सत्य का मुख, झूठ की आँखें क्या देखें: शमशेर

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'वहाँ उस आईने में खड़ा है मेरा दोस्त शमशेर! उम्र कैद का अकेला अपराधी।' ये शब्द हैं कवि केदारनाथ अग्रवाल के। हिंदी कविता में अनूठे माँसल ऐंद्रीय बिंबों के सर्जक शमशेर आजीवन प्रगतिवादी विचारधारा से जुड़े रहे। तार सप्तक से शुरुआत कर 'चुका भी नहीं हूँ मैं' के लिए साहित्य अकादमी सम्मान पाने वाले शमशेर ने कविता के अलावा डायरी लिखी और हिंदी उर्दू शब्दकोश का संपादन भी किया...

शमशेर बहादुर सिंह
शमशेर बहादुर सिंह
 शमशेर की कविता नियम नहीं, अपवाद है। मुक्तिबोध की कविता भी अपवाद थी। महान कविता हमेशा अपवाद होती है। शमशेर का संसार एक तिलिस्म है, जिसे भेदना कठिन है। उसे भेदना, उसे नष्ट करना।

आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के एक स्तंभ शमशेर बहादुर सिंह का जन्मदिन 13 जनवरी को होता है। हिंदी कविता में अनूठे माँसल ऐंद्रीय बिंबों के सर्जक शमशेर आजीवन प्रगतिवादी विचारधारा से जुड़े रहे। तार सप्तक से शुरुआत कर 'चुका भी नहीं हूँ मैं' के लिए साहित्य अकादमी सम्मान पाने वाले शमशेर ने कविता के अलावा डायरी लिखी और हिंदी उर्दू शब्दकोश का संपादन भी किया।

मुक्तिबोध कहते हैं, 'शमशेर की मूल मनोवृत्ति एक इम्प्रेशनिस्ट चित्रकार की है। इम्प्रेशनिस्ट चित्रकार अपने चित्र में केवल उन अंशों को स्थान देगा जो उसके संवेदना ज्ञान की दृष्टि से प्रभावपूर्ण संकेत शक्ति रखते हैं...(वह) दृश्य के शेष अंशों को दर्शक की कल्पना के भरोसे छोड़ देगा। दूसरे शब्दों में वह दृश्य के सर्वाधिक संवेद्नाघात करने वाले अंशों को प्रस्तुत करेगा और यह मानकर चलेगा कि यदि यह संवेदानाघात दर्शक के हृदय में पहुँच गया तो दर्शक अचित्रित शेष अंशों को अपनी सृजनशील कल्पना द्वारा भर लेगा।'

साहित्यकार अशोक कुमार पाण्डेय का कहना है कि शमशेर की कविता नियम नहीं, अपवाद है। मुक्तिबोध की कविता भी अपवाद थी। महान कविता हमेशा अपवाद होती है। शमशेर का संसार एक तिलिस्म है, जिसे भेदना कठिन है। उसे भेदना, उसे नष्ट करना। नष्ट करने पर केवल खँडहर ही हाथ लगेंगे। शमशेर की कविता अपने अपरिभाषित रूप में ही सार्थक है। वह सम्मोहित करती है, बाँधती है, बुलाती और गिरफ्तार करती है।

सत्य का मुख
झूठ की आँखें
क्या-देखें!
सत्य का रूख़
समय का रूख़ है
अभय जनता को
सत्य ही सुख है
सत्य ही सुख
दैन्य दानव; काल
भीषण; क्रूर
स्थिति; कंगाल
बुद्धि; घर मजूर।
सत्य का
क्या रंग है?
पूछो - एक संग
एक-जनता का
दुःख : एक
हवा में उड़ती पताकाएँ
अनेक, दैन्य दानव, क्रूर स्थिति
कंगाल बुद्धि, मजूर घर भर
एक जनता का - अमर वर
एकता का स्वर
अन्यथा स्वातंत्र्य-इति।

राजेश जोशी कहते हैं कि 'शमशेर खुद अपनी कविता में जैसा धड़कता हुआ सक्रिय जीवन बोध और यथार्थ का खुरदुरा साक्षात्कार लाने की कोशिश कर सकते हैं, पर कला-चेतना की भीतरी जंजीरों में बंधे होने के कारण उसे कोई संगठित आकार नहीं दे सकते। वे जिस चीज़ की कामना करते हैं और दूसरों की महानता की कसौटी भी उसी चीज़ को बनाते हैं उसका खुद ही अपने लिए निषेध भी करते हैं। इस कशमकश से मुक्ति इस कशमकश के दायित्व और उसके तनाव से मुक्ति के लिए वे नागार्जुन जैसे कवियों की, उस रंग की कविताओं की उन्मुक्त ढंग से प्रशंसा करते हैं जिनके सामने सामान्य रूप से काव्य कला की मांग रखना उनमें निहित जन भावनाओं के ज्वार को देखते हुए एक प्रकार की अभद्रता ही लगती है।

यदि काव्य कला की मांग रखी भी जाय तो उससे मांग रखने वाले को अपने भीतर कुंठा का ही एहसास होगा। इस अप्रिय स्थति से बचने के लिए शमशेर जी ने अपने काव्य संबंधी आग्रहों की दो आचरण संहिताएं बना ली हैं। वे समझते हैं कि जिसे दूसरों पर लागू करके ‘महान’ का साक्षात्कार किया जाता है वह ज़रूरी नहीं कि खुद पर भी लागू किया जाय और अपनी आचरण संहिता सिर्फ अपने लिए है और उसे सामने रखकर अपने को भला-बुरा भी कहने में उन्हें कोई एतराज नहीं।' शमशेर के रचना संसार का एक और पक्ष है- प्रेम। वह इंद्रिय-सौंदर्य के मोहक एवं अतिसंवेदनापूर्ण चित्र देकर भी अज्ञेय की तरह सौंदर्यवादी नहीं लगते हैं-

हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं
...जिनमें वह फँसने नहीं आतीं,
जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं
जिसको वह गहराई तक दबा नहीं पातीं,
तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ।

श्रीकांत वर्मा का मानना है कि शमशेर की कविता के एक पक्ष का स्वीकार और दूसरे पक्ष का अस्वीकार या एक पक्ष को अधिक महत्वपूर्ण और दूसरे यानि जिसमें शमशेर अधिक मुखर हैं, अपनी राजनीतिक पक्षधरता के प्रति उसे कमतर करके देखने की एक चतुराई हिन्दी आलोचना में लगातार बनी रही है। शमशेर का यह सारा का सारा कायिक संसार गंध, रस और ध्वनियों से बना हुआ है। रंगो को शब्द रंग में, दृश्यों को शब्द दृश्य में बदलता हुआ एक जादूगरी की तरह हमारी नसों में उतरता है। हमारी नसों को खोलता है जहाँ न अपनी सामाजिकता से पलायन है, न अपनी निजता से। न अपनी विशिष्टता से, न अपनी सामूहिकता से। यह तो सबको अपने ही रंग में समेटते जाने की कविता है।

इसमें मार्मिक, इतिहासभेदी आद्वितीय दृष्टि है जो अत्यधिक निर्जन अधुनातन की सीमा भी है। यह कविता समय के चौराहों के चकित केन्द्रों से उद्भूत हुई है। कवि मलयज का कहना है कि जब किसी भी बड़े कवि की कविताओं की सुचिंतित या अनजानी गलत व्याख्या होती है तो प्रकारांतर से वह उसके प्रति बहुत गहरे सम्मान और उसकी कविताओं के दहला देने वाले असर की ही परिचायक होती है। शमशेर इस मामले में हिन्दी के सबसे घातक और खतरनाक कवि हैं। शमशेर उन कुछ कवियों में से हैं, जो आलोचकों के सामने एक चुनौती, एक संकट के रूप में सामने आते हैं। ऐसे कवियों के पास सतह पर कुछ नहीं मिलता और मिलता भी है तो अकसर वह भ्रामक होता है।

उनमें गहराई में जाना होता है और वह गहराई किसी दर्शन, आध्यात्म या विचारधारा की उथली व्याख्या नहीं होती। शमशेर के शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ उन्हीं के खिलाफ नहीं, बल्कि सारे सरोकार रखने वाले साहित्य के खिलाफ किया गया। आजीवन शमशेर प्रगतिशील साहित्य से प्रभावित रहे। शमशेर का अपना जीवन निम्नमध्यवर्गीय औसत जीवन था। उन्होंने स्वाधीनता और क्रांति को अपनी निजी चीज की तरह अपनाया। उनमें एक ऐसा कडियलपन है जो उनकी विनम्रता को ढुलमुल नहीं बनने देता, साथ ही किसी सीमा में बंधने भी नहीं देता। 12 जनवरी 1944 को ग्वालियर में मजदूरों ने अपनी भूख के विरोध में एक रैली निकाली और प्रतीक के रूप मे रोटियों को अपने लाल झंडे पर इस अभिप्रेत के साथ टांगा कि हमें कम से कम रोटी खाने भर तक की पगार तो मिले पर इसका जवाब गोलियों से मिला। उस खूनी शाम शमशेर का ह्रदय रोया और उन्होंने ‘य’शाम’ शीर्षक कविता लिखी -

गरीब के हृदय
टंगे हुए
कि रोटियां लिए हुए निशान
लाल–लाल
जा रहे
कि चल रहा
लहू भरे गवालियर के बाजार में जुलूस
जल रहा
धुआं धुआं
गवालियर के मजूर का हृदय

कवि विष्णु खरे का कहना है कि शमशेर हिन्दी के अकेले कवि हैं कि जिनकी कविता के वैचारिक स्रोतों को लेकर उनके जीवन काल से अब तक लगातार आलोचकों के बीच एक तनातनी चलती रही है। हिन्दी के दो वृहत्तर खेमों के बीच उन्हें अपना साबित करने की यह बहस आज की नहीं है। शमशेर पर केंद्रित पहले महत्वपूर्ण आलेख में विजयदेव नारायण साही ने उन्हें ‘विशुद्ध सौंदर्य’ का कवि कहा है और इस ‘विशुद्धता’ को स्पष्ट करते हुए वह कहते हैं कि प्रगतिवाद उनकी कविता के एक हाशिए पर है तो दूसरी तरफ के हाशिए पर है अतियथार्थवाद।

एक धन पक्ष है तो दूसरा ऋण पक्ष इनके बीच साही उनकी कविता के मुख्य टेक्स्ट को 'विशुद्ध सौंदर्य' सौंदर्य कहते हैं। साही इसके आगे जाकर मार्क्सवाद को उनका उनका समय के साथ छूटता दामन नहीं केंचुल कहते हैं। अज्ञेय इसके पहले कह चुके हैं कि राजनीति की दृष्टि से बहुत ज़्यादा सक्रिय तो वह नहीं रहे और उनकी कविता में निहित जीवन मूल्य-दृष्टि में, और उनकी घोषित राजनीति में, राजनीतिक दृष्टि से लगातार एक विरोध रहा। वह प्रगतिवादी आंदोलन के साथ रहे लेकिन उसके सिद्धांतों का प्रतिपादन करने वाले कभी नहीं रहे। उन सिद्धांतों में उनका विश्वास कभी नहीं रहा।

मुक्तिबोध शमशेर की कविता के शिल्प पर कहते हैं ‘लोगों को शमशेर का काव्य शिल्पग्रस्त प्रतीत होता है, तो इसका एक कारन शमशेर के कथ्य की नवीनता है। अभी तक पाठकों और आलोचकों की आत्मचेतना इतनी विकसित नहीं हुई कि वे अपने जीवन में प्राप्त विभिन्न भावना-प्रसंगों के अंतर्गत स्वयं भोगी हुई संवेदनाओं के विभिन्न उलझे हुए रूप, गुण और प्रभाव पहचान पायें। मैं शमशेर की उन कविताओं को नहीं भूल सकता जिन्हें हम, व्यापक अर्थ में, सामाजिक और संकुचित अर्थ में राजनैतिक कह सकते हैं। मनोवैज्ञानिक वस्तुवादी कवि, जब सामाजिक भावनाओं तथा विश्वमैत्री का संवेदनाओं से आछन्न होकर, मानचित्र प्रस्तुत करता है, तब वह उसी प्रकार अनूठा और अद्वितीय हो उठता है। जैसे कि उसी क्षेत्र में भिन्न तथा अन्य कवि कदापि नहीं।

'शान्ति' पर लिखी शमशेर की कविता क्लासिकल ऊंचाइयों की उपलब्धियाँ कर चुकी है। इससे यह सिद्ध होता है कि शमशेर की वास्तवोन्मुखी दृष्टि और वास्तव प्राप्त संवेदनाएँ और भी अधिक साहित्यिक उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकती हैं।’ असफल प्रेम की परिणति सदा निर्वेद में होती है। मनुष्य के ह्रदय में संसार से एक विराग भी उत्पन्न होता है। तब कवि अपने प्रेम को अध्यात्म से जोड़ता है। हिन्दी साहित्य के प्रेमाभिव्यन्जक काव्य इसके प्रमाण है। चाहे वह जायसी का ‘पद्मावत’ हो या कुतुवन की ‘मृगावती’ या फिर मंझन की ‘मधु-मालती‘। बाद के कवियो में भी यह प्रवृत्ति भरपूर मिलती है। असफल प्रेम की परिणति कभी-कभी अध्यात्म से दूर दर्शन तक पहुँचती है और प्रेमी दार्शनिक बनकर हर वस्तु की व्याख्या अलग तरीके और ढंग से करने लगते हैं। शमशेर की कविताओ में ऐसे स्वर मुखर हुए है। कवि कहता है कि अभी मैंने प्यार किया ही कहाँ है और जब करूंगा तब तुम्हारे साहचर्य में मुझे सुख और जय की प्राप्ति होगी –

‘सरल से भी गूढ़ गूढ़तर
तत्व निकलेंगे
अमित विस्मय
अब मथेगा प्रेम सागर
ह्रदय
निकटतम सबकी
अपर शौर्यों की
तुम
तब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख
तुम बनोगी
तब प्राप्त जय

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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