पैसे की कमी से जिसे बीच में ही छोड़ना पड़ा था कॉलेज, उसने खड़ी कर ली करोड़ों की कंपनी

कॉलेज ड्रॉपआउट शरत सोमन्ना की करोड़ों की कंपनी

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युवा आंत्रेप्रेन्योर शरत आज करोड़ों की कंपनी के मालिक हैं लेकिन उन्होंने वो दिन भी देखा है जब पैसों की कमी की वजह से उन्हें कॉलेज छोड़कर पिता का हाथ बंटाना पड़ा था।

शरत सोमन्ना
शरत सोमन्ना
रिटायरमेंट के बाद शरत के पिता ने अपना एक बिजनेस शुरू किया जिसके लिए उन्होंने सब बेच दिया। दुर्भाग्य से उनका ये कदम उल्टा पड़ गया और ये उन्हें घाटा उठाना पड़ा।

 शरत ने मेहनत और समझदारी से बिजनेस को सक्सेसफुल बना दिया। उन्हें इसके पैसे मिले और जिंदगी फिर से ढर्रे पर आने लगी। एक प्रोजेक्ट के बाद शरत की जिंदगी तेजी से आगे बढ़ने लगी।

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती.. ये पंक्ति जितनी ज्यादा पुरानी है उतनी ही ज्यादा प्रासंगिक भी। हर किसी की जिंदगी में एक वक्त ऐसा आता है जब वो हर तरफ से दुविधाओं, दिक्कतों से घिर जाता है, उम्मीद की सारी किरणें धुंधली पड़ जाती हैं। तब आपका आत्मविश्वास, आपकी लगन ही नैया पार लगाती है। सकारात्मक सोच एक ऐसी ताकत है जिससे दुनिया पर फतह हासिल की जा सकती है। ऐसी ही प्रेरक कहानी है, शरत सोमन्ना की। युवा आंत्रप्रेन्योर शरत आज करोड़ों की कंपनी के मालिक हैं लेकिन उन्होंने वो दिन भी देखा है जब पैसों की कमी की वजह से उन्हें कॉलेज छोड़कर पिता का हाथ बंटाना पड़ा था।

शरत एक मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए थे। वो कर्नाटक के कुर्ग में रहते हैं। उनके पिता सेना में थे। शरत के मुताबिक, 'पापा को हॉकी खेलने का बड़ा शौक था। उनसे ही मुझे हॉकी खेलने की प्रेरणा मिली। स्कूल के टाइम ही मैं बेंगलुरु के स्पोर्ट्स हॉस्टल में आ गया था। खेल ने मेरे अंदर लीडरशिप के गुण विकसित किए, मुझे हर परिस्थितियों से लड़ना सिखाया। खेल भावना की वजह से ही मैं जिंदगी में आई तमाम आर्थिक कठिनाइयों से पार पा पाया। खेल की वजह से ही मैं जिंदगी में कुछ बड़ा करना सीख पाया।'

जब मुश्किलों ने घेर लिया

रिटायरमेंट के बाद शरत के पिता ने अपना एक बिजनेस शुरू किया जिसके लिए उन्होंने सब बेच दिया। दुर्भाग्य से उनका ये कदम उल्टा पड़ गया और ये उन्हें घाटा उठाना पड़ा। परिवार घोर आर्थिक संकट में आ गया। शरत को भी अपनी पढ़ाई छोड़कर घर के कामों में हाथ बंटाना पड़ा। बड़ी सख्त घड़ी थी वो। शरत उस कठिन समय को याद करते हुए बताते हैं, 'मैं अपनी फैमिली को ऐसे परेशान होते नहीं देख सकता था। घर में सब बिखर रहा था। मैं बस किसी तरह घर को फिर से जोड़ने में मदद करना चाहता था। मैं कुछ भी करके बस सब ठीक कर देना चाहता था। मैं कोई भी काम करने के लिए तैयार था। मुझे लगता है कि एक इंसान जिसके पास खाने को नहीं है, वो सब कुछ करने के लिए तैयार रहता है। शायद यही वजह है कि ज्यादातर मध्यमवर्गीय परिवार से आए बच्चों का कोई निर्धारित पैशन नहीं होता है। वो इतना आर्थिक संकट देख चुके होते हैं कि बस वो कोई भी नौकरी कर लेना चाहते हैं, जिसमें अच्छे पैसे मिलते हों।'

शरत (दाहिने)
शरत (दाहिने)

ऐसे ही एक दिन शरत नौकरी के लिए इधर-उधर भटक रहे थे। अचानक उन्हें अपने एक अधूरे प्रोजेक्ट के बारे में याद आया। इंसान जब भूखा होता है तो उसको हर चीज में संभावना नजर आती है। उन्होंने अपने उन सभी लोगों को तुरंत मीटिंग के लिए बुलाया, जो इस प्रोजेक्ट से जुड़े थे। प्रोजेक्ट बहुत बड़ा था, करीब 34 करोड़ रुपए का। उस वक्त शरत की उम्र महज 21 साल की थी। इतने कम उम्र के लड़के पर इतना पैसा लगाना कम रिस्की काम नहीं था। लेकिन शरत ने उन्हें यकीन दिलाया कि वो कर सकते हैं। शरत ने ईमानदारी से उन्हें अपनी परिस्थितियों के बारे में भी बताया। शरत की कॉम्यूनिकेशन स्किल काफी अच्छी है। धीरे-धीरे वो अपने साथियों को अपनी काबिलियत का यकीन दिलाने में सफल हो गए। वो लोग पैसा लगाने के लिए तैयार हो गए। शरत ने मेहनत और समझदारी से बिजनेस को सक्सेजफुल बना दिया। उन्हें इसके पैसे मिले और जिंदगी फिर से ढर्रे पर आने लगी।

जब सफलता ने चूमा शरत का कदम

इस प्रोजेक्ट के बाद शरत की जिंदगी तेजी से आगे बढ़ने लगी। उन्होंने ब्लू ओक्स कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक इंटीरियर एंड कंस्ट्रक्शन कंपनी बनाई। शुरुआत मात्र 47 हजार रुपए से की गई थी। इस काम के लिए सिविल इंजीनियर्स की जरूरत थी। शरत ने अपने कॉलेज के दोस्त गिरीश से बात की। गिरीश शरत की कंपनी में काम करने के लिए तैयार हो गए। गिरीश इस कंपनी के पहले एम्प्लॉय हैं और आज भी इस कंपनी के साथ जुड़े हुए हैं।

लेकिन संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ था। शरत की कंपनी को शुरुआत में घाटा उठाना पड़ा। तीन-चार महीनों तक उनके पास सैलरी देने के लिए पैसे नहीं थे। काम पूरा नहीं हो पा रहा था। उनके खिलाफ पुलिस कंप्लेन की धमकियां आने लगीं। पूरे 42 लाख का नुकसान हो गया था। शरत के पास कुछ भी नहीं बचा था। लेकिन फिर भी वो हार मानने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने जोर जुगाड़ करके पहले ही साल में एक और प्रोजेक्ट ले लिया। सौभाग्य से ये प्रोजेक्ट अच्छा चल गया। चीजें सही होने लगीं। दूसरे साल कई और बड़े प्रोजेक्ट शरत की कंपनी के पास आने लगे। अब तो शरत की कंपनी बड़ी-बड़ी डील करती है। नेस्ले जैसी ही कई और कपंनियों से कॉन्ट्रैक्ट ले चुकी है। आज कंपनी के पास 23 एम्प्लॉय और 180 साइट वर्कर्स हैं। कंपनी 3 मिलियन के प्रोजेक्ट पर काम कर रही है।

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