोड़ दिया है। लगता है जैसे तुम्हारी किताब पर से वो लाल रिबन हटाकर उसे खोलकर पढ़ने की मेरी ख़्वाहिश अब अधूरी ही रह जायेगी।

पर तुम चिंता मत करना मैं कहीं भी हूँगा लेकिन उस दिन तुम्हारे आस-पास ही रहूँगा जब तुम अपनी किताब से उस लाल रिबन को हटाकर लोगों को दिखा रही होगी। मैं भी वहीं कहीं बैठा कसकर तालियाँ बज रहा हूँगा।

तुम्हारा, पापा

कागज में लिखे शब्दों पढ़ते हुए साक्षी की आँखों से आंसू लुढक–लुढ़ककर गाल पर आ रहे थे। वो स्टेज पर पहुँच चुकी थी। हाथों में रिबन बंधीं अपनी किताब खोलकर उसने जैसी ही दिखाई तो सामने बैठी माँ और नवीन जोर–जोर से तालियाँ बजाने लगे। साक्षी ने एक नजर उन्हें देखा और फिर कुछ पल के लिए अपनी आँखें मूँद लीं। उसे अब इस भीड़ में पापा का होना भी जैसे महसूस हो रहा था।

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