दिव्यांग बच्चों की जिंदगी को खुशहाल बनाने के लिए  सोनाली ने छोड़ दी पत्रकारिता की नौकरी

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विकास के साथ समाज में दिव्यागों को लेकर सोच बदली है। पर अब भी एक बड़ा तबका है ऐसा है जो शारीरिक अक्षमता की वजह से चलने, बैठने, खाने और बात करने में असमर्थ लोगों को अपनाने में हिचक रखता है। इसमें कई बार परिवार की उदासीनता भी शामिल हो जाती है। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इस सोच को बदलने की कोशिश में जुट जाते हैं। खासकर के दिव्यांग बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने, उन्हें सारी खुशियां देने के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर कर देते हैं। दिव्यांग बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने की सबसे पहली कड़ी है शिक्षा। ऐसे ही शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों को साक्षर करने की कोशिश कर रही हैं मुंबई की सोनाली श्यामसुन्दर। जिनके लिये ये बच्चे अनमोल हैं।


सोनाली श्यामसुन्दर ने अपनी स्कूली पढ़ाई राज्य के अलग अलग जगहों से की। कारण, पिता की सरकारी नौकरी।  नौकरी के सिलसिले में अकसर तबादला होता रहता था, लेकिन स्नातक की पढ़ाई उन्होंने मुंबई के रूइया कॉलेज से की। इसके बाद उन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स और फ्री प्रेस जर्नल में एक पत्रकार के रूप में भी काम किया। इस दौरान वो अपराध और सामाजिक क्षेत्रों की रिपोर्टिंग करती थी।


सोनाली ने योरस्टोरी को बताया, 

"रिपोर्टिंग के दौरान अगर कोई मुझे गरीब और बीमार दिखता था तो मैं अपना काम खत्म करने के बाद उसका हाल-चाल लेने के लिए जाया करती थी, हालांकि ये काम मैं मानवता के लिहाज से करती थी, लेकिन मेरे बॉस का कहना था कि रिपोर्टिंग के बाद हमारा काम खत्म हो जाता है इसलिए किसी से ज्यादा सहानभूति नहीं जतानी चाहिए। बावजूद ये सिलसिला कुछ साल तक चला, फिर एक दिन मैंने तय किया और अपनी नौकरी छोड़ दी।"


नौकरी छोड़ने के बाद वो ‘प्रेरणा’ और ‘मासूम’ जैसे एनजीओ के साथ जुड़ गई। ये दोनों संस्थाएं सामाजिक काम करती थी। अपने काम के दौरान उन्होंने सीखा कि किसी एनजीओ को कैसे चलाया जाता है और इस क्षेत्र में कैसे काम किया जाता है। इसके अलावा वह अपनी साप्ताहिक छुट्टी में समाजसेवी प्रकाश आप्टे के पास जाती थीं जो खुद एक एनजीओ चलाते हैं। धीरे-धीरे सोनाली का रूझान सामाजिक काम में बढ़ता गया और उन्होंने तय किया कि वो सामाजिक क्षेत्र में ही काम करेंगीं। अपना काम शुरू करने से पहले सोनाली ने बीएमसी और विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर दिव्यांगों पर रिसर्च की। इस दौरान वो बीएमसी स्कूलों में आने वाले दिव्यांगों से मिली। उन्हें देखकर सोनाली ने सोचा की इनके लिए काफी कुछ करने की जरूरत है। जब वो दिव्यांगों के लिये काम करने के बारे में सोच रही थी तभी उनकी शादी हो गई, लेकिन ऐसे बच्चों के लिए काम करने की इच्छा उनके मन में अभी भी बनी हुई थी।


एक दिन उन्होंने दिव्यांगों के लिये काम करने की अपनी इच्छा को अपने परिवार और पति के सामने रखा। परिवार ने सोनाली की इच्छा पर हामी भर दी। घरवालों के मिले सहयोग से सोनाली ने 2011 में उर्मी फाउंडेशन की स्थापना की। उन्होंने बीएमसी को स्पेशल स्कूलों को गोद लिया। इसमें वो ऐसे दिव्यांग बच्चों को शिक्षित करने की कोशिश करती हैं। वह बताती हैं कि 

"बीएमसी के पास साधन बहुत ही सीमित होते हैं साथ ही ऐसे बच्चों के ज्यादातर माता-पिता अपने इन बच्चों को बोझ समझते हैं। वे लोग अपने बच्चों को बहुत ही खराब हालत में स्कूल लाते हैं। तब हम ऐसे बच्चों को साफ सफाई के बारे में बताते हैं। क्योंकि ये बच्चे साधारण सी बातें भी नहीं जानते। जैसे टॉयलेट कैसे जाना है, नहाना कैसे है, खाना कैसे खाते हैं। क्योंकि इनमें से कुछ बच्चे तो चम्मच भी सही तरीके से नहीं पकड़ सकते।"


सोनाली अपने काम के बारे में योर स्टोरी को बताया कि “हम लोग बीएमसी के लिए पाठ्यक्रम तैयार करते हैं, जिसे बीएमसी दिव्यांगों के लिये बने स्कूल में लागू करता है। इसके अलावा शिक्षा और सामाजिक उत्थान में काम करने के लिए हमारी टीम है जिसमें शिक्षक और चिकित्सक दोनों हैं। हम स्लम की तंग गलियों में जाते हैं जहां पर व्हील चेयर भी नहीं जा सकती है, वहां ऐसे लोगों को हम साफ सफाई और शिक्षा के बारे में बताते हैं।”


जाहिर है जिस स्लम इलाके में चलने के लिये भी ठीक से जगह ना हो वहां से दिव्यांग बच्चे कैसे पढ़ने के लिए स्कूल आ सकते हैं। इस समस्या को दूर करने के लिए उर्मी फाउंडेशन ने इन जगहों पर बीएमसी और दूसरे लोगों की मदद से स्टडी सेंटर खोले हैं। मुंबई में उर्मी फॉउंडेशन के 4 सेंटर हैं। इन सेंटर में वाशी नाका में 2, लालडोंगर, स्वास्तिक चेंबर में एक-एक सेंटर चल रहा है। जबकि बीएमसी के तहत आने वाले सेंटर जो दादर, चेम्बूर, घाटकोपर और सायन में हैं, उनमें भी उर्मी फाउंडेशन अपनी सेवाएं दे रहा है। सोनाली का कहना है कि बीएमसी ने बच्चों को पढ़ाने के लिए अपना स्टाफ रखा हुआ है। हम अपनी स्पेशल टीम के जरिये दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने और सिखाने में मदद करते हैं।


सोनाली अपने काम के तरीके के बारे में बताती हैं,

“सबसे पहले हम बच्चे को जांचते हैं कि वो किस लेवल की जानकारी रखते हैं। इसके लिए हम इन बच्चों का 5 तरह से आकलन करते हैं। जैसे एजुकेशनल,पर्सनल, सोशल, रिक्रिएशन और प्री-वोकेशनल। इसके जरिये हम पता लगते हैं कि बच्चा शारीरिक रूप से कितना तेज है, बच्चा कितना बोल पाता है, वो कितना आत्मनिर्भर है और वो इशारों को समझता है कि नहीं।” 

इसके बाद सोनाली और उनकी टीम एजुकेशन थेरेपी के तहत पहली क्लास से लेकर 5वीं तक के बच्चों का पाठ्यक्रम तैयार करती हैं। सबसे पहले वो दिव्यांगों को गिनती सिखाती हैं उसके बाद उनको जोड़-घटाना सिखाया जाता है। इसके बाद आगे की दूसरी चीजें सिखाई जाती हैं। हर 6 महीने में ये लोग बाहर से इन बच्चों को जांचने के लिए निरीक्षक को बुलाते हैं और देखते हैं कि बच्चे में कितना विकास हुआ है। इस रिपोर्ट को ये लोग बीएमसी के साथ भी बांटते हैं।


सोनाली ऑक्युपेशनल थेरपी के जरिये बच्चों को दैनिक कार्य और पेंसिल पकड़ना आदि काम सीखाती हैं। आर्ट थेरपी में बच्चों को एक जगह पर बैठना सिखाया जाता है। अंत में बच्चों को टीच थेरेपी के जरिये अक्षर ज्ञान सिखाया जाता है। खास बात ये है कि ये सब 6 साल तक के बच्चों को सिखाया जाता है और उसके बाद इन बच्चों का दाखिला बीएमसी स्कूल में करा दिया जाता है। इस सब के बावजूद जो दिव्यांग बच्चे इनके सेंटर तक नहीं पहुंच पाते, उनके पास ये हफ्ते में 1-2 दिन उनके घर जाते हैं और उनको सीखाने की कोशिश करते हैं।


फंडिग के बारे में इनका कहना है कि इनकी आय का कोई नियमित स्रोत नहीं है। ये अपनी संस्था का काम आम लोग और रिश्तेदारों से मिलने वाले दान से बहुत मुश्किल से चला रही हैं। इस समय इनकी संस्था में 13 सदस्य हैं। भविष्य की योजनाओं के बारे में इनका कहना है कि ये मुंबई के स्लम में ही बीएमसी के सहयोग से अपने काम का विस्तार करना चाहती है। इसके अलावा राज्य के दूसरे हिस्सों में भी जिला परिषद के जरिये ये गांवों में इस तरह के सेंटर खोलना चाहती हैं।

वेबसाइट : www.urmifoundation.com