बात-कुबात, चांव-चांव में कविता की 'महामारी' 

क्या यह सच है या सबसे बड़ा झूठ कि आज बाकी साहित्य की अपेक्षा कविता सबसे कम पढ़ी जा रही है?

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कविता की बातें-कुबातें हजार, कहीं गीत-अगीत की रार, कहीं कम पढ़े जाने तो कहीं कविताएं चोरी हो जाने की चांव-चांव, कहीं आलोचक के कवि होने पर तंज-रंज, और भांति-भांति के मत-अभिमत-बहुमत में कहीं अच्छी कविता बनाम खराब कविता पर सहमति-असहमतियां। ऐसे में ख्यात कवि लीलाधर जगूड़ी के शब्द नई तरह की बात कहते हैं- 'सच और झूठ की भीड़ में जाएंगे तो पता चलेगा कि सारे झूठ एक न एक दिन सच होना चाहते हैं।' और लोकप्रिय कवि नरेश सक्सेना कविता की बातों-बातों में एक बड़ी बात कह जाते हैं -' औरों की तो छोड़ो, वरिष्ठ कवियों मंगलेश डबराल, राजेश जोशी के भी सारे संकलन खंगाल डालेंगे तो दस बीस ही अच्छी कविताएं पढ़ने को मिल पाएंगी।'

लीलाधर जगूड़ी और नरेश सक्सेना
लीलाधर जगूड़ी और नरेश सक्सेना
सवाल सफलता और असफलता का भी नहीं है, लेकिन उपयोगिता और उपादेयता का तो है। पहले भी कविता बहुत ज्यादा नहीं पढ़ी जाती रही है, और आज भी कविता बहुत ज्यादा नहीं पढ़ी जा रही है तो भी यह आश्चर्य होता है कि कविता खराब ही सही, इतनी ज्यादा क्यों लिखी जा रही है? 

हिंदी कविता और साहित्य पर बाहर जो सन्नाटा दिखता है, अंदर कोलाहल बेहिसाब है। देश-देशांतर में, हिंदी-हिंदीतर क्षेत्रों में कितने राग, कितनी बेचैनियां, नाना वाद-वितंडावाद, रोध-प्रतिरोध अनवरत मुखर हैं। एक सवाल उठा, क्या यह सच है या सबसे बड़ा झूठ कि आज बाकी साहित्य की अपेक्षा कविता सबसे कम पढ़ी जा रही है? जबकि लोक जीवन में आज भी कविता तरह-तरह से व्याप्त है। बच्चे का जन्म होता है, सोहर गाई जाती है, उपन्यास और कहानी नहीं पढ़ी जाती। शादी-ब्याह के मौकों पर विवाह गीत गाए जाते हैं, उपन्यास और लेख नहीं पढ़े जाते, अंतिम संस्कार के समय भी मंत्र काव्यात्मक (श्लोक) होते हैं, कहानी-उपन्यास के संवाद नहीं। कौन कहता है कि कविता मन में, आद्योपांत जीवन में, वाचन में व्याप्त है, उसके कम पढ़े जाने की बात झूठ नहीं, महा झूठ है, जब से मुक्तछंद लोक रचा गया है, तब से कुछ लोगों का 'झूठ' एकेडमिक 'महाझूठ' हो गया है।

देश के जाने-माने कवि लीलाधर जगूड़ी कहते हैं - जो कुछ लिखा जा रहा है, क्या वो सच है, जो कुछ पढ़ा जा रहा है क्या वो सच है? सच और झूठ की भीड़ में जाएंगे तो पता चलेगा कि सारे झूठ एक न एक दिन सच होना चाहते हैं। पहले भी जिन्हें हम काल्पनिक झूठ समझते थे, वे आज के यथार्थ बने हुए हैं। उसमें सहायक तत्व स्वयं मनुष्य है और विज्ञान है। इसलिए सबसे ज्यादा पढ़ा जाना और सबसे कम पढ़ा जाना महत्वपूर्ण नहीं होता, मेरी समझ से सबसे महत्वपूर्ण है किसी का पढ़ा जाना। आज जितनी चीजें सबसे ज्यादा पढ़ी जा रही हैं, क्या वही सफल मान ली जाएं।

सवाल सफलता और असफलता का भी नहीं है, लेकिन उपयोगिता और उपादेयता का तो है। पहले भी कविता बहुत ज्यादा नहीं पढ़ी जाती रही है, और आज भी कविता बहुत ज्यादा नहीं पढ़ी जा रही है तो भी यह आश्चर्य होता है कि कविता खराब ही सही, इतनी ज्यादा क्यों लिखी जा रही है? कोई भी रचनात्मक विधा अगर अपने रचनाकारों को कम या ज्यादा मात्रा में पैदा करती है तो यह उस विधा का दोष या कमजोरी नहीं, बल्कि यह रचनाकार की अपनी सुविधा और अपने रुझान पर निर्भर करता है। स्वाद का भी कोई मानदंड नहीं बनाया जा सकता है, तो फिर साहित्य के रसास्वादन का मानदंड कैसे बनाया जाए। पढ़ने वालों की गिनती से साहित्य ऊंचा नहीं हो जाता है, न लिखने वालों की बढ़ी हुई तादाद से। हो सकता है कि कम ही बहुत ज्यादा लगने लगे। और ये भी संभव है कि बहुत ज्यादा कम दिखने लगे।

जितनी भी जटिल प्रक्रिया और व्यापक अनुभव वाली चीजें होती हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिए भी एक जटिल और व्यापक अनुभव चाहिए। जिस पाठक का जैसा स्वभाव, जैसी तितीक्षा होगी, उसे अपने स्वाद के अनुसार रचनात्मक संसार में जाने का अवसर मिलेगा। यह अलग बात है कि कितने कवि हैं, जो कविता जैसी कविता नहीं लिख रहे हैं बल्कि कुछ अलग ढंग की कविताएं लिख रहे हैं, और कितने लोग हैं, जो इस खूबी को जानते पहचानते और खोजते हैं। कविता कोई महामारी नहीं है, जिसकी चपेट में सब लोग आ जाएं।

कविता कम पढ़े जाने के प्रश्न पर लोकप्रिय कवि नरेश सक्सेना स्पष्ट कहते हैं- इस प्रश्न का जवाब हां या नहीं में नहीं दिया जा सकता क्योंकि हां और ना, दोनों जवाब सही हैं। इस पर लंबी बहस है, फिर कभी बात होगी। ध्यान देने की बातें और हैं। कविता, गीत जो है, सोचिए, छंद में कविता कौन लिखता है और कौन पढ़ता है, कौन लेखक है, कितने उसके पढ़ने वाले हैं? जब से कविता छंद से बाहर आ गई है, जितनी साहित्यिक पत्रिकाएं हैं, उनमें ज्यादातर में गीत न कहीं छपता है, न पढ़ी जाती हैं। सरिता, कादंबिनी आदि को छोड़कर, बहुत कम जगहें हैं, जहां ऐसी कविताएं छपती हैं। वैसे ऐसी पत्रिकाएं रह भी नहीं गई हैं, जो गीत-वीत छापती रही हैं। अब सोचिए कि जब गीत छपता नहीं तो पढ़ा कैसे जाए! मंच के एक कवि अपनी एक कविता चालीस साल से पढ़ रहे हैं, पढ़ते-पढ़ते बूढ़े हो चले, उस तरह के गीत अब छपते नहीं हैं।

आज लिखे जाएं तो छापे नहीं जाते। छंदमुक्त कविताएं भी पढ़ी जाती हैं। अच्छी कविताएं कम संख्या में लिखी जाती हैं, उसके पाठक वही हैं, जो लिखते हैं, जो लेखक हैं। मुख्यतः ऐसी कविताओं के नॉन राइटर पाठक पाठक कम हैं, गिने-चुने। छंदमुक्त कविताएं भी ज्यादातर ठीक नहीं होतीं, इसलिए भी पाठक कम रह गए हैं। वह जमाना और था, जब मेरे गीत रंगीन पृष्ठों पर छपते थे, पूरे-पूरे पेज पर। जहां तक अच्छी कविता का प्रश्न है, अब छंद के बाहर ही अच्छी कविताएं लिखी जा रही हैं, फिर भी पूरा साहित्य मंगलेश डबराल या राजेश जोशी का खंगाल लेंगे तो दस-बीस ही अच्छी कविताएं पढ़ने को मिलेंगी। पढ़ी फिर भी कविता इसलिए ज्यादा जाती है कि वह फटाक से पढ़ ली जाती है।

बाकी साहित्य की अपेक्षा कविता जल्दी पढ़ ली जाती है। यह आसान है। आसानी से पढ़ ली जाती है। कहानीकार भी कविता पढ़ लेता है, लेकिन हर कवि उतनी आसानी से कहानी पढ़ने के लिए स्वयं को सहजतः तैयार नहीं कर पाता है। जहां तक कविता के अच्छा या खराब होने की बात है, कविता होती है या नहीं होती है। वह आसान नहीं होती है- 'शेर अच्छा-बुरा नहीं होता, या तो होता है या नहीं होता।' ग़ज़लों में आजकल रिपिटीशन बहुत हो रहा है। नई बात कम होती है। छंद में वे ही कवि पढ़े जा रहे हैं, जो जैसे नीरज आदि, उनकी किताबें छपती भी हैं, बिकती भी है, बाकी किसकी छपती हैं, किसकी बिकती हैं! आजकल ज्यादादर कविता की किताबें अपने पैसे से छपवाई जा रही हैं। आजकल तो सबसे ज्यादा चुटकला पढ़ा जाता है, उसके बाद कविता का नंबर आता है।

वरिष्ठ कवि दिविक रमेश का कहना है कि कम और ज्यादा के प्रश्न से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कविता का पढ़ा जाना। एक गीत-कवि के जन्मदिन पर आयोजित काव्य संध्या में मुझे ऐसे जन मिले, जिन्होंने स्वयं जगह-जगह मेरी कविताएं पढ़े जाने की बात की। एक ने 'कविकुंभ' का नाम भी लिया। हां, दुर्भाग्य से गुटबाजियों के कारण, गुटबाजी से बाहर के सशक्त कवियों के बारे में ऐसा लग सकता है क्योंकि उनकी हर स्तर पर उपेक्षा की जा रही है। सर्वे-लेखों तक में उनका नाम नहीं गिनाया जाता। अपने-अपने जाल के कवियों का जाप किया जाता है। उन्हीं पर लिखा जाता है, उन्हीं को प्रचारित किया जाता है। कुछ तथाकथित प्रतिष्ठित पत्रिकाएं एक कविता तक प्रकाशित नहीं करतीं।

पुरस्कारों की राजनीति पर भी नजर मार कर देख लीजिए। कवि-आलोचक भारतेंदु मिश्र का कहना है कि अच्छी कविताएं अर्थात ठीक ठाक लिखने-पढ़ने वालों की कविताएं हमेशा पढ़ी जाती हैं। भर्ती के कवियों और मंचीय मसखरों की तथ्यहीन /अप्रासंगिक कविताओं से अपने आप पाठक बचकर निकल जाता है लेकिन अधिकारी/बॉस /शोध निर्देशकों/प्रोफेसरों/संपादकों - जैसे कवियों के कचरे से ये भ्रम पैदा होता है। हमेशा नहीं किन्तु अक्सर उनमें कविता कम कुर्सी ज्यादा होती है। इस टाइप की उबाऊ कविताएं ही किताबों में, मंचों पर और चमचों द्वारा अग्रसारित की जाती हैं। ऐसे कवियों के लिए ही मध्यकालीन कवी बेनी द्वारा कहा गया था- लोगन कबित्त कीबो खेल करि जान्यो है। यह दुर्दशा हिन्दी कविता में सबसे अधिक दिखती है। हिन्दी राज भाषा और संयोग से बाजार की ओर बढ़ने वाली सबसे बड़ी भारतीय ही नहीं विश्वभाषा है। कवि केदारनाथ सिंह लिखते हैं-

दुख हूँ मैं एक नये हिन्दी कवि का
बाँधो, मुझे बाँधो, पर कहाँ बाँधोगे
किस लय, किस छन्द में?
ये छोटे छोटे घर, ये बौने दरवाजे
ताले ये इतने पुराने
और साँकल इतनी जर्जर
आसमान इतना जरा सा
और हवा इतनी कम कम
नफरतयह इतनी गुमसुम सी
और प्यार यह इतना अकेला
और गोल-मोल बाँधो, मुझे बाँधो
पर कहाँ बाँधोगे किस लय, किस छन्द में?
क्या जीवन इसी तरह बीतेगा
शब्दों से शब्दों तक जीने
और जीने और जीने ‌‌और जीने के लगातार द्वन्द्व में?

कवि अरुण देव का अभिमत है कि समालोचन के अनुभव से कह सकता हूँ, हां, हमेशा की तरह आज भी कविता सबसे अधिक पढ़ी जा रही है। पहले भी कम बिकती थी, आज भी कविता कम बिकती है। कवि स्वप्निल श्रीवास्तव का मत है कि कविताएं हमारी सम्वेदना के ज्यादा निकट होती हैं, इसलिये ज्यादा पढ़ी जाती हैं। कवि नील कंठ कहते हैं कि वृहत समाज लोक से अलग है क्या कि सभी विधायें लोक से उत्पन्न होकर वृहत समाज की ओर जाती हैं? सब लोक में ही है। लोकेतर और लोकोत्तर भी लौकिक धारणा ही है। कविता कम नही पढ़ी जाती बल्कि बात यह है कि कविता अपने ग्राहक पाठक या श्रोता से एक विशेष रसिकता की माँग करती है। कविता प्रेमी सहृदयों की दुनिया में पहले से ही कमी रही है। समझ और रसतृष्णा से रहित व्यक्ति के समक्ष आने से कविता स्वयं झिझकती है। ठस्स लोगों के लिए कविता एक विषम चीज है। यह "वृद्धस्य तरुणी विषम्" है।

कविता सहज सर्वग्राही इसलिए भी नही है कि इसकी मार सूक्ष्म होती है। यह इसकी प्रकृति है। इसे बहुत बौद्धिक या भावुक बनाने पर इसका मिज़ाज़ बिगड़ जाता है। दूसरी बात यह है कि कविता में निहित जो व्यंग्य है, उसकी तुलना युवती के नेत्र-अपांग से की गयी है। ऐसी स्थिति में कोई समझ सकता है कि मामला कितना गम्भीर है। कवि महेंद्र कहते हैं, जैसे सभी नदियाँ पहाड़ों से निकलकर समुद्र की ओर जाती हैं, उसी तरह सभी विधाएँ लोक से उत्पन्न होकर वृहत समाज तक पहुँचती हैं। सभी अभिव्यक्ति की माध्यम हैं। कवि-आलोचक डॉ जीवन सिंह का कहना है कि कवियों की संख्या से तो नहीं लगता। एक-एक कवि भी दूसरे एक-एक को पढ़ता होगा, तब भी अच्छी खासी संख्या हो जाती है।

वैसे जिस समाज में साहित्य मात्र ही हाशिये से भी कम हैसियत रखता हो, और तुक्कड़-हँसोड़ों को कवि समझता हो, उसमें संख्या पर विचार करने का औचित्य कहाँ है। कवि डॉ शंकर क्षेम प्रश्न पर गंभीरता से चर्चा की अपेक्षा करते हुए कहते हैं कि कविता और शेष साहित्यिक विधाओं में तुलना की जाये तो आपका कथन सही है। इस उत्तर से एक नये परंतु सनातन प्रश्न का जन्म होता है, क्यों? वैसे हिंदी क्षेत्र में हिंदी पाठकों की कमी एक समस्या है। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने पाठकों को व्यस्त कर दिया है। विकीपीडिया 'कविता कोश' देकर कुछ कमी पूरी कर रहा है। ई-पत्रिकाएं, ई-बुक भी इस क्षेत्र में आ चुकी हैं, फिर भी अच्छी पुस्तकें पढ़ी भी जा रही हैं। संख्या में कथा साहित्य ही आगे है।

डॉ. अमरेन्द्र पूछते हैं कि कहीं इसलिए तो नहीं कि कविता को हमने आसान विधा बना लिया है। अवनीश त्रिपाठी की दृष्टि में कहानी और उपन्यास की तुलना में सभी विधाएँ इस समस्या से ग्रस्त हैं। उनका आकलन पाठक की रुचिकर विधा से है। कविता लोकजीवन में तो सर्वाधिक गायी जाने वाली विधा है, लेकिन केवल गेय काव्य ही। छंदमुक्त के लिए स्थिति सोचनीय है अभी। दार्जिलिंग के कवि बिर्खा खडका डुवर्सेली प्रश्न को गंभीर बताते हुए कहते हैं, सामान्य पाठक, जो कहानी और उपन्यास पढ़ता है, कविता पढ़ने में क्या वैसी ही रुचि लेता है? सामान्य उत्तर मेरे ख्याल में नहीं है। कविगण ही कविता पढ़ते है पाठक बनकर। नेपाल के कवि राजेंद्र भंडारी की एक कविता है- 'ठेंगा, पढ़ूँगा तेरी कविता' (अनुवाद) में बात थोड़ी खुलती है। ज्ञानचंद्र मर्मज्ञ का कहना है कि कविता हो या साहित्य की अन्य विधा, नई पीढ़ी का रुझान कम हुआ है। जहां तक कविता का प्रश्न है, जब तक मानवीय संवेदना जीवित रहेगी, इसके पाठक भी रहेंगे।

कवि सुशील कुमार कहते हैं, यह लोगों का फैलाया हुआ झूठ है कि कविता सबसे कम पढ़ी जाती है। सबसे कम उपन्यास और नाटक पढ़े जाते हैं, फिर कहानी। कविताएँ इस व्यस्त समय में सबसे ज्यादा पढ़ी जाती हैं। एक समय आएगा, जब लोग उपन्यास शायद ही पढ़ें। कविता की मृत्यु कभी नहीं हो सकती। जब तक मनुष्य है, उसका हृदय है और तब तक कविता भी पृथ्वी पर जीवित रहेगी। जब प्रकाशक कहता है कि कविता पढ़ता कौन है तो वह झूठ बोलता है। अधिकांश प्रकाशकों को 100 पृष्ठ से अधिक की सामग्री चाहिए, साहित्य नहीं। प्रकाशक को पुस्तकालयों में डंप करने वाली सामग्री चाहिए। वह हार्ड बाउंड 100 का माल 500 में देता है पुस्तकालयों में। आप एक कहानी पोस्ट कीजिए। कितने लोग पढ़ते हैं, यहीं टेस्ट हो जाएगा। इस युग में सबसे ज्यादा कविताएँ ही पढ़ी जाएंगी। पहले भी यही पढ़ी गईं। मुझे विधाओं को लेकर कोई द्वेष नहीं। पर कविताओं के पाठक सबसे अधिक हैं।

कविता जीवन-प्राण है। प्रकृति की पहचान है। रचना रच चल, हर क्षण हर पल। महामंत्र है कविता। जबतक कविता जिन्दा है, सपने जिन्दा हैं। कहानियां बांधे रखती हैं और कविता पढ़ने में कम समय लगता है। अतएव लोग कविता ज्यादा पढ़ते हैं ऐसा मेरा मानना है। कविताएँ पढ़ी जाती हैं अधिकतर कवियों के बीच, गद्य बाहर भी पढ़ा जाता है। जीवित तो दोनों ही रहेंगे। कहानी या उपन्यास वही दिल को स्पर्श करता है, जो कविता की तरह तरल और मधुर हो। रेणु जी और निर्मल वर्मा का गद्य, जो कविता सा सरस प्रवाहमान है, ठीक इसके विपरीत जिस कविता में गद्य का प्रभाव अधिक होता है वो कठोरता के कारण हृदयस्पर्शी नहीं बन पाती।

वैसे कविता के नाम पर बकवास बहुत हो रही है। असली कविता महकती है। साहित्य का सबसे सघन रूप कविता ही है। कविता से कम शब्दों में कुछ भी नहीं रचा जा सकता। आज व्यस्त जीवन में कविता ही बिना लाग लपेट के कारण सीधे अगले तक कम समय में संप्रेषित हो जाती है और संवेदित भी कर देती है। यह क्षमता और विशेषता किसी विधा के पास नहीं है। इसीलिए नेता-अभिनेता आज भी कविता से ही अपनी बात को अंतिम रूप देते हैं। साहित्य की शुरुआत ही कविता है! यकीनन, जब तक पृथ्वी पर मनुष्य है, दिल है, धड़कन है और संवेदनाएं हैं, तब तक कविता जीवित रहेगी। ओम प्रकाश आदित्य लिखते हैं -

छंद को बिगाड़ो मत, गंध को उजाड़ो मत, कविता-लता के ये सुमन झर जाएंगे।
शब्द को उघाड़ो मत, अर्थ को पछाड़ो मत, भाषण-सा झाड़ो मत गीत मर जाएंगे।
हाथी-से चिंघाड़ो मत, सिंह से दहाड़ो मत, ऐसे गला फाड़ो मत, श्रोता डर जाएंगे।
घर के सताए हुए आए हैं बेचारे यहाँ, यहाँ भी सताओगे तो ये किधर जाएंगे।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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