शाम डूबने तक सुलगे वीरेन की कविताओं का ताप

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हमारे समय के महत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं वीरेन डंगवाल। अपनी आत्मा के जिन पहलुओं में इंसान निरंतर अकेला पाया जाता है, उन पर वीरेन दा की नजर पड़ती है। वह उसे न सिर्फ कविता में ढालते हैं, बल्कि अपनी कविता को संबल की तरह खड़ा करते हैं।

वीरेेन डंगवाल
वीरेेन डंगवाल
अपने समय की कविता में जितनी उथल-पुथल निराला, मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन और धूमिल ने की थी, वैसी ही वीरेन डंगवाल ने अस्सी के दशक की पीढ़ी में कर दिखाई। वे अपने पुरखों से सबसे ज़्यादा सीखने, लेकिन उस सीख को व्यक्तित्व में पूरी तरह अपना बना के, बिलकुल अलग अंदाज़ में व्यक्त करने वाले कवि रहे।

तीन साल पहले तक हमारे साथ रहे हिंदी के ख्यात कवि वीरेन डंगवाल कविता के नये पड़ावों की ओर जा रहे थे, लेकिन असामयिक और दुखद मृत्यु ने उनके सफर को रोक दिया। 05 अगस्त को उनका जन्मदिन होता है। आज, जब समकालीन हिंदी कविता, पाठ और अर्थ के नए अनुशासनों में अपना वजूद खोने के कगार पर खड़ी है, तब वीरेन डंगवाल कविता में कही गई बात को अर्थ के साथ अभिप्राय और आशय पर लाना चाहते थे। भाषा में दिपते अर्थ, अभिप्राय, आशय और राग के मोह के चलते वे एक अलग छोर पर खड़े दिखाई देते रहे। उनके अड़सठ वर्षीय जीवन में तीन कविता संग्रह, कुछ छिटपुट लेख और ‘पहल पुस्तिका’ के रूप में तुर्की के महाकवि नाजि़म हिकमत की कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हुए।

यह सफर 1991 में ‘इसी दुनिया में’ से शुरू हुआ हालांकि तब तक ‘रामसिंह’, ‘पीटी उषा’, ‘मेरा बच्चा’, ‘गाय’, ‘भूगोल-रहित’, ‘दुख’, ‘समय’ और ‘इतने भले नहीं बन जाना साथी’ जैसी कविताओं ने उनको प्रतिबद्ध और जन-पक्षधर कवि की पहचान दे दी थी, जिसकी आवाज़ अपने समकालीनों से कुछ अलहदा और अनोखी थी और अपने पूर्ववर्ती कवियों से गहरा संवाद करती थी। हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि मंगलेश डबराल लिखते हैं - ‘वीरेन डंगवाल ‘अपने जन’ के, महादेश के साधारण मनुष्य के कवि हैं। वे उन दूसरे प्राणियों और जड़-जंगम वस्तुओं के कवि भी हैं जो हमें रोज़मर्रा के जीवन में अक्सर दिखाई देती हैं, लेकिन हमारे दिमाग में दर्ज नहीं होतीं। कविता के ये ‘अपने जन’ सिपाही रामसिंह और इलाहाबाद के मल्लाहों, लकड़हारों, रेलवे स्टेशन के फेरीवालों, डाकियों, अपने दोस्तों की बेटियों समता और भाषा, निराला, शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार, पीटी उषा, तारंता बाबू, किन्हीं माथुर साहब और श्रोत्री जी तक फैले हुए हैं। मनुष्येतर जीवधारियों और वस्तुओं के स्तर पर यह संसार भाप के इंजन, हाथी, ऊँट, गाय, भैंस, कुत्ते, भालू, सियार, सूअर, मक्खी, मकड़ी, पपीते, इमली, समोसे, नींबू, जलेबी, पुदीने, भात और पिद्दी का शोरबा आदि तक हलचल करता है। इन जीवित-अजीवित चीज़ों से वीरेन का व्यवहार कितना आत्मीय और ऐंद्रीय है, इसके साक्ष्य उनकी बहुत सी रचनाओं में हैं।’

समकालीन कविता के बने-बनाए खाँचें में वीरेन डंगवाल की कविता ने सब कुछ उलट-पुलट कर रख दिया। अपने समय की कविता में जितनी उथल-पुथल निराला, मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन और धूमिल ने की थी, वैसी ही वीरेन डंगवाल ने अस्सी के दशक की पीढ़ी में कर दिखाई। वे अपने पुरखों से सबसे ज़्यादा सीखने, लेकिन उस सीख को व्यक्तित्व में पूरी तरह अपना बना के, बिलकुल अलग अंदाज़ में व्यक्त करने वाले कवि रहे।

शिरीष कुमार मौर्य को वीरेन डंगवाल की कविता में सबसे ज़्यादा नागार्जुन नज़र आते हैं। वह लिखते हैं- 'किसी को वीरेन डंगवाल और नागार्जुन का एक बिलकुल अटपटा युग्म लग सकता है और ऐसा लगने पर मैं तुरंत यही कहूंगा कि हाँ! यही तो है वह बीज शब्द 'अटपटा' जो दोनों कविताओं को जोड़ देता है बल्कि दो ही नहीं, और भी नाम। अपने ही भीतर अजब तोडफ़ोड़ का एक अटपटापन निराला का, विराट बौद्घिक छटपटाहट और चिंताओं से भरा एक अटपटापन मुक्तिबोध का, कविता को सामाजिक कला में बदल देने और सामान्य पाठकों में भी उस बदलाव का ख्वाब देखते रहने का एक अटपटापन शमशेर का, हमारे महादेश की समूची जनता को अपने हृदय में धारण किए कबीरनुमा मुँहफट-औघड़ एक अटपटापन नागार्जुन का, सहजता को ही कविता का प्राण मान लेने के बावजूद बहुत कुछ जटिल रच जाने का एक अटपटापन त्रिलोचन का और ठेठ उजड्ड गँवईं संवेदना का सहारा लेकर लोकतंत्र के तमाम गूढ़ प्रश्नों से टकराने का एक अटपटापन धूमिल का।

इतने अलग-अलग कवियों में घिरकर भी अपनी बिलकुल अलग राह बनाने का फ़ितूर जैसा अटपटापन वीरेन डंगवाल का। वैसा ही दिल भी उनका, मोह और निर्मोह से एक साथ भरा। वह लिखते हैं कि वीरेन डंगवाल की कविता समीक्षा से परे जा चुकी है। अपने समय और समाज की तमाम कमज़ोरियों से भरी उनकी कविता एक ऐसी विकट चुनौती है, जिससे हारकर उसकी वंदना भर कर लेना आलोचना की हार तो है ही, कवि के साथ भी अन्याय है। साधारण चीज़ों की एक असाधारण दुनिया दिखाने का काम हिंदी कविता में कुछ हद तक हुआ है, लेकिन वीरेन की कविता जैसे एक जि़द के साथ कहती है कि मामूली लोग और मामूली चीज़ें दरअसल उसी तरह हैं जिस तरह वे हैं और इसी मामूलीपन में उनकी सार्थकता है, जिसे पहचानना उनके जीवन का सम्मान करना है और हम जितना अधिक ऐसे जीवन को जानेंगे, उतने अधिक मानवीय हो सकेंगे।

कवि मंगलेश डबराल लिखते हैं कि व्यापक नकार और ‘सिनिसिज़्म’ के दौर में वीरेन की कविता जीवन के स्वीकार को ज़रा भी नहीं छोड़ती। ‘मक्खी’ शीर्षक कविता में स्याही में गिरी हुई मक्खी को जब बाहर निकाला जाता है तो ‘वह दवात के कगार पर बैठी रही कुछ देर / हाल में घटी दुर्घटना के बोझ से झुकी हुई और पस्त/फिर दवात की ढलान पर रेंगती उतर गयी धूप में/अपने जुड़े पंखों पर पतली टांगों को चलाते हुए/उसने लिया हवा और धूप को /अपने झिल्ली डैनों पर/खिड़की पर बैठे हुए/कुछ देर बाद वह वहाँ नहीं थी/सलाख पर…/ गिरी न होगी /उड़ चली होगी दूसरी मक्खियों के पास/क्योंकि मक्खियाँ गिरा नहीं करती कहीं से/अगर वे जि़ंदा हों।’‘इसी दुनिया में’ की कुछ कविताएँ कवि की मूल प्रस्थापनाओं का घोषणा-पत्र जैसी मानी जा सकती हैं :

मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूँ
और गुठली जैसा
छिपा शरद का ऊष्म ताप
मैं हूँ वसंत का सुखद अकेलापन
जेब में गहरी पड़ी मूँगफली को छाँट कर
चबाता फुरसत से
मैं चेकदार कपड़े की कमीज हूँ
उमड़ते हुए बादल जब रगड़ खाते हैं
मैं उनका मुखर गुस्सा हूँ।

आत्मकथ्य सरीखी इन पंक्तियों में वीरेन की काव्य संवेदना के प्रमुख सरोकार साफ हो जाते हैं। उसमें अनुभव की उदात्तता है तो रोज़मर्रा की मामूली चीज़ों के प्रति गहरा लगाव भी। ग्रीष्म की तेजस्विता और शरद की ऊष्मा और वसंत के सुखद अकेलेपन के साथ जेब में पड़ी मूँगफली और चेकदार कमीज की उपस्थिति एक नया यथार्थ और नया सौंदर्यशास्त्र निर्मित करती है। यहाँ उदात्त अनुभवों और साधारण दुनियावी चीज़ों में कोई बुनियादी विभेद नहीं है, अमूर्तनों और भौतिक उपस्थितियों के बीच कोई दूरी नहीं है, बल्कि वे एक दूसरे के साथ और उनके भीतर भी अस्तित्वमान और पूरक हैं। वीरेन डंगवाल असम्बद्ध नज़र आने वाली चीज़ों/बातों में रागपूर्ण सम्बद्धता सम्भव करते हैं। वे असम्बद्धता के बारे में हमारे भ्रमों को लगातार तोड़ते चलते हैं। यहां द्रष्टव्य है, 1970 में इलाहाबाद में लिखी गई उनकी प्रसिद्ध कविता 'रामसिंह' -

दो रात और तीन दिन का सफ़र तय करके
छुट्टी पर अपने घर जा रहा है रामसिंह
रामसिंह अपना वार्निश की महक मारता ट्रंक खोलो
अपनी गन्दी जर्सी उतार कर कलफ़दार वर्दी पहन लो
रम की बोतलों को हिफ़ाज़त से रख लो रामसिंह, वक़्त ख़राब है ;
खुश होओ, तनो, बस, घर में बैठो, घर चलो ।
तुम्हारी याददाश्त बढ़िया है रामसिंह
पहाड़ होते थे अच्छे मौक़े के मुताबिक
कत्थई-सफ़ेद-हरे में बदले हुए
पानी की तरह साफ़
ख़ुशी होती थी
तुम कनटोप पहन कर चाय पीते थे पीतल के चमकदार गिलास में
घड़े में, गड़ी हई दौलत की तरह रक्खा गुड़ होता था
हवा में मशक्कत करते चीड़ के पेड़ पसीजते थे फ़ौजियों की तरह
नींद में सुबकते घरों पर गिरा करती थी चट्टानें
तुम्हारा बाप
मरा करता था लाम पर अँगरेज़ बहादुर की ख़िदमत करता
माँ सारी रात रात रोती घूमती थी
भोर में जाती चार मील पानी भरने
घरों के भीतर तक घुस आया करता था बाघ
भूत होते थे
सीले हुए कमरों में
बिल्ली की तरह कलपती हई माँ होती थी, बिल्ली की तरह
पिता लाम पर कटा करते थे
ख़िदमत करते चीड़ के पेड़ पसीजते थे सिपाहियों की तरह ;
सड़क होती थी अपरिचित जगहों के कौतुक तुम तक लाती हई
मोटर में बैठ कर घर से भागा करते थे रामसिंह
बीहड़ प्रदेश की तरफ़ ।
तुम किसकी चौकसी करते हो रामसिंह ?
तुम बन्दूक के घोड़े पर रखी किसकी उँगली हो ?
किसका उठा हुआ हाथ ?
किसके हाथों में पहना हुआ काले चमड़े का नफ़ीस दस्ताना ?
ज़िन्दा चीज़ में उतरती हुई किसके चाकू की धार ?
कौन हैं वे, कौन
जो हर समय आदमी का एक नया इलाज ढूँढते रहते हैं ?
जो रोज़ रक्तपात करते हैं और मृतकों के लिए शोकगीत गाते हैं
जो कपड़ों से प्यार करते हैं और आदमी से डरते हैं
वो माहिर लोग हैं रामसिंह
वे हत्या को भी कला में बदल देते हैं ।
पहले वे तुम्हें कायदे से बन्दूक पकड़ना सिखाते हैं
फिर एक पुतले के सामने खड़ा करते हैं
यह पुतला है रामसिंह, बदमाश पुतला
इसे गोली मार दो, इसे संगीन भोंक दो
उसके बाद वे तुम्हें आदमी के सामने खड़ा करते हैं
ये पुतले हैं रामसिंह बदमाश पुतले
इन्हें गोली मार दो, इन्हें संगीन भोंक दो, इन्हें... इन्हें... इन्हें...
वे तुम पर खुश होते हैं -- तुम्हें बख़्शीश देते हैं
तुम्हारे सीने पर कपड़े के रंगीन फूल बाँधते हैं
तुम्हें तीन जोड़ा वर्दी, चमकदार जूते
और उन्हें चमकाने की पॉलिश देते हैं
खेलने के लिए बन्दूक और नंगीं तस्वीरें
खाने के लिए भरपेट खाना, सस्ती शराब
वे तुम्हें गौरव देते हैं और इसके बदले
तुमसे तुम्हारे निर्दोष हाथ और घास काटती हई
लडकियों से बचपन में सीखे गए गीत ले लेते हैं
सचमुच वे बहुत माहिर हैं रामसिंह
और तुम्हारी याददाश्त वाकई बहुत बढ़िया है |
बहुत घुमावदार है आगे का रास्ता
इस पर तुम्हें चक्कर आएँगे रामसिंह मगर तुम्हें चलना ही है
क्योंकि ऐन इस पहाड़ की पसली पर
अटका है तुम्हारा गाँव
इसलिए चलो, अब ज़रा अपने बूटों के तस्में तो कस लो
कन्धे से लटका ट्राँजिस्टर बुझा दो तो खबरें आने से पहले
हाँ, अब चलो गाड़ी में बैठ जाओ, डरो नहीं
गुस्सा नहीं करो, तनो
ठीक है अब ज़रा ऑंखें बन्द करो रामसिंह
और अपनी पत्थर की छत से
ओस के टपकने की आवाज़ को याद करो
सूर्य के पत्ते की तरह काँपना
हवा में आसमान का फड़फड़ाना
गायों का रंभाते हुए भागना
बर्फ़ के ख़िलाफ़ लोगों और पेड़ों का इकठ्ठा होना
अच्छी ख़बर की तरह वसन्त का आना
आदमी का हर पल, हर पल मौसम और पहाड़ों से लड़ना
कभी न भरने वाले ज़ख़्म की तरह पेट
देवदार पर लगे ख़ुशबूदार शहद के छत्ते
पहला वर्णाक्षर लिख लेने का रोमाँच
और अपनी माँ की कल्पना याद करो
याद करो कि वह किसका ख़ून होता है
जो उतर आता है तुम्हारी आँखों में
गोली चलने से पहले हर बार ?
कहाँ की होती है वह मिटटी
जो हर रोज़ साफ़ करने के बावजूद
तुम्हारे बूटों के तलवों में चिपक जाती है ?
कौन होते हैं वे लोग जो जब मरते हैं
तो उस वक्त भी नफ़रत से आँख उठाकर तुम्हें देखते हैं ?
आँखे मूँदने से पहले याद करो रामसिंह और चलो ।

सम्बद्धता-असम्बद्धता अकसर हमारे सोच-विचार के दायरे से बाहर स्वत: घटित होने वाला तथ्य है, हम कभी उसे देख पाते हैं, कभी नहीं - वीरेन डंगवाल की कविता इसे देखने की समझ देती है। ‘कविता क्या है’ नामक बहस कभी कभी कविता की उम्र से भी पुरानी लगती है। जरूरी नहीं कि ‘सूरज की तरफ आँख उठाकर देखने का अर्थ उद्दंड हिमाकत का ही द्दोतक हो, यदा-कदा यह कवायद इसलिए भी की जाती है कि सूरज की आंच का ताप समझा जा सके, दिन कितना चढ़ा या किस कदर उतर गया वह दिन, यह जानने के लिए भी की जाती है। आशय यह कि बड़े कवियों की रचनाओं को देखने-गुनने के क्रम में कई मर्तबा हम खुद को किसी खुले निर्जन निचाट वीराने में पाते हैं और फिर उस कविता को उस तरह ही देखते हैं, जैसे सूरज को भरी दुपहरी में देख रहे हों। उस वक्त वह कविता ही, सूर्य की तरह, दिशा दिखा सकती है।

वीरेन डंगवाल की कविताओं से गुजरते हुए ऐसा ही महसूस होता है। श्रुति कुमुद के शब्दों में 'मनुष्यता वीरेन की कविताओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सन्दर्भ है। अपनी आत्मा के जिन पहलुओं में इंसान निरंतर अकेला पाया जाता है, उन पर वीरेन की नजर पड़ती है। वे उसे न सिर्फ कविता में ढालते हैं, बल्कि अपनी कविता को संबल की तरह खड़ा करते हैं। जैसे इस कविता को देखते हैं : किस्सा यों हुआ कि खाते समय चप्पल पर भात के कुछ कण गिर गए थे जो जल्दबाज़ी में दिखे नहीं। फिर तो काफ़ी देर तलुओं पर उस चिपचिपाहट की ही भेंट चढ़ी रहीं तमाम महान चिन्ताएँ।

तलवे आत्मा का रूप नहीं हैं पर जिस चिपचिपाहट का जिक्र कवि ने छेड़ा है, वह उस खरोंच के निकट है, जो जाने अंजाने इस जीवन संघर्ष में हमारी आत्मा पर लग जाते हैं। समझने-समझाने के लिहाज में अगर एक अधीर उदाहरण, अपमान का ही लें। संस्थाएं, सत्ताएं, कम्पनियां धीरे धीरे अपने ‘मिशन विजन स्टेटमेंट’ में ‘मूल्य / वैल्यू’ नामक हिस्से से जिस तरह ‘परस्परसम्मान’ नामक शब्द युग्म गायब होता जा रहा है, वह विचारणीय है। बाज दफे अपमान ही कोई मूल्य होता जाता है। वह अपमान भी इतना बारीक होता है, जैसा इस कविता में चप्पल पर चिपका हुआ भात। मामूली, परन्तु परेशान रखने वाला. एक ऐसी खरोंच जो आप दिखा नहीं सकते। ऐसी खरोंच, जो दिखाने मात्र से बढ़ती चली जाती है। मनुष्य के संघर्ष को एक परत बढ़ा देने वाली ऐसी अनेक घटनाएँ वीरेन की कविताओं का विषय हैं।'

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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