ऑक्सफोर्ड से पीएचडी कर BHU में नया डिपार्टमेंट शुरू करने वाली प्रोफेसर की कहानी

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रामादेवी का जन्म तमिलनाडु में हुआ। उन्होंने 1994 में बरेली के इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IVRI) से मास्टर डिग्री कंप्लीट की और आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चली गईं। लेकिन भारतीय परिवार की सबसे कॉमन समस्या ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।

रामादेवी (फाइल फोटो)
रामादेवी (फाइल फोटो)
वह बताती हैं कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में काफी दोष है। जब वह यहां पढ़ती थीं तो वह कॉलेज की टॉपर थीं, लेकिन ऑक्सफोर्ड जाने के बाद उन्हें समझ में आया कि उन्होंने तो कुछ पढ़ा ही नहीं है। वहां जाकर उन्होंने फिर से मेहनत की और काफी गहराई से पढ़ाई की।

कई बार आप अपने उद्देश्य के लिए भटकते रहते हैं, लेकिन वो आपकी वहीं मिलता है जहां से आपने शुरुआत की थी। ऐसी ही कहानी है रामादेवी निम्मनपल्ली की जो कि इस वक्त बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में दो महिला डीन में से एक हैं। 2014 में रामादेवी को अमेरिका से वापस भारत आने का ऑफर मिला। वे यहां आईं और बीएचयू में वेटरनरी एंड एनिमल साइंस डिपार्टमेंट की स्थापना की। उनकी बेटी उस वक्त अमेरिका में रहकर पढ़ाई कर रही थी जिसे अपनी मां की वजह से भारत लौटना पड़ा। रामादेवी के लिए बीते 12 साल काफी उतार-चढ़ाव वाले रहे।

रामादेवी का जन्म तमिलनाडु में हुआ। उन्होंने 1994 में बरेली के इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IVRI) से मास्टर डिग्री कंप्लीट की और आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चली गईं। लेकिन भारतीय परिवार की सबसे कॉमन समस्या ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उनके परिवार वालों ने उन पर शादी करने का दबाव डाला और कहा कि शादी के बाद जो चाहें करें। सौभाग्यवश उनका विवाह एक ऐसे व्यक्ति से हुआ जो उनकी इच्छाओं का सम्मान करता था। इसके बाद वह दुनिया की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में शुमार ऑक्सफॉर्ड गईं और कुछ ही दिनों बाद उनके पति भी रिसर्च करने के उद्देश्य से उनके साथ आ गए।

रामादेवी बताती हैं, 'मैं पश्चिमी सभ्यता को लेकर काफी उत्साहित थी। मैं अमेरिका या इंग्लैंड में रहना चाहती थी क्योंकि वहां की संस्कृति मुझे काफी लुभाती थी। वहां के कपड़े, वहां का रहन-सहन और भी बहुत कुछ।' कई साल पश्चिमी देशों में गुजारने के बाद जब रामादेवी के बच्चे हुए तो उन्हें वहां रहना ठीक नहीं लगा। उनके पति एक वेटरनरी सर्जन हैं। वहीं उनकी बेटी का जन्म हुआ और उसकी शुरुआती पढ़ाई भी वहीं हुई। जब उनकी बेटी बड़ी हुई तो उन्हें लगा कि वे उसकी परवरिश कैसे करें। वे घर के भीतर तो भारतीय रहन-सहन में रहते थे, लेकिन बाहर जाने पर उन्हें पश्चिमी सभ्यता के अनुसार ढल जाना पड़ता था।

वे बताती हैं, 'मेरी बेटी वहां के दबाव में अच्छा नहीं महसूस करती थी। वहां का कल्चर कुछ ऐसा है कि अगर पांचवी या आठवीं कक्षा में पढ़ने के दौरान आपके बॉयफ्रेंड नहीं हैं तो आपको नकारा समझ लिया जाता है। हम घर में उसे भारतीय संस्कृति और सभ्यता से रूबरू करवाते थे तो बाहर उसका दिमाग वहां की सभ्यता के अनुसार विकसित होता था। इसलिए वह बहुत कन्फ्यूज हो जाती थी। मैंने उसके सामने विकल्प रखा कि अगर वो अमेरिकी कल्चर को पसंद करती है तो वैसे ही रहे नहीं तो इंडिया चली जाए।' उन्होंने कहा कि हमने अपनी जिंदगी अपने मुताबिक जी अब उसकी बारी थी और उसे ही तय करना था कि वह कैसे रहना चाहती है। 2014 में वह अपनी बेटी के साथ भारत लौट आईं।

इसी दौरान उन्हें एक दोस्त द्वारा जानकारी मिली कि बीएचयू में वेटरनरी और एनिमल साइंस डिपार्टमेंट शुरू करने के लिए एक योग्य व्यक्ति की तलाश की जा रही है। हालांकि उन्हें अब तक बीएचयू के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। रामादेवी ने बीएचयू में नया डिपार्टमेंट खोलकर उसका कार्यभार संभाल लिया। लेकिन उन्हें यूजीसी से लेकर राष्ट्रपति तक के अनुमोदन के लिए काफी भागदौड़ करनी पड़ी। वहां पर इस कोर्स के बारे में कई तरह की नकारात्मक भ्रांतियां बनाई गईं और रामादेवी पर कई तरह का दबाव डाला गया। वह फिर तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी से मिलीं और उन्हें राष्ट्रपति का अनुमोदन भी मिल गया।

अब रामादेवी अच्छे से इस कोर्स को संचालित कर रही हैं। वह कैंपस में भेंड़ और डेयरी फार्म की इनचार्ज भी हैं। यह डिपार्टमेंट फूड साइंस एंड टेक्नॉलजी बिल्डिंग में संचालित होता है। इसी साल इस कोर्स के पहले अंडरग्रैजुएट बच्चे पास आउट होंगे। टीचिंग स्टाफ और प्रोफेसर की टीम ने यहां लैब भी बना ली है। रामादेवी बताती हैं कि बीएचयू के मिर्जापुर वाले कैंपस में इस डिपार्टमेंट के लिए बिल्डिंग तैयार हो गई है जहां पर एमएससी और पीएचडी के कोर्स संचालित किए जाएंगे। रामादेवी ने माइक्रोबायोलॉजिस्ट के तौर पर ब्लूटंग कैंसर के बारे में अध्य्यन शुरू किया था, लेकिन बाद में वह मानव कैंसर के बारे में रिसर्च करने लगीं।

वह बताती हैं कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में काफी दोष है। जब वह यहां पढ़ती थीं तो वह कॉलेज की टॉपर थीं, लेकिन ऑक्सफोर्ड जाने के बाद उन्हें समझ में आया कि उन्होंने तो कुछ पढ़ा ही नहीं है। वहां जाकर उन्होंने फिर से मेहनत की और काफी गहराई से पढ़ाई की। उन्होंने कैंसर केमिस्ट्री और वेटरनरी साइंस को मिलाकर अपना रिसर्च पूरा किया। उन्होंने लगभग 40 के आसपास रिसर्च पेपर लिखे हैं जो कि कई सारे विश्वस्तरीय जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। वह अपने अनुभव को भारतीय छात्रों के बीच साझा कर रही हैं और उन्हें आगे भी पढ़ने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

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