अब समय है जब स्टार्टअप्स को वरिष्ठ नागरिकों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना होगा

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पाब्लो पिकासो ने कहा है कि, ‘‘युवावस्था की कोई उम्र नहीं होती।’’

एक ऐसा देश जो अपनी काम करने वाली आबादी की उम्र और बढ़ती हुई विकास दर के चलते दुनियाभर में अपना एक अलग मुकाम बनाने में सफल हो रहा हो और जहां काम करने वाली अधिकतर कंपनियां युवाओं की शक्ति और आकार पर अपना सारा ध्यान केद्रित करती हैं वहां पर अक्सर वरिष्ठ नागरिकों का एक पर्याप्त और बड़ा वर्ग नजरअंदाज ही रह जाता है। हमारे यहां के अधिकतर समाचार, शिखर सम्मेलन, टेलेंट हंट इत्यादि सभी सिर्फ युवा उद्यमियों, विलक्षण प्रतिभा के धनी बच्चों और युवा अगुवाओं के बारे में बात करते दिखते हैं और वरिष्ठ नागरिकों को सिर्फ अपराध, सुरक्षा और चिकित्सा से संबंधित मुद्दों वाले पृष्ठों पर ही जगह मिल पाती है। एक तरफ जहां भारत एक युवा देश है वहीं दूसरी तरफ वरिष्ठ नागरिकों की जनसंख्या वृद्धि की दर भारत की जनसंख्या की वृद्धि की दर की दोगुनी है। इसके चलते वर्ष 2050 तक देश में 60 वर्ष से अधिक की उम्र में लोगों की संख्या बढ़कर देश की जनसंख्या की 1/5वां हिस्सा होगी जो वर्ष 2010 में सिर्फ 8 फीसदी थी।

क्या हम इस बदलाव के लिये तैयार हैं? क्या वरिष्ठ नागरिकों की यह बढ़ती हुई संख्या अब भी सिर्फ ‘अपराध के शिकार’ वाले पन्नों में ही सिमटकर रह जाएगी? नए भारत के नए जमाने के ये वरिष्ठ नागरिक रिटायर तो हो रहे हैं लेकिन आराम से बैठने के लिये नहीं बल्कि खुद को दोबारा तैयार कर एक बार फिर मैदान में डटने के लिये। और इस सवाल के जवाब में इन उदाहरणों पर एक नजर डालकर एक जबर्दस्त ‘ना’ को सुना जा सकता हैः

दूसरों पर मोहताज और हमेशा उदास दिखने वाली निरुपा राॅय से लेकर गुस्सैल और शरारती किरण खेर तक, ‘बाॅलीवुड फिल्मों’ में माँ का तेजी से बदलता हुआ चरित्र भारतीय वरिष्ठ नागरिकों की यात्रा को बेहतरीन तरीके से दर्शाता है।

  • 84 वर्षीय यामिनी मजूमदार ने 68 वर्ष की उम्र में, जब अधिकतर लोगों को सेवानिवृत हुए एक दशक के करीब का समय हो चुका होता है, एक घरेलू महिला के चोले को उतारते हुए ‘जीव्स’ के नाम से अपने ड्राईक्लीनिंग के कारोबार की नींव रखी। गठिया के रोग से गंभीर रूप से पीडि़त होने और दिल के दौरे से गुजरने के बावजूद उन्हें खुद को ‘‘बहुत बूढ़ा’’ कहलवाने से सख्त नफरत है। खुद को सलाह देने वाले लोगों को वे सिर्फ एक ही वाक्य में लााजवाब करते हुए कहती हैं, ‘‘बूढ़े हो जाने पर मैं चलने-फिरने के लिये छड़ी का प्रयोग करने लगूंगी।’’
  • 61 वर्षीय दीपक अमेम्बल ने एयर इंडिया से 58 वर्ष की आयु में सेवानिवृत होने के बाद एक बार फिर अपने जुनून बाइकिंग की ओर कदम बढ़ाने का फैसला किया। उन्होंने अपने एक मित्र को अपने साथ जोड़ते हुए 72 दिनों की क्राॅस-कंट्री बाइक यात्रा करने की ठानी और मधुमेह और रक्तचाप की चुनौतियों पर काबू पाते हुए मुंबई से लद्दाख-उत्तर पूर्वी भारत-उड़ीसा और वापस मुंबई तक की यात्रा पूरी की। अपने उस अनुभव के बारे में बेहद हर्षित होते हुए वे कहते हैं, ‘‘वे 72 दिन मेरे जीवन के सबसे अनमोल क्षण हैं जिन्हें मैं कभी नहीं भूल सकता।’’
  • वर्तमान में जीवन के 71वें बसंत में चल रही और बैंगलोर के निकट एक वृद्धाश्रम में जीवन बिता रही विधवा सीताम्मा ने 56 वर्ष की उम्र में ट्रेकिंग के रूप में पेशेवर खेल खेलना प्रारंभ किया और उसके एक दशक बाद 66 वर्ष की उम्र में उन्होंने इवेंट का आयोजन करने में कदम बढ़ाये। खेल ने उनके सामने अवसरों की एक नई दुनिया ही बसाकर रख दी है और अब वे युवाओं के साथ बात करने और उनका मार्गदर्शन करने के अलावा नए-नए दोस्त भी बना रही हैं। उन्होंने मार्च 2015 में रोहतक में आयोजित हुई 35वीं राष्ट्रीय मास्टर्स एथलेटिक्स मीट का स्वर्ण पदक जीतने में भी सफलता पाई है।
  • मुंबई की रहने वाली 79 वर्षीय सुशीला मुंबई विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही हैं और अपनी थीसिस को जमा करवाने के अंतिम दौर में हैं। वर्ष 1953 में केरल विश्वविद्यालय में टाॅप करने वाली सुशीला ने करीब एक दशक पहले एमए में दाखिला लेने के साथ एक बार फिर शिक्षा के क्षेत्र में कदम बढ़ाए और उसके बाद एमफिल करने में सफल रहीं।

गौरतलब यह है कि भारतीय मेट्रो शहरों में रहने वाले 68 फीसदी वरिष्ठ नागरिक अकेले अपने दम पर रह रहे हैं क्योंकि उनके बच्चे अपनी नौकरियों के चलते दूसरे शहरों या फिर देशों को चले गए हैं। यहां तक कि जो चुनिंदा अपने माता-पिता के साथ रह भी रहे हैं वे अपनी विभिन्न निजी और व्यवसायिक प्रतिबद्धताओं के चलते उनके साथ अधिक समय बिताने में असमर्थ हैं।

ऊपर दिये गए उदाहरणों सहित कई अन्य उदाहरण यह साबित करने के लिये काफी हैं कि वर्तमान समय में हमारे वरिष्ठ नागरिकों की मानसिकता में धीरे-धीरे ही सही बदलाव आता जा रहा है। वे अपने जीवन का पूरा आनंद लेना चाहते हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि वे ऐसा करने के लिये बिल्कुल तैयार हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन अपना करियर बनाने, घर खरीदने, बच्चों को बड़ा करने, उनकी शादी करने इत्यादि में बिता दिया और आखिरकार अब उनके पास अपने हितों और पसंद पर ध्यान केंद्रित करने के लिये समय और पैसा दोनों ही हैं।

यह वह पीढ़ी है जिसने अपने काम करने के अधिकतर जीवन में कंप्यूटर का कभी उपयोग नहीं किया लेकिन आज चारों तरफ नजर दौड़ाइये। वर्तमान में प्रतिमाह फेसबुक पर सक्रिय होने वाले भारतीय बुजुर्गों की संख्या दो मिलियन से भी अधिक है। पुराने स्कूल, काॅलेज और कार्यक्ष्ेोत्र के दोस्तों के साथ दोबारा संपर्क स्थापित करने की दिशा में व्हाट्सएप्प फेसबुक से भी कहीं अधिक लोकप्रिय है। और ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ नष्क्रिय सदस्य हैं। अधिकतर चीजों को लेकर इनके अपने विचार हैं लेकिन फिर भी वे दूसरों के विचारों से रूबरू होने और उनकी सराहना करने में भी खुशी महसूस करते हैं।

चाहे बात सोशल मिडिया का एक हिस्सा बनने की हो या फिर दुनियाभर में रह रहे अपने मित्रों और रिश्तेदारों के साथ व्हाट्सएप्प और स्काईप के माध्यम से संपर्क में रहने के लिये स्मार्टफोन के उपयोग की, भारत के वरिष्ठ नागरिक किसी भी तरह से नई पीढ़ी से पीछे नहीं हैं और वे भी बढ़-चढ़कर दूसरों के साथ कनेक्ट करने के नवीनतम तरीकों को इस्तेमाल कर रहे हैं और युवाओं को टक्कर दे रहे हैं।

और यह एक ऐसी पीढ़ी है जो किसी भी अन्य उपभोक्ता समूह की तरह अपनी आवाज को सुनवाना और समझाना चाहती है और इसके अलावा उनकी अपनी कुछ विशेष आवश्यकताएं हैं फिर चाहे वह स्वास्थ्य या कल्याण स संबंधित हो या फिर जीवनशैली, प्रौद्योगिकी, सहायता सेवाएं या फिर वित्तीय उत्पाद। एक तरफ जहां वरिष्ठ नागरिक अधिक कठिन उपभोक्ता माने जाते हैं जो निर्णय लेने में थोड़ा अधिक समय लेते हैं लेकिन वे अपना पैसा काफी सोच-समझकर खर्च करते हैं। इन वरिष्ठ नागरिकों की आवश्यकताओं के हिसाब से विशेष तौर पर अपने विभिन्न सेवाओं और उत्पादों को तैयार करना इन कंपनियों के लिये एक बड़ी चुनौती है। और इसमें सिर्फ उत्पाद का डिजाइन ही नहीं शामिल होता है बल्कि आपके उत्पाद का वितरण किस प्रकार से किया गया है और विशेषकर आफ्टर सेल सर्विस कैसी है यह बहुत मायने रखता है।

तो क्या भारतीय बाजार इस बात को सुन रहा है?



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