हजारों में बिक रही बिना हाथ की भिखारिन की पेंटिंग 

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कला, जब सिर्फ कला के लिए न होकर, लोगों की जिंदगियां संवारने लगती है, तो चर्चाओं में बिहार की मधुबनी पेंटिंग, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म ‘आईमिथिला’ की सास-बहू, पैरों से पेंटिंग बनाने वाली ऋषिकेश की अंजना माली, कागज़ को तोड़ मरोड़ कर कला रचने वाली ब्रिटेन की यूलिया ब्रोडस्काया और ताइवान के वह 96 वर्षीय बुज़ुर्ग हुआंग युंग-फू दुनिया की सुर्खियां बन जाते हैं, जिनकी सिर्फ पेंटिंग के कारण 28 लाख की आबादी वाला पूरा ताइचुंग शहर उजाड़े जाने से बच गया।

अंजना माली
अंजना माली
काम करते समय उनके आसपास भीड़ इकट्ठी हो जाती है। लोग उन्हें अचरज से देखते हैं। अब अंजना चाहती हैं कि कला की बारीकियों को और बेहतर तरीके से समझें, ताकि अपनी अधूरी जिंदगी को वह अपनी उपलब्धियों से पूरी कर सकूं।

गरीब परिवार की अंजना माली ऋषिकेश (उत्तराखंड) में रहती हैं। वह पहले भीख मांगकर जीवन बिताती थीं। वह लंबे वक्त तक गंगा घाटों पर सैलानियों से भीख मांगती रही हैं। बाद में पेंटिंग बनाने बनाने लगीं। उनके जन्म से ही दोनो हाथ नहीं है, तो पैरों से हाथों का काम लेने लगीं। शुरू में उनके पास इतने भी पैसे नहीं थे कि पेंट और ब्रश खरीद सकें। और एक वक्त ऐसा आया, जब वह पैरों से पेंटिंग बनाकर अपने परिवार का खर्च चलाने लगीं। पिछले साल वह जब घाट पर बैठी हुई थीं, पहली बार अपने पैरों से चारकोल का एक टुकड़ा पकड़कर कुछ लिखने की कोशिश करने लगीं।

वह अपने पैरों से फर्श पर भगवान राम का नाम लिखना चाह रही थीं। उन्हे दिक्कत हो रही थी, लेकिन लगातार कोशिश करती रहीं। तभी उन पर एक अमेरिकी कलाकार और योग प्रशिक्षक स्टीफेनी की नजर पड़ी। उसने न सिर्फ उनकी मदद की, बल्कि बाद में उन्हे पैरों से पेंटिंग बनाना सिखा दिया। अपनी कठिन मेहनत के दम पर उन्होंने चंद महीनों में पेंटिंग बनाना सीख लिया। बिना हाथों के वह तरह-तरह के पशु-पक्षियों, देवी-देवताओं की पेंटिंग बनाने लगीं। धीरे-धीरे उनकी पेंटिंग अच्छे दामों में बिकने लगीं। इसके बाद उन्होंने भीख मांगना छोड़ दिया।

उनको अपनी हर पेंटिंग के दो-तीन हजार रुपये मिल जाते हैं। अधिकतर पेंटिंग विदेशी पर्यटक खरीदते हैं। अब वह अपनी कमाई से अपने माता-पिता की मदद करने लगी हैं। वह गंगा घाट पर बैठकर प्रकृति को निहारते हुए अपनी कल्पनाओं को उड़ान देती हैं। काम करते समय उनके आसपास भीड़ इकट्ठी हो जाती है। लोग उन्हें अचरज से देखते हैं। अब अंजना चाहती हैं कि कला की बारीकियों को और बेहतर तरीके से समझें, ताकि अपनी अधूरी जिंदगी को वह अपनी उपलब्धियों से पूरी कर सकूं। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अपनी एक पेंटिंग भेंट करना चाहती हैं।

विदेश में इन्वेस्टमेंट बैंकर का करियर छोड़कर मिथिला की रुचि झा अब अपनी सास रेणुका कुमारी के साथ ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म ‘आईमिथिला’ संचालित कर रही हैं। पेंटिंग पर फोकस यह एक नए तरह का स्टार्टअप है। एक बार जब वह विदेश से मिथिला अपने घर पहुंचीं, उनको राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों से मुलाकात का अवसर मिला। उन कलाकारों ने घर के बाहर मिथिला पेंटिंग्स सजा रखी थी। वह तस्वीरें उनके मन में बस गईं। मिथिला में पेंटिग्स से घर सजाने की परंपरा है। तभी उन्होंने संकल्प लिया कि अब वह इन पेंटिंग्स को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाएंगी। वह कलाकार को भी अपना हुनर दिखाने के लिए एक प्लेटफॉर्म देना चाहती थीं।

इसके बाद उन्होंने 'आईमिथिला हैंडीक्राफ्ट्स', हैंडलूम प्राइवेट लिमिटेड' नाम से कंपनी बनाई। घर के लोग शुरुआत में काम के लिए राजी नहीं थे। सामाजिक चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा। इस काम में स्थानीय कलाकारों को काम के लिए सहमत करना काफी मुश्किल था, क्योंकि वे मैथिली ही समझते थे। एक मुश्किल इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करना भी था। उनके पास मार्केट रिसर्च के लिए आंकड़े नहीं थे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। कुछ ही समय में रुचि ने अपने प्रयासों से आईमिथिला को देश-विदेश में मधुबनी पेंटिंग को सबसे तेज बढ़ता ब्रांड बना दिया। उनके अनूठे उत्पादों को बेहतर रेस्पॉन्स मिलने लगा। अब उन्हें बड़े बाजारों तक पहुंचने में केंद्र और राज्य सरकारों से मदद भी मिल रही है। उन्होंने सौ से ज्यादा कलाकारों की जिंदगी को संवार दिया है। उन्हें सुपर स्टार्टअप अवॉर्ड भी मिल चुका है। अब लोग इस सास-बहू द्वारा मिथिला पेंटिंग से तैयार कराए गए साड़ी, स्टोल, बैग, क्लच, कोस्टर, ट्रे, वॉल क्लॉक आदि को हाथोहाथ ले रहे हैं।

यह कला का ही कमाल है कि आज मधुबनी पेंटिंग का पूरी दुनिया में डंका बज रहा है। रेलवे की स्टेशन सौंदर्यीकरण प्रतियोगिता में बिहार के मधुबनी स्टेशन ने देश में दूसरा स्थान हासिल किया है। स्थानीय कलाकारों ने पूरे स्टेशन का स्थानीय मधुबनी पेंटिंग से सौंदर्यीकरण किया है। इतना ही नहीं, मधुबनी पेंटिग का इस्तेमाल भारतीय रेलवे भी कर रहा है। दरभंगा और दिल्ली के बीच चलने वाली 12565 बिहार संपर्क क्रांति एक्सप्रेस के कोच को अब इसी चित्रकारी से खूबसूरत बना दिया गया है। इन बोगियों को मधुबनी पेंटिग से सजाने के लिए 50 से अधिक महिला चित्रकारों ने दिन-रात काम किया।

मधुबनी पेंटिंग्स 1934 से पहले सिर्फ गांवों की एक लोककला ही थी। 1934 में मिथिलांचल में बड़ा भूकंप आया था, जिससे वहां काफी नुकसान हुआ। मधुबनी के ब्रिटिश ऑफिसर विलियम आर्चर जब भूकंप से हुआ नुकसान देखने गए तो उन्हे ये पेंटिंग्स मीरो और पिकासो जैसे मॉडर्न आर्टिस्ट जैसी लगीं। फिर उन्होंने इन पेंटिंग्स की ब्लैक एंड वाइट तस्वीरें निकलीं, जो मधुबनी पेंटिंग्स की अब तक की सबसे पुरानी तस्वीरें मानी जाती हैं। उन्होंने 1949 में ‘मार्ग’ के नाम से एक आर्टिकल लिखा, जिसमें मधुबनी पेंटिंग की खासियत बताई। इसके बाद पूरी दुनिया को मधुबनी पेंटिंग की खूबसूरती का अहसास हुआ। मधुबनी पेंटिंग मिथिला के नेपाल और बिहार के क्षेत्र में बनाई जाती है। इस पेंटिंग में मिथिलांचल की संस्कृति को दिखाया जाता है।

ताइवान के ताइचुंग शहर में रहते हैं बुज़ुर्ग हुआंग युंग-फू, जिनको लोग प्यार से 'दादा रेनबो' कहते हैं। वह रोजाना ही सुबह पेंट-ब्रश लेकर शहर की गलियों में निकल जाते हैं और घंटों दीवारों, खिड़कियों, रास्तों को रंगीन चित्रों से सजाते रहते हैं। अब तक वह दसियों हज़ार चित्र बना चुके हैं। उन्हीं के कारण अब यह शहर हर साल कम से कम दस लाख पर्यटकों के आने-जाने का केंद्र बन चुका है। हैरत तो इस बात की है कि यह काम उन्होंने एक दशक पहले ही शुरू किया था। उन दिनो सरकार ने इस गांव को गिराने की चेतावनी दी थी, लोग गांव से पलायन करने लगे, बेतरतीब ढंग से बनाए गए घर उजाड़ होने लगे लेकिन वह अपने घर में रहते हुए चित्रकारी करने लगे। रियल एस्टेट बिल्डरों ने सिर्फ दर्जनभर मकानों को छोड़कर बाकी सभी घरों पर क़ब्ज़ा कर लिया।

इसके बाद हुआंग ने पेंटब्रश से सबसे पहले अपने बंगले में एक छोटी चिड़िया बनाई, फिर कुछ बिल्लियां, इंसान और हवाई जहाज़ आदि। चित्रकारी घर से बाहर निकल पड़ी। वह गांव के वीरान घरों और गलियों में रंगीन चित्र बनाने लगे। जब वर्ष 2010 की एक रात अपने काम में लगे हुआंग को एक छात्र ने देखा तो पेंट ब्रश से सरकारी बुलडोज़र को रोकने की उनकी कोशिश के बारे में जानकर दंग रह गया। उसने हुआंग के लिए एक फंडरेजिंग कैंपेन शुरू कर दिया ताकि हुआंग के लिए ज्यादा से ज्यादा पेंट का इंतजाम किया जा सके, साथ ही उनकी बस्ती गिराने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील दाख़िल की जा सके। यह ख़बर फैलते ही राष्ट्रीय मुद्दा बन गई। मेयर को अस्सी हज़ार ईमेल मिले, जिनमें बस्ती को बचाने की गुहार थी। इसके बाद मेयर ने बस्ती को पब्लिक पार्क के रूप में संरक्षित करने का आदेश जारी कर दिया।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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