वो IPS अधिकारी और कवि जिन्होंने 500 से ज्यादा पुलिस वालों को किया कविता लिखने के लिए प्रेरित

आईपीएस डीसी राजप्पा ने पुलिस के अनुभवों को दी कविताओं की शक्ल...

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राजप्पा ने 14 साल की उम्र से कविताएं लिखना शुरू किया था। कन्नड़ भाषा के महान कवियों में शुमार कुवेंपु की ‘करीसिडा’ कविता ने राजप्पा पर गहरा असर छोड़ा। इस कविता में कुवेंपु ने अपने जन्म स्थान कुप्पल्ली और कर्नाटक के मलनाड क्षेत्र में अपने घर के बारे में लिखा था।

आईपीएस राजप्पा
आईपीएस राजप्पा
 राजप्पा कहते हैं कि अब वह अपनी नौकरी से बेहद प्यार करते हैं और यूनिफॉर्म में सेवा करने में उन्हें मजा आता है। कर्नाटक पुलिस में राजप्पा को 28 साल हो चुके हैं। इस दौरान उन्होंने कर्नाटक के अलग-अलग जिलों में काम किया है।

 बढ़ते वक्त के साथ कविताओं के लिए राजप्पा का प्यार बढ़ता ही गया। अभी तक वह 300 से ज्यादा कविताएं लिख चुके हैं। इनमें से ज्यादतर बतौर पुलिसकर्मी, उनके निजी अनुभवों से प्रेरित हैं।

अक्सर लोग पुलिस की वर्दी के भीतर के व्यक्ति को स्वभाव से असंवेदनशील समझते हैं। उन्हें लगता है कि यह व्यक्ति विशेष निश्चित तौर पर आम लोगों जैसे शौक नहीं रखता होगा। इस अवधारणा को गलत साबित करते हैं, कर्नाटक पुलिस के आईपीएस ऑफिसर डीसी राजप्पा। राजप्पा न सिर्फ एक उम्दा पुलिसकर्मी हैं, बल्कि कन्नड़ भाषा के अच्छे कवि भी हैं। उन्होंने अपने फर्ज और शौक के बीच कमाल का तालमेल बिठाया है।

डीसी राजप्पा ने न सिर्फ अपने शौक को जिंदा रखा और उसे एक राह दी, बल्कि उन्होंने साथी पुलिसकर्मियों के लिए एक मिसाल भी कायम की और प्रेरित किया। राजप्पा ने पुलिसकर्मियों के अंदर छिपे कवियों को पहचाना और सबके सामने आने में उनकी मदद की। इस फेहरिस्त में अभी तक 500 पुलिसकर्मी शामिल हो चुके हैं।

बनना चाहते थे आईएएस, बन गए आईपीएस

राजप्पा का पुलिस फोर्स में शामिल होना, एक इत्तेफाक है। राजप्पा बताते हैं कि उनके नाम में ‘डी.सी.’ आता था और इस वजह से वह डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर बनना चाहते थे, लेकिन यूपीएससी की परीक्षा में वह आईपीएस (इंडियन पुलिस सर्विस) के लिए क्वॉलीफाई हुई। राजप्पा कहते हैं कि अब वह अपनी नौकरी से बेहद प्यार करते हैं और यूनिफॉर्म में सेवा करने में उन्हें मजा आता है।

कर्नाटक पुलिस में राजप्पा को 28 साल हो चुके हैं। इस दौरान उन्होंने कर्नाटक के अलग-अलग जिलों में काम किया है। बतौर पुलिस ऑफिसर वह बीदर, सागर, मेंगलुरु, गुलबर्ग, शिमोगा, बेलारी, बीजापुर और बेंगलुरु में काम कर चुके हैं। वह रेलवे, सीआईडी में और डीसीपी वेस्ट के पद भी काम कर चुके हैं। फिलहाल वह सिटी आर्म्ड रिजर्व (CAR) में जॉइंट कमिश्नर के पद पर कार्यरत हैं।

इस कन्नड़ कवि से मिली प्रेरणा

राजप्पा ने 14 साल की उम्र से कविताएं लिखना शुरू किया था। कन्नड़ भाषा के महान कवियों में शुमार कुवेंपु की ‘करीसिडा’ कविता ने राजप्पा पर गहरा असर छोड़ा। इस कविता में कुवेंपु ने अपने जन्म स्थान कुप्पल्ली और कर्नाटक के मलनाड क्षेत्र में अपने घर के बारे में लिखा था। इससे प्रेरित होकर राजप्पा ने अपने घर के बारे में एक कविता लिखी। इसके बाद राजप्पा ने अपना लेखन जारी रखा। राजप्पा बताते हैं कि 1979 में जब वह मैसूर के महाराजा कॉलेज से स्नातक कर रहे थे, तब उनकी मुलाकात उनके प्रेरणास्त्रोत कुवेंपु से हुई। राजप्पा ने अपनी कविताएं कुवेंपु को दिखाईं और उन्हें काफी सराहना मिली। कुवेंपु ने उन्हें लेखन जारी रखने की सलाह दी।

पुलिस के अनुभवों को दी कविता की शक्ल

यह तो सिर्फ शुरूआत थी। बढ़ते वक्त के साथ कविताओं के लिए राजप्पा का प्यार बढ़ता ही गया। अभी तक वह 300 से ज्यादा कविताएं लिख चुके हैं। इनमें से ज्यादतर बतौर पुलिसकर्मी, उनके निजी अनुभवों से प्रेरित हैं। इस संबंध में उन्होंने एक मार्मिक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि एक बार उनके सामने एक केस आया। जिसमें एक 13 साल की बच्ची, रेप के बाद गर्भवती हो गई। पीड़िता के मां-बाप उसे राजप्पा के ऑफिस लाए और उनसे न्याय की गुहार लगाई। उस बच्ची ने राजप्पा की संवेदनाओं को झकझोर दिया। राजप्पा को अपने अंदर उमड़ रहे तूफान को संभालने के लिए कविता का सहारा लेना पड़ा।

राजप्पा मानते हैं कि समाज में पुलिसवालों के अनुभव बहुत ही अलग होते हैं। इन अनुभवों को समाज के साथ साझा करना जरूरी है। राजप्पा ने ‘योर स्टोरी’ से बात करते हुए उस घटना का भी जिक्र किया, जिसने उनके नजरिए को बहुत हद तक बदल दिया। राजप्पा गुलबर्ग में बतौर एएसपी कार्यरत थे। खदान के पत्थरों से भरा एक ट्रक दुर्घटनाग्रस्त हुआ और इस दुर्घटना में कई लोगों की जान चली गई।

घटना को याद करते हुए राजप्पा ने बताया कि जब वह शवों को एक दूसरे से अलग कर रहे थे, तब उन्होंने एक 9 महीने के बच्चे को उसकी मां के शव से अलग किया। बच्चा मां का दूध पी रहा और उस अवस्था में ही दोनों की मौत हो गई थी। इस बारें में अपनी संवेदनाएं जाहिर करने के लिए राजप्पा ने एक कविता लिखी। अंग्रेजी अनुवाद में जिसका शीर्षक था, ‘डेथ ऐंड सेलिब्रेशन’। यह कविता कवि और मौत के बीच का संवाद है। कवि, मौत से सवाल करता है कि उसने एक मासूम को अपना शिकार क्यों बनाया? मौत ने उन लोगों को क्यों नहीं चुना, जो रोज मौत की दुआ मांगते हैं।

मिल चुके हैं कई बड़े पुरस्कार

राजप्पा के अभी तक तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें अम्मा पुरस्कार, बासवा पुरस्कार और राज्यश्री जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वह 4 बार (1997, 2004, 2011 और 2017) कन्नड़ साहित्य सम्मेलन में अपनी कविताएं सुना चुके हैं। राजप्पा मानते हैं कि कविता लिखना हो या फिर पुलिस की नौकरी, हर काम में संवेदनशील होने की जरूरत होती है। राजप्पा अभी तक उनसे प्रेरित अन्य पुलिसकर्मियों के 4 कविता संकलनों का संपादन भी कर चुके हैं। इन पुलिसकर्मियों में कॉन्सटेबल से लेकर इंस्पेक्टर जनरल्स तक की रैंक्स के पुलिसकर्मी शामिल रहे हैं। राजप्पा कहते हैं कि कविता की मदद से पुलिसकर्मी हर चीज में एक सकारात्मक नजरिया ढूंढ़ पाते हैं।

अब क्या चाहते हैं राजप्पा

पुलिसकर्मियों द्वारा लिखी कविताओं के संकलन के 5वें एडिशन का संपादन करने के अलावा वह पुलिसकर्मियों के लिए 2 दिनों का राज्य-स्तरीय साहित्य सम्मेलन आयोजित करने की योजना भी बना रहे हैं। राजप्पा ने अपनी इच्छा जाहिर करते हुए कहा कि अभी लंबा वक्त है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि एक दिन ऑल-इंडिया स्तर पर पुलिसकर्मियों का कवि सम्मेलन आयोजित होगा, जिसमें पुलिसकर्मी अपनी-अपनी भाषाओं में कविता सुनाएंगे। जब राजप्पा से पूछा गया कि नौकरी के अनुभवों में ढली कविताओं के संकलन को वह कभी प्रकाशित करना चाहेंगे तो उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया कि संभव है कि भविष्य में वह वक्त निकालकर, एक किताब लिखें और उसे प्रकाशित करवाएं।

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