उस्ताद विलायत खां, जिनके लिए सितार जीवन था और उनका संगीत हमारे लिए प्राणवायु

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उस्ताद विलायत खां की कला के सम्मान में राष्ट्रपति फ़खरुद्दीन अली अहमद ने उन्हें आफ़ताब-ए-सितार का सम्मान दिया था। ये सम्मान पाने वाले वे एकमात्र सितार वादक थे। 

फोटो साभार: विलायतखान.कॉम
फोटो साभार: विलायतखान.कॉम
विलायत खां साहब ने गायिका अंग की शुरुआत की, जिसमें वादन के साथ-साथ गायन भी शामिल था। इस दौरान वह सितार के तारों को पांच सुरों तक पहुंचा सकते थे जो आजतक भी लोग नहीं कर पाते हैं।

अपने वाद्य और वादन शैली के विकास के लिए वे निरन्तर प्रयोगशील रहे। एक अवसर पर उन्होंने स्वयं भी स्वीकार किया कि वर्षों के अनुभव के बावजूद अपने हर कार्यक्रम को एक चुनौती के रूप में लेते थे और मंच पर जाने से पहले दुआ मागते थे कि इस परीक्षा में भी वे सफलता पाएं।

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त उस्ताद विलायत खां के नाम से शायद ही कोई विरला अनभिज्ञ होगा। सितार की गूंज पूरी दुनिया तक ले जाने वाले उस्ताद विलायत आज सशरीर तो हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज, उनकी गायिकी, उनका वादन, उनकी शख्सियत हमेशा हमेशा के लिए हमे स्पंदित करती रहेगी। विलायत खां ने सितार वादन की अपनी अलग गायन शैली विकसित की थी, जिसमें श्रोताओं पर गायन का अहसास होता था। उनकी कला के सम्मान में राष्ट्रपति फ़खरुद्दीन अली अहमद ने उन्हें आफ़ताब-ए-सितार का सम्मान दिया था। ये सम्मान पाने वाले वे एकमात्र सितार वादक थे। उन्होंने पांच दशकों से भी अधिक समय तक अपने सितार का जादू बिखेरा।

देश से लेकर दुनिया तक

वो भारत के पहले संगीतकार थे जिन्होंने भारत की आजादी के बाद इंग्लैंड जाकर संगीत पेश किया था। 1993 में लन्दन के रॉयल फेस्टिवल हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में खां साहब ने राग हमीर के वादन के दौरान पूरी बन्दिश का गायन भी प्रस्तुत कर दिया था। विलायत खां एक साल में आठ महीने विदेश में बिताया करते थे और न्यूजर्सी उनका दूसरा घर बन चुका था। विलायत खां ने सितार वादन की अपनी अलग शैली गायकी शैली विकसित की थी जिसमें श्रोताओं पर गायन का अहसास होता था। 

उस्ताद विलायत खां की पिछली कई पुश्तें सितार से जुड़ी रहीं और उनके पिता इनायत हुसैन खां से पहले उस्ताद इमदाद हुसैन खां भी जाने-माने सितारवादक रहे थे। उस्ताद विलायत खां के दोनों बेटे, सुजात हुसैन खां और हिदायत खां भी तथा उनके भाई इमरात हुसैन खां और भतीजे रईस खां भी जाने माने सितार वादक हैं। विलायत खान के परिवार में पीढ़ियों से संगीत गूंजता रहा है इसलिए स्वाभाविक तौर पर उनके रक्त में भी रच-बस गया। घराने का नाम उनके दादा और निवास स्थान पर पड़ा। उनका परिवार इटावा का निवासी था इसलिए इस संगीत घराने को इटावा घराना कहा जाने लगा। पहले सितार वादन में केवल दाहिने हाथ से ही तार बजाए जाते थे और इसमें बाएं हाथ का उपयोग नहीं होता था। विलायत खां साहब ने गायिका अंग की शुरुआत की जिसमें वादन के साथ-साथ गायन भी शामिल था। इस दौरान वह सितार के तारों को पांच सुरों तक पहुंचा सकते थे जो आजतक भी लोग नहीं कर पाते हैं।

फोटो साभार: विलायतखान.कॉम
फोटो साभार: विलायतखान.कॉम

सितार के सौरमंडल का दिवाकर

विलायत खां का जन्म 28 अगस्त, 1928 को तत्कालीन पूर्वी बंगाल के गौरीपुर नामक स्थान पर एक संगीतकार परिवार में हुआ था। उनके पिता उस्ताद इनायत हुसैन खां अपने समय के न केवल सुरबहार और सितार के विख्यात वादक थे, बल्कि सितार वाद्य को विकसित रूप देने में भी उनका काफी योगदान था। उस्ताद विलायत खां के अनुसार सितार वाद्य प्राचीन वीणा का ही परिवर्तित रूप है। इनके दादा उस्ताद इमदाद खां अपने समय के रुद्रवीणा वादक थे। उन्हीं के मन में सबसे पहले सितार में तरब के तारों को जोड़ने का विचार आया था, किन्तु इसे पूरा किया, विलायत खां के पिता इनायत खां ने। उन्होंने संगीत के वाद्यों के निर्माता कन्हाई लाल के माध्यम से इस स्वप्न को साकार किया। सितार के ऊपरी हिस्से पर दूसरा तुम्बा लगाने का श्रेय भी इन्हें प्राप्त है।

उस्ताद विलायत खां ने अपनी शुरुआती संगीत शिक्षा पिता इनायत खां से प्राप्त की थी। जब वे मात्र 12 वर्ष की अल्पायु में ही थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। बाद में उनके चाचा वाहीद खां ने उन्हें सितार वादन की शिक्षा दी। उनके नाना बन्दे हुसेन खां और मामू जिन्दे हुसेन खां से भी उन्हें गायन की शिक्षा प्राप्त हुई। यह गायकों का घराना था। आरम्भ में विलायत खां का झुकाव गायन की ओर ही था, किन्तु उनकी खां ने उन्हें अपनी खानदानी परम्परा निभाने के लिए प्रेरित किया। गायन की ओर उनके झुकाव के कारण ही आगे चलकर उन्होंने अपने वाद्य को गायकी अंग के अनुकूल परिवर्तित करने का सफल प्रयास किया। यही नहीं, अपने मंच-प्रदर्शन के दौरान प्रायः वे गाने भी लगते थे।

बना डाली अपनी ही एक नई शैली

विलायत खां के सितार वादन में तंत्रकारी कौशल के साथ-साथ गायकी अंग की स्पष्ट झलक मिलती है। सितार को गायकी अंग से जोड़कर उन्होंने अपनी एक नई वादन शैली की नींव रखी थी। उनका यह प्रयोग वादन को गायकी अंग से जोड़ देता है। विलायत खां ने सितार के तारों में भी प्रयोग किए थे। सबसे पहले उन्होंने सितार के जोड़ी के तारों में से एक तार निकाल कर एक पंचम स्वर का तार जोड़ा। पहले उनके सितार में पांच तार हुआ करते थे। बाद में एक और तार जोड़ कर संख्या छ: हो गई थी। अपने वाद्य और वादन शैली के विकास के लिए वे निरन्तर प्रयोगशील रहे। एक अवसर पर उन्होंने स्वयं भी स्वीकार किया कि वर्षों के अनुभव के बावजूद अपने हर कार्यक्रम को एक चुनौती के रूप में लेते थे और मंच पर जाने से पहले दुआ मागते थे कि इस परीक्षा में भी वे सफलता पाएं।

फिल्मों पर भी हुईं नजरें इनायत

उस्ताद विलायत खां ने कुछ प्रसिद्ध फिल्मों में भी संगीत दिया था। 1958 में निर्मित सत्यजीत रे की बांग्ला फिल्म जलसाघर, 1969 में मर्चेन्ट आइवरी की फिल्म दि गुर' और 1976 में मधुसूदन कुमार द्वारा निर्मित हिन्दी फिल्म कादम्बरी उस्ताद विलायत खां के संगीत से सुसज्जित था। वे वास्तव में सरल, सहज और सच्चे कला साधक थे। सितार वादन व संगीत के क्षेत्र में विलायत खां के विशेष योगदान के लिए उन्हें 1964 में 'पद्मश्री' और 1968 में 'पद्मविभूषण' सम्मान दिये गए थे, किंतु उन्होंने ये कहते हुए कि भारत सरकार ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उनके योगदान का समुचित सम्मान नहीं किया, दोनों सम्मान ठुकरा दिए।

एक सितार वादक के रूप विलायत खां ने पांच दशक से भी अधिक समय तक अपना जादू बिखेरा। सितार के इस महान् वादक को फेफड़े के कैंसर ने अपनी चपेट में ले लिया था। इसके इलाज के लिए वे मुंबई के जसलोक अस्पताल में भर्ती हुए थे। यहीं पर उन्होंने अपने जीवन की अंतिम सांसें लीं। 13 मार्च, 2004 को उनका निधन हुआ। उस्ताद की अंतिम इच्छा के मुताबिक उन्हें उनके पिता की कब्र के बगल ही दफनाया गया।

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IIMC दिल्ली से पत्रकारिता की एबीसीडी सीखी। नेटवर्क-18 और इंडिया टुडे के लिए दो साल तक काम किया। घूमने का जुनून है। इस जुनून को chalatmusaafir.in पर देखा जा सकता है। देश के कोने-कोने में जाकर वहां की विरासत और खासियत को सामने लाने का सपना है।

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