सीखने को बहुत कुछ है स्ट्रीटफूड वडापाव को ब्रांड बनाने वाले 'जंबोकिंग' धीरज गुप्ता की कहानी में

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अगर आप महाराष्ट्र में रहते हैं तो रोज़ की तरह आज भी वडापाव खाना न भूलें| ऐसा करने के लिए और भी बेहतर बात यह है कि आप उसके लिए वडापाव ख़रीदे, जो आप को प्रेरित करता हो| हाँ, मैं अपने स्ट्रीट फूड, विशेष रूप से वडापाव को पसंद करता हूँ| आज आप को वडापाव खाना चाहिए क्योंकि जंबोकिंग ( Jumboking) अपना 13वां फाउंडर्स डे मना रहा है, जिसे वडापाव दिवस के रूप में भी जाना जाता है|

इस उत्सव के पीछे, जिसे ब्रांड आज मन रहा है, उद्यमशीलता की एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है| जंबोकिंग धीरज गुप्ता, अपने परिवार से तीसरी पीढ़ी के उद्यमी द्वारा स्थापित किया गया| धीरज के परिवार होटल और खानपान कारोबार में थे और उनकी मिठाई की दुकानें भी थी| इसलिए सिम्बायोसिस, पुणे से एमबीए पूरा करने के बाद, धीरज ने दुबई की तरह, भारत के बाजारों में मिठाई के निर्यात करने का फैसला किया| हालांकि, स्वीट्स के निर्यात का यह प्रयास सफल नहीं हुआ और धीरज को दुकान बंद करनी पड़ी|

उनकी दूसरी उद्यमशीलता स्ट्रीटफ़ूड थी और चाट फैक्टरी के नाम के साथ मुंबई के मलाड में एक दुकान खोली| जैसे-जैसे व्यवसाय बड़ा, धीरज ने महसूस किया कि उनके मेनू में सबसे ज्यादा बिकने वाला आइटम वडापाव है और इस विशेष खाद्य उत्पाद के साथ और अधिक काम करने का फैसला किया| इस प्रकार जंबोकिंग की यात्रा शुरू हुई|

शुरूआती दिन

धीरज गुप्ता बताते हैं,“इसका अनुभव शादी की तरह था, जिसमे आप को पता नहीं होता कि आगे क्या होने वाला है| आप को लगातार सुधार और समायोजन करना होता हैं और आप सीखेंगे कि शादी पहले पांच साल में अलग, बच्चों के बाद अलग और लगातार बदलती रहती है| इसका कोई फार्मूला नहीं है| हर पति और पत्नी रास्ता ढूढ लेते हैं|” और इसी सिद्धांत का धीरज ने बिज़नेस में भी पालन किया हैं| बिज़नेस परिवार से आने के कारण धीरज के लिए बाहर काम करने का विकल्प कभी नहीं था| बिज़नेस पारिवारिक पृष्ठभूमि होने के कारण वे इसमें कूद पड़े|

जंबोकिंग ने 2001 में अपना पहला आउटलेट खोला और जब सड़क के किनारे 2 रुपये में वडापाव बिक रहा था तब उन्होंने दुकान में इसकी कीमत 5 रुपये रखी| धीरज कहते हैं, “लोग दुकान में वडापाव के लिए बहुत उत्सुक थे|” स्वच्छता के कारण के अंतर आया| धीरे-धीरे जायक़े और विभिन्न प्रकार के... मक्खन वडापाव, पनीर वडापाव, सेज्वन वडापाव को शुरू किया| बिक्री में तेजी आई और कंपनी लगातार नया करना जारी रखा|

जंबोकिंग ने जल्द से जल्द कई महानगरों में फ्रैंचाइज़ी स्टोर खोले| उन्होंने अपने स्टोर ऐसे स्थान पर खोले जहाँ पर अधिक लोग आ जा सके..जैसे- रेलवे स्टेशन के बाहर| 200-300 वर्गफुट का स्टोर स्थानों के साथ फिट था और घर जाते समय और मीटिंग के लिए जाते समय, ट्रेन पकड़ने वालें लोग इनके कस्टमर्स थे| हालांकि भीड़ हमेशा नहीं होती थी और स्टेशन के करीब खोलने का कोई फार्मूला काम नहीं करता था| धीरज ने हमारे साथ मस्जिद बंदर रेलवे स्टेशन के पास खोले स्टोर के उदाहरण को शेयर किया|

धीरज याद करते हुए कहते हैं, “हमें पुल के नीचे एक अच्छी लोकेशन मिल गयी, लेकिन हम वहाँ पर बिक्री नहीं कर पायें और हम अपने ब्रांड, उत्पाद, बिक्री आदि पर अचानक आत्मविश्वास खोने लगे और लगभग 50 मीटर की दूरी पर एक ही जगह पर दूसरा व्यक्ति वडापाव का तेज कारोबार कर रहा था|” अधिक जानने पर पता चला कि कम बिक्री की वजह मस्जिद बंदर स्टेशन में आने वाली भीड़ थी| धीरज कहतें हैं, “हमने एहसास किया कि वहाँ पर कोई भी कार्यालय या कॉलेज नहीं था, केवल कारखाने के लोग और मिल मजदूर जातें थे और उनके लिए 1 रुपये का अंतर भी बड़ी बात थी|” इससे हमें सीख मिली की सभी भीड़भाड़ वाले स्टेशन काम के लिए सही नहीं होते|

उद्यमिता में उनका अगला सबक दुकानों के प्रकार के बारे में था| फ्रेंचाइजी मॉडल के साथ शुरू करने के बाद, 2007 में जंबोकिंग, कंपनी स्वामित्व वाली दुकानों की अपनी यात्रा पर निकल पड़े| धीरज कहतें हैं, “हमें कंपनी में वीसी निवेश के लिए छोटा सा मौका मिला| इसलिए लोग कहने लगे कि आप को कंपनी के स्वामित्व वाली दुकानों को खोलना चाहिए, आप और अधिक पैसा बनायेंगे और अगले तीन वर्षों के लिए हम कंपनी की फ्रेंचाइजी खरीदने लगे और कंपनी के स्वामित्व वाली दुकानों खोलने लगें| लेकिन दोनों करने के बाद, जंबोकिंग ने 200 करोड़ रुपये का कारोबार किया| हमने कंपनी के स्वामित्व वाले मॉडल को नहीं लिया| इसने समय में हमें धीमा कर दिया, इसने प्रबंधन में समय बहुत ले लिया|”

शुरू से ही धीरज बहुत स्पष्ट थे कि वे ब्रांड को कमजोर नहीं करेंगे| इसलिए पिछले 12 साल से अधिक समय से वे अपने खाद्य उत्पाद वडापाव के लिए प्रतिबद्ध हैं| उन्होंने उत्पाद में लगातार बदलाव किया लेकिन अभी तक एक पूरी तरह से नए उत्पाद लाइन में नहीं गए| धीरज कहते हैं, “पहले 15 साल के लिए, मैकडॉनल्ड्स ने अपने मेनू में बर्गर, फ्राइज और कोक के अलावा कुछ नहीं था| यहाँ तक कि 5-6 साल के बाद पब्लिक आने पर भी उनके मेनू में 2-3 चीजे थी| उन्होंने अपना पूरा ध्यान एक ही उत्पाद पर रखा| इसी समय उस उत्पाद के चारों ओर बड़ी मात्रा में निर्माण किया गया| ताकि वे स्वचालन, आधुनिक तकनीक का खर्च वहन कर सके, जो कंपनी के लिए वहन करने योग्य हो|”

धीरज गुप्ता
धीरज गुप्ता

यात्रा के लिए प्रेरणा

धीरज मैकडॉनल्ड्स के एक बड़े प्रशंसक हैं और वे Jumboking को मैकडॉनल्ड्स के समान ब्रांड बनाने की कोशिश कर रहे हैं| यह स्वीकार करने में वे हिचकते नहीं हैं| धीरज कहतें हैं, “आप अपने चारों ओर ब्रांडों पर नजर डालें तो उनमें से लगभग 90% अमेरिका में उत्पन्न हुए हैं और यह एक संयोग नहीं है, वे ब्रांडिंग को समझते हैं जिसे जापान भी नहीं समझ पाया| यहाँ तक कि अकियो मोरिता को अमेरिका जाना पड़ा और सोनी ब्रांड का निर्माण किया|” रे क्रोक की जीवनी ने धीरज के लिए एक तरह की बाइबिल का काम किया है|

आज Jumboking के 10 रुपये से लेकर 75 रुपये के उत्पाद हैं, लेकिन सभी वडापाव के विभिन्न प्रकार हैं| हाल ही में ब्रांड ने अलग रूप और अवतार में अपने मेनू में समोसा जोड़ा है| Jumboking के विनिर्माण प्लांट 1.5 टन पेटीज एक घंटे बनाने में सक्षम हैं| उन्होंने कहा कि कई अन्य खाद्य श्रेणिया वहाँ हैं, लेकिन सिर्फ एक विशेषज्ञ डॉक्टर हमेशा सामान्य चिकित्सक से अधिक अर्जित करेगा, इस बात से धीरज आश्वस्त हैं कि विशेषज्ञता सफलता की कुंजी है|

पढ़ने के शौक़ीन धीरज को अल रिएस की किताब ‘फोकस’ और जैक ट्राउट की किताब ‘डेथ ऑफ़ एडवरटाइजिंग और राइज और पीआर’ जैसी किताब से प्रेरणा मिलती है| हमनें उनसे पूछा कि इतना पढ़ने के लिए समय कैसे निकाल लेते हैं तो उन्होंने एक रोचक व्याख्या की| वह हंसते हुए कहते हैं, “शायद एडवरटाइजिंग या मार्केटिंग एजेंसी में 2 करोड़ रुपये खर्च की तुलना में, मार्केटिंग को समझने के लिए 200 रुपये की किताब को पढ़ने की जरूरत थी|”

उद्यमी का कठिन जीवन

आज Jumboking अच्छी तरह से बढ़ रहा है और यह ब्रांड भारत के नौ शहरों में उपस्थिति है- मुंबई, ठाणे, बेंगलूर, औरंगाबाद, मैसूर, दिल्ली, अमरावती, इंदौर और रायपुर| लेकिन चीजें शुरुआत में कठिन थी| धीरज याद करते हुए कहते हैं, “जब मैंने एमबीए पूरा किया, मेरे सभी बैचमेट की भारी भरकम वेतन के साथ प्लेसमेंट हो रही थी| कुछ कह रहे थे कि आपने एमबीए किया है और सड़क के किनारे विक्रेताओं के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हो|” उद्यमिता में दृढ़ता की बहुत जरूरत है| आपके आस-पास के लोग पैसे कमा रहें हैं और आप सिर्फ अपने सपने में जी रहे हैं| उस समय आप और शायद आपकी पत्नी आप में विश्वास रखती है| और कोई नहीं| धीरज कहतें हैं, “आपके पास विश्वास के लिए दूसरा कोई नहीं होता| क्योंकि आप कुछ अलग करना चाहते हैं, जिसे पहले किसी ने नहीं किया| पहले 3 साल बहुत अकेलापन होता है, जहाँ पर आप काम को चुनौती देते हो| लोग कहतें हैं मॅकडोनाल्ड्स कर सकता है, लेकिन वडापाव में नहीं हो सकता| इस तरह के माहौल में आप काम करते हो| स्टाफ आपको बताता है, सर वैरायटी के लिए समोसा कैसा रहेगा|”

Jumboking ने पहले दिन से ही पैसा बनाना शुरू कर दिया था,लेकिन यह सब बिज़नस को विकसित करने में जाता था| बेहतर क्षमता निर्माण, नई मशीनों को लाना| धीरज साझा करते हुए कहते हैं, “एक उद्यमी के रूप में, 2008-09 में समाचर पत्र खोलते समय स्पेन्सर, स्पेन्सर, रिलायंस के कामों के बारे में होता था| एक उद्यमी के रूप में यह भयभीत करने वाला होता था|” और एक ऐसी साहसी महत्वाकांक्षा एक वित्तीय संकट में Jumboking मिला| हालांकि, जब अनुमानों और गणना काम नहीं आते तो उन्हें कर्मचारियों में कटौती और कुछ प्लानों पर दोबारा से काम करतें|

इसलिए समय के अनुसार Jumboking की अलग-अलग टीम होती है...... 3-10 स्टोर की टीम अलग थी, 11-50 स्टोर की टीम अलग होगी, 100 स्टोर टीम अलग होगी| धीरज कहतें हैं, “आपको अधिक जानने के लिए और एक टीम के रूप में और अधिक कुशल होना होता है| मैं अपनी टीम से कहता रहता हूँ, अगले तीन साल में हम यहाँ होंगे| उठो और बढ़ शुरू करों|”

वडापाव दिन का का जश्न मनाने धीरज बहुत ही गर्व से 15 अगस्त को 95 लाख वडापाव बिक्री को साझा करते हैं और जनवरी तक 100 मिलियन का आकड़ा छूने इंतजार कर रहे हैं| जिस प्रकार एमबीए पूरा करने के बाद जॉब करना उनके लिए विकल्प नहीं था, वे मानते हैं कि उसी प्रकार सफलता के लिए भी कोई शॉर्टकट नहीं है| उसका पसंदीदा लाइन ,जो उन्हें प्रेरित करती है-“ सफलता उनकों मिलती है जो इसमें सबसे अधिक विश्वास करतें हैं और लंबे समय तक इस पर विश्वास करते हैं|”

मूल -प्रीति चामीकुट्टी